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ईश्वर का अनुभव अनुभवगम्य नहीं हैं

प्रकाशित: 06-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
ईश्वर का अनुभव अनुभवगम्य नहीं हैं
शिव शंकर द्विवेदी
ईश्वर का मुझसे कोई संवाद नहीं हो पता है क्योंकि ईश्वर का मैं किसी भी शरीर के साथ प्रत्यक्ष नहीं कर पाता हूं। ईश्वर के साथ संवाद तभी संभव है जब ईश्वर शरीर धारित करके मेरे समक्ष उपस्थित हो जाएं। वास्तविकता तो यही है कि ऐसा कोई भी शरीरधारी मेरे सामने अभी तक नहीं आ सका है जिसे मैं समझूं कि यही ईश्वर हैं या जो स्वयं को बता सके कि वह ईश्वर हैं।
ईश्वर मेरे रचयिता नहीं हैं- यह कहना कत्तई उचित नहीं है कि ईश्वर ने मेरी रचना की है या ईश्वर ने मेरी सहायता की है क्योंकि मैंने अपनी रचना में किसी ईश्वर को नहीं देखा है या किसी अन्य ने भी नहीं देखा है कि ईश्वर ने मेरी रचना की है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि मेरी रचना ईश्वर ने की है, केवल कल्पना हो सकती है। ऐसे में यह केवल कल्पना ही है कि ईश्वर ने मेरी रचना की है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी मुझे अर्थात् आत्मा अर्थात् जीव को अज और शाश्वत समझा गया है अजो नित्य: शाश्वतो?यं पुराण:, तथ्य तो यह है कि जो अज है उसका कोई रचयिता कैसे हो सकता है? ऋचाओं में भी सृष्टि के समय जीवों की सत्ता देखी गई है-रेतोधा आसन...इसका अर्थ है कि ऋचाओं में भी ईश्वर को आत्माओं का रचयिता नहीं समझा गया है।
ऋग्वेद में भी माना गया है कि ऋषियों ने कल्पना की है कि ईश्वर ने घोर तपस्या की उसीका परिणाम वर्तमान में दिख रहे समुद्र आदि हैं। ईश्वर ने तप का संकल्प लिया और घोर तप किया परिणाम स्वरूप वर्तमान सृष्टि अस्तित्व में आई, इस तथ्य को किसी ने देखा नहीं है। इस घटना को भी किसी ने नहीं देखा है कि ईश्वर ने एक से अनेक होने की कामना करके कोई तपस्या की है अपितु ऋषियों ने कल्पना कर लिया है कि ईश्वर ने एक से अनेक होने का संकल्प लिया और तपस्या आरम्भ कर दिया। तपस्या के परिणाम स्वरूप वह एक से अनेक हो गए।
जब यह काल्पनिक बात है कि ईश्वर ने एक से अनेक होने की कामना की और वह तपस्या कर के अनेक हो गये हैं तो इस काल्पनिक बात को हम सच मानने के लिए दौड़ें, यह कौन सी अपरिहार्यता है? कृपया मेरे उक्त अभिकथन से नाराज़ होने से पूर्व ऋग्वेद के 10 वें मंडल के सूक्त संख्या 129 के ऋचा संख्या 4 एवं 6 को अवश्य पढ़ें।
मेरा काम मैं करता हूं, ईश्वर नहीं- यह समझना बड़ी विचित्र बात है कि मेरा काम ईश्वर कर रहे हैं। वास्तविकता तो यही है कि मैं या कोई भी, वही काम कर पाते हैं जहां तक सम्भव होता है, जिसे शारीरिक क्षमता अनुमति देती है। जहां तक सम्भव नहीं हो पता है वह काम मैं, आप या अन्य कोई भी नहीं कर पाते हैं। फिर काम के हो जाने के पीछे मैं या आप या अन्य कोई भी ईश्वर को क्यों उत्तरदाई समझते हैं? या काम के बिगड़ जाने पर ईश्वर को क्यों उत्तरदाई नहीं समझते हैं? ऐसे में क्यों नहीं अपनी कमियों को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए? क्यों नहीं अपनी उपलब्धियां को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए?
अननुभूत ईश्वर के अस्तित्व को माना ही क्यों जाय?- हमारे बीच में ईश्वर जब दिख नहीं रहे होते हैं तो ईश्वर को मनाने की कौन सी अपरिहार्यता है? खास बात तो यह भी है कि जिन लोगों ने ईश्वर को माना है वे इस बात को भी मानते हैं कि ईश्वर का साक्षात्कार सम्भव नहीं है- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्य: ...। ईश्वर -अनुभव किसी भी साधना से संभव नहीं है। जब ईश्वर का साक्षात्कार सम्भव नहीं है तो कौन सी विधि से आप यह मान लेते हैं कि ईश्वर हैं ही? जिसका साक्षात्कार सम्भव ही नहीं है उसके होने या ना होने के विषय में मनाने की क्या आवश्यकता है?
