वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

बड़ी राहत

प्रकाशित: 15-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
बड़ी राहत
भारत में इस वक्त रसोई गैस (एलपीजी) संकट से न सिर्फ होटल और रेस्तरां जूझ रहे हैं बल्कि आम उपभोक्ता भी परेशान हैं। सरकार आश्वासन दे रही है कि गैस भंडार भरा हुआ है किन्तु सिलेंडर खाली होने से उपभोक्ता घबराए हुए हैं। स्थिति को भांप कर ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सीधे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बात की और आग्रह किया कि एलपीजी से भरे उनके जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से गुजरने की अनुमति दी जाए। ईरान ने भारत के अनुरोध को मान लिया और शनिवार को राष्ट्रीय ध्वज लगे दो भारतीय जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से गुजरने की अनुमति दे दी। ईरान के इस सहयोग के बाद अब कामर्शियल एलपीजी की भारी किल्लत के चलते देश में रेस्टोरेंट और हास्पिटलिटी सेक्टर ठप होने से बच जाएगा। नई दिल्ली स्थित ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने इस निर्णय को भारत और ईरान की पुरानी दोस्ती का प्रमाण बताते हुए भारत को अपने देश का आज भी मित्र बताया और कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में ईरान की सहायता की है। मजे की बात तो यह है कि राजदूत फताली ने उम्मीद जाहिर की है कि भारत के दो दर्जन जहाजों को अभी अनुमति मिलने की उम्मीद है क्योंकि इस विषय पर दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है।
दरअसल स्ट्रेट ऑफ होर्मूज में ईरान द्वारा भारत की जहाजों को सुरक्षित रास्ता न देने के कारण 80 प्रतिशत एलपीजी की आपूर्ति बाधित हुई थी किन्तु भारत सरकार ने धैर्य एवं सूझबूझ से इस संकट को हल करने के लिए जो प्रयास किया, उसी का परिणाम है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बीच भी भारत को यह सफलता मिल सकी।
असल में भारत इस बात को अच्छी तरह जानता है कि ईरान के खिलाफ इजरायल-अमेरिका चाहे जितना भयंकर प्रहार करें किन्तु यदि तेहरान ने फैसला कर लिया कि वह युद्ध बंद करने कि बजाए युद्ध जारी रखते हुए मरना पसंद करेगा तो दुनिया बद से बदतर स्थिति में पहुंच जाएगी। यह बात तो अमेरिका भी जानता है कि ईरान, अर्जेटीना नहीं है। ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का भंडार है और वह कदापि हार मानकर बैठने वाला नहीं है। इसके अलावा ईरान में आज भी राष्ट्रवादी जनता मौजूदा सरकार के साथ ही है। जो जनता और व्यवसायी खामेनेई परिवार की बादशाहत के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, वे भी इस संकटग्रस्त परिस्थिति में देश को अस्थिर होने के पक्ष में नहीं हैं। चार दशक पहले ईरान छोड़ चुके रजा पहेलवी के वंशजों को ईरान भूगोल की भी जानकारी नहीं है। पहेलवी परिवार पहले भी आम जनता से कट चुका था। इसलिए ईरान की जनता यह मानकर चल रही है कि उनके एक सुप्रीम लीडर को भले ही इजरायल ने मार डाला और मौजूदा सुप्रीम लीडर भी इजरायल और अमेरिका के निशाने पर हैं किन्तु यदि इस वक्त ईरान हार मानकर बैठ गया तो देश में न सिर्फ गृह युद्ध छिड़ जाएगा बल्कि मोशाद और सीआईए के नंगे नाच से पूरा ईरान अराजकता की आग में जल कर राख हो जाएगा। ईरान अपनी लड़ाई लड़ तो अकेले ही रहा है किन्तु उसे दुनिया के कई महाशक्तियों का सािढय सहयोग भी मिल रहा है। जहां तक सवाल भारत का है तो नई दिल्ली कभी भी नहीं चाहेगा कि ईरान अस्थिर हो। ईरान की अस्थिरता का असर भारत की न सिर्फ अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा बल्कि हमारी भूराजनीतिक चुनौतियां भी बढ़ जाएंगी। भारत के लिए मित्र राष्ट्र अमेरिका भी है तो ईरान भी है। भारत के लिए मित्र इजरायल भी है। यह तो कूटनीतिक कौशल भारत का है जो सभी के साथ मित्र की तरह व्यवहार करे और उन्हें भी भारत के साथ मित्रवत व्यवहार करने के लिए प्रेरित करे। भारत के लिए फिलस्तीन मित्र हो सकता है किन्तु हमास कदापि नहीं। हमास यदि भारत विरोधी पाक आतंकी संगठनों को ट्रेनिंग दे रहा है तो वह भारत का दुश्मन है।
बहरहाल भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपने हितों के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न देशों से किस तरह समीकरण बैठाए जा सकते हैं। भारत दो देशों के बीच संघर्ष के प्रति भले ही निरपेक्ष रहता है, किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि वह निपिय है। भारत को जो भी उचित महसूस होगा, वह भलाई ईरान के साथ करने के लिए किसी भी देश की अनुमति की जरूरत नहीं है। इसी को कहते हैं स्वतंत्र विदेश नीति। स्वतंत्र विदेश नीति के फायदे भी हैं और नुकसान भी। नुकसान यह है कि उसे स्वत संरक्षण नहीं मिलता किन्तु फायदा यह है कि भारत अपनी नीतियों की वजह से युद्धरत पक्षों में किसी का भी कोपभाजन नहीं होता। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि लेकर यदि अपने जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से सुरक्षित निकाल लेता है तो यही बहुत बड़ी बात है।