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नेपाल में नई राजनीतिक बयार

प्रकाशित: 10-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नेपाल में नई राजनीतिक बयार
डॉ..बचन सिंह सिकरवार
हाल में पड़ोसी पर्वतीय देश नेपाल में हुए चुनाव में पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर और गीत-संगीत रैंप कलाकार के रूप में भी पहचान बना चुके काठमाण्डू के पूर्व मेयर 35 वर्षीय बालेन्द्र शाह उर्फ ‘बालेन' और उनकी पार्टी ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को जिस तरह बड़े बहुमत से जिताया है, उससे स्पष्ट है कि नेपाल की जनता में अपने पुराने नेताओं और उनकी पार्टियों के प्रति कितन गुस्सा/नाराजगी थी, जो उनकी सत्तालोलुपता, उसके लिए सिद्धान्तहीन गठजोड़ और उनकी सरकारों द्वारा निजी स्वार्थों की कीमत पर राष्ट्र और जनहित निरन्तर उपेक्षा किया जाना रहा है। इस कारण देश में राजनीतिक अस्थिरता, अशान्ति, अराजकता, उठापटक से महँगाई, बेरोजगारी, विकास का अवरूद्ध रहा, इससे जनता में भारी असन्तोष था।वह इन नेताओं को हर हाल में सत्ता से बेदखल करना चाहती थी।
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा की साम्यवादी सरकार के चीन की तरफ जरूरत से ज्यादा झुकाव और भारत से अनावश्यक टकराव से भी नेपाली जनता उनसे रुष्ट थी, जिससे उसके ‘रोटी और बेटी या रक्त सम्बन्ध' हैं। उससे आने-जाने ही नहीं, जीविका कमाने के लिए भारत आने-जाने के लिए पासपोर्ट और बीजा की जरूरत नहीं होती और नेपाल आज भी अपनी आमजरूरतों की वस्तुओं के लिए भारत पर निर्भर है। इतना सब कुछ होते हुए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ने अपने आका चीन को खुश करने के लिए जहाँ अपनी सीमा पर उसके अपामण होने दिये, वहीं कई भारतीय क्षेत्रों पर अपने देश का होना दावा किया। यह कहना अनुचित न होगा कि उन्होंने भारत के साथ रिश्ते खराब करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।
निश्चय ही अब इस चुनाव में नई नवेली पार्टी और उसके नेता बालेन्द्र शाह बालेन की विजयी होने पर जहां पड़ोसी देश भारत में इस नई पार्टी के सत्ता संभालने पर खुशी और उससे अच्छे सम्बन्ध होने की उम्मीद जतायी जा रही है, वहीं चीन को अपनी पक्षधर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल)को गहरा आघात लगा होगा, क्योंकि नेपाल के अधिकतर लोग भारत के साथ घनिष्ठ मैत्री के पक्षधर हैं। ऐसे में नई पार्टी के लिए चीन से पहले जैसे रिश्ते बनाना आसान नहीं होगा। यही कारण है। सितम्बर, 2025 हुए भ्रष्टाचार, भाई-भतीजा, हिंसक व्यापक जेन-जी प्रदर्शनों, जनान्दोलनों और गठबन्धन सरकार के पतन के बाद यहाँ इसी 5मार्च को पहली बार राष्ट्रीय चुनाव में लोगों ने बढ़-चढ़कर का हिस्सा लिया। परिणामत नेपाल के इस चुनाव में 60 प्रतिशत से अधिक मतदान रहा है। इस चुनाव में जहाँ नेपाली काँग्रेस ने गगन थापा को, तो वहीं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ‘ओली' और आर.एस.पी. की तरफ से बालेन्द्र शाह ‘बालेन' का प्रधानमंत्री को दावेदार के रूप में उतारा, जो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत काठमाण्डू के मेयर चुन गए और जनवरी 2026तक पदस्थ रहे थे।लेकिन अब पत्रकार रहे रवि लमिछाने द्वारा 2022 गठित ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी' ने जितने बड़े अन्तर से विजय प्राप्त की है, वह अभूतपूर्व है, जिसकी उम्मीद खुद इसकी पार्टी के नेताओं को भी नहीं रही होगी। इस चुनाव में बालेन्द्र शाह बालेन ने चार बार प्रधानमंत्री रहे केपी शर्मा ‘ओली' लगभग 50 हजार से अधिक वोटों से हराया है, जहाँ बालेन को 68,348 हजार वोट प्राप्त हुए हैं, वहीं उनके प्रबल प्रतिद्वन्द़्वी मात्र 18, 734मत मिले हैं। बालेन्द्र शाह मधेशी हैं, वे नेपाल के प्रथम मधेशी प्रधानमंत्री होंगे। इस चुनाव मेंआरएसपी ने काठमाण्डू की सभी दस संसदीय सीटें जीतते हुए दूसरे राजनीतिक दलों का सफाया कर दिया है। आरएसपी के संस्थापक रवि लमिछाने ने भी 50 हजार से अधिक वोटों से नेपाली काँग्रेसी की उम्मीदवार मीना खरेल को हरा कर विजय हुए हैं। इस चुनाव में राजशाही समर्थक पार्टी:राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के ज्ञानेन्द्र शाह जीत गए। उनकी पार्टी को अपेक्षित सफलता न मिलने से स्पष्ट है कि लोग अभी राजशाही की फिर से वापसी के पक्ष में नहीं हैं।
नेपाल में 28 मई, 2008 में 240 साल पुरानी राजशाही का अन्त हो गया और संविधान सभा ने नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। इसके बाद में राजनीतिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है। पिछले दो दशकों से भी कम समय में देश 15 प्रधानमंत्री देख चुका है और अब नया नेता 16वाँ प्रधानमंत्री बनेगा। नेपाल में 275 सदस्यी प्रतिनिधि सभा के लिए पाँच मार्च को चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनाव इसलिए भी अहम माना जा रहा है।
बालेन्द्र शाह की पार्टी को सीधे चुनाव से भरी जाने वाली प्रतिनिधि सभा की 165 सीटों में से अभी तक 107पर जीत हासिल हुई है और 78 पर