यदि कोई कहे कि साक्षात्कार तो स्वयं का भी नहीं होता है ऐसे में स्वयं को कैसे अनुभूत किया जा सकता है?तो इस सन्दर्भ में मैं यह कह सकता हूं कि भले ही स्वयं का साक्षात्कार नहीं होता है किन्तु स्वयं के द्वारा किए गए कार्यों का साक्षात्कार होता है जबकि ईश्वर कोई कार्य कर रहे हैं? इसका साक्षात्कार भी नहीं हो पता है। इसका अर्थ तो यही हुआ कि हम ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं और ईश्वर के द्वारा किए गए कार्यों का भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं जबकि स्वयं के कार्यों का साक्षात्कार कर लेते हैं। स्वयं के साथ अन्य लोगों के व्यवहारों का भी साक्षात्कार कर लेते हैं। स्वयं को मानते हैं स्वयं के अस्तित्व का अनुभव करते हैं।
मैं और हूं में तादात्म्य है- मैं हूं में, मैं और हूं के मध्य तादात्म्य है, जिसका अनुभव मैं हूं के बोध के माध्यम से होता है जहां मैं स्व है तो हूं अस्तित्व का बोधक होता है। मैं नहीं हूं एक व्याघाती निर्वचन है। यह तो संभव है कि मैं घट, पट, शरीर आदि के साथ नहीं हूं का बोध हो किन्तु मैं नहीं हूं में यह अपेक्षा होती हैं कि यह बताऊं कि, मैं क्या नहीं हूं? और क्या हूं? अत एव कहा जाना उचित है कि हूं के पूर्व मैं या मैं के पश्चात हूं के होने का अर्थ ही यह अभिकथन करना है कि, मेरा अस्तित्व है। उक्त दोनों स्थानों पर मैं विशेष्य है और हूं विशेषण। दोनों शाश्वत रूप से एक दूसरे के साथ हैं, यही सनातन चिन्तन का निष्कर्ष है।
मैं का हूं की भांति अन्य का हैं साथ शाश्वत सम्बन्ध है- जैसे मैं का हूं के साथ शाश्वत सम्बन्ध है उसी प्रकार से अन्य का 'हैं' के साथ शाश्वत सम्बन्ध है। जैसे अपने कार्यकलापों के माध्यम से स्वयं के होने का बोध मैं प्राप्त करता हूं उसी तरह से दूसरों के कार्यों के माध्यम से दूसरों के भी अस्तित्व का अनुभव हम करते हैं। इसके विपरीत न तो ईश्वर का साक्षात्कार कर पाते हैं न ईश्वर के कार्यों का साक्षात्कार कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में ईश्वर केवल और केवल कपोल काल्पनिक सत्ता के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं? विचार करें। किसने क्या माना है? इस पर जाने की अपेक्षा स्वयं सोचे और निर्णय लें। हमारा आपका निर्णय महत्वपूर्ण होगा। किसने क्या कहा है? किसने क्या सोचा है? यह सब उतना मायने नहीं रखता है जितना यह कि, हम या आप अपने विवेक से लिए गए निर्णय के आधार पर मत स्थिर करने में सुविधाजनक स्थिति में आ सकते हैं या नहीं?
ईश्वर एक मनोवैज्ञानिक विवशता हैं- ईश्वर नहीं हैं, ईश्वर ने मेरी रचना नहीं की है, ईश्वर मेरी सहायता नहीं करते हैं, यह सब तथ्य परक हैं फिर भी ईश्वर हमारे लिए पूज्य हैं क्योंकि हम हम मनुष्य हैं।
ईश्वर हमारी मनोवैज्ञानिक विवशता हैं। हम मनोवैज्ञानिक रूप से ईश्वर के अस्तित्व को मानने के लिए विवश हैं। ईश्वर का नाम, उनका स्वरूप, उनकी शक्तियां, उनके कार्यों आदि के विषय में हमारी ही कल्पनाएं कार्य कर रही होती हैं जिनका हम न तो सत्यापन किये होते हैं न ही सत्यापन करने का प्रयास ही कर पाते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि जिसका अस्तित्व माना हुआ है उसे खोजने की सोच और साधना ही पाखंड है। इस पाखंड से बचना ही अ-मोक्ष सोच और साधना है। यशोमय आनन्द के साथ जीवन यापन करने के लिए अ-मोक्ष सोच और साधना ही सक्षम हैं जबकि ईश्वर से मिलने की सोच और साधना गर्हित स्थितियों में लाकर खड़ी कर देती है। हजारों उदाहरण उपलब्ध हैं जिनसे पता चलता है ईश्वर का साक्षात्कार करने की अभिलाषा के साथ साधनारत लोगों के साथ अमर्यादित आचरण ईश्वर का साक्षात्कार कराने वालों ने ही किया है।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव उत्तर प्रदेश शासन हैं।)