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खाड़ी युद्ध के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?

प्रकाशित: 15-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
खाड़ी युद्ध के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?
बसंत कुमार
खाड़ी में ईरान व इजरायल के बीच चल रही युद्ध से देश में एलपीजी किल्लत से आमलोगों की मुश्किलें बढ़ गई है कई जगह गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होने के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल और रेस्टोरेंट के बंद होने का खतरा बढ़ गया है रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और उपभोक्ताओं में नाराजगी बहुत ज्यादा बढ़ गई है।
यद्यपि भारत सरकार के पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी ने यह दावा किया है कि युद्ध की स्थिति के बावजूद घरेलू इस्तेमाल के लिए सीएनजी और पीएनजी की शत प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं पर वास्तविकता यह है कि गैस किल्लत के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ ररेस्तरां के मालिक यह कह रहे हैं कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं संभली तो कामकाज बंद हो जाएंगे और वे लोग जिनके घरों में शादियां हैं वह गैस सिलेंडर की कमी के कारण चिंता में बैठे हुए हैं। ऐसा क्या है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह बना दिया की खादी के युद्ध के कारण हमारी अपनी दिनचर्या नष्ट होती जा रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही स्वावलंबन आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें। इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। आत्म पूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में किसी प्रकार की कमी ना हो।
आज हम पाते हैं कि खाद्य उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से कम उत्पादक एवं बंजर हो गई है। गुरु जी ने उसमें चेतावनी दी थी कि हम अपनी आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व आत्मनिर्भरता क्यों बढ़ाने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकार प्रयास के रूप में पर्यावरण के उनको माध्यम से करनी चाहिए। पर आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार है पर हम खाड़ी के युद्ध के कारण बेबस लग रहे हैं आखिर इसके क्या कारण है।
आर्थिक सुधार युग के दौर से पूर्व तक तक हम लोग शादी विवाह या रेस्टोरेंट के संचालन में प्राकृतिक संसाधनोंवीजैसे लकड़ी कोयले और गाय के गोबर से बने उपलेका प्रयोग करते थे,घर में जब भी शादी होती थी तो अपने उत्पादित पेड़ों से कटाई करके लकड़ी से काम कर लिया जाता था इस तरह से रेस्टोरेंट में कोयल के उपयोग से सारे पकवान बनाए जाते थे परंतु आर्थिक सुधार के प्रारंभ होने के बाद हमने इन प्राकृतिक संसाधनों को बंद करके बाहर से आयात गैस के ऊपर पूर्णतया निर्भर करना शुरू कर दिया है।
यहां तक की खाने का सामान गाड़ियां आज सभी आयातित गैस की पर ही चल रही है और जब खाड़ी में युद्ध हुआ तो हमारी दिनचर्या ही पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई है लोगों को चिंता सताए जा रही है कि अगर यह युद्ध ज्यादा चला तो हमारे शादी विवाह जैसे आयोजन कैसे होंगे या खाना कैसे बनेगा।
अपने जीवन में खेती बाड़ी से लेकर जीवन की दिनचर्या में अत्यधिक निर्भरता की खतरे को हमारे विचारों ने पहले ही जान लिया था और प्रसिद्ध अर्थशास्त्राr राष्ट्र वादी विचारक डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान में लिखते हैं" आर्थिक सुधार युग के पूर्व तक लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधिया चला रहे थे क्योंकि आधुनिकता की मजबूरियों के बावजूद ट्रैक्टर हमारे छोटे जोते के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 24 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण बढ़ाता है। इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सर सीवी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा भारत के लोगो को बताये कि अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो ट्रैक्टर को भूल जाए तथा अपनी प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे"। परंतु अल्बर्ट आइंस्टीन है इस चेतावनी के बावजूद भी भारतअपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़कर पश्चिम से आयातित जीवन शैली को अपना रहा है और अपने जीवन की गतिविधियों को 90ज्ञ् खाड़ी देशों से आयातित तेल के लिए के ऊपर निर्भर कर दिया है यहां तक की अब हम 500 मी की दूरी तय करने के लिए पैदल चलने के बजाय मोटर साइकिल या कार का इस्तेमाल करते हैं जो डीजल या पेट्रोल से चलती है, ऐसे में खाड़ी युद्ध के कारण ईरान के रास्ते भारत में तेल न पहुंचना भारत के आर्थिक गतिविधियों को ठप कर सकता है।
देश में करीब 19.01 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की प्रति दिन खपत है और इसका 50ज्ञ् आयातित होता है और गुंजा का की खाड़ी से जहाज का आवागमन लगभग बंद हो जाने के कारण खाड़ी देशों से करीब 6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई बाधित हुई है और इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार को विशेष मीटिंग बुलानी पड़ी और प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों को निपटने के लिए अलर्ट रहने के लिए कहा।
देश के कई हिस्सों में कमर्शियल और घरेलू सामान के लिए एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई में हो रही दिक्कत की शिकायत के बीच सरकार ने तय किया है कि नेचुरल गैस के उपयोग के लिए एलपीजी उत्पादन सीएनजी और पीएनजी को सभी अन्य सेक्टरों पर तरह ही दी जाएगी इन क्षेत्रों की 100ज्ञ् डिमांड पूरी करने का प्रयास किया जाएगा तथा सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन के माध्यम से नेचुरल गैस के इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र तय किए है -पहली प्राथमिकता के क्षेत्र में घरेलू पीएनजी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट के लिए सीएनजी एलजी उत्पादन की और पाइपलाइन कंप्रेस्ड फ्यूल और अन्य जरूरी पाइपलाइन को रखा गया है।
इसके बावजूद भी देश के अंदर उपभोक्ताओं में गहरी चिंता व्याप्त है और सभी डरे हुए है कि यदि खाड़ी युद्ध लंबा चला तो हमारे उद्योग धंधे दैनिक जीवन चर्या बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगी इसलिए सरकार को आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता को दूर करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सके।
पश्चिम एशिया जंग और इससे तेल की कीमत में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में 10ज्ञ् की उछाल से भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 25 बीसी एस की गिरावट आ सकती है। भारत अपनी जरूर का 89ज्ञ् कच्चा तेल आयात करता है और हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है जो विगत 4 साल के उच्चतम स्तर पर है। हॉर्मुज कीखाड़ी से जहाज की आवाजाही बंद होने के कारण ग्लोबल सप्लाई में 20 से 25 बीपीएस की गिरावट आई है। ईरान और अमेरिका की लंबी लड़ाई से भारत की मुश्किलें और बढ़ सकती है क्योंकि भारत में आयात होने वाला कच्चा तेल होर्मूज की खाड़ी से आता है और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देसी महंगाई और भी बढ़ सकता है यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास भी रहता है तो महंगाई पांच तक बढ़ सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में तो कच्चा तेल 120 प्रति बैरल के हिसाब से चल रहा है जो चिंता का विषय है और ऐसी स्थिति में भारत का चालू खाते का घाटा और भी बढ़ सकता है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
विगत कुछ वर्षों से खाड़ी देशों ईरान इराक और अमेरिका इजरायल के संबंधों में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है और जिसका असर तेल की कीमतों में पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करता है इस कारण हमें अपने पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास पर भी जोर देना चाहिए जिससे अधिक तेल पर हमारी निर्भरता और न बढ़े।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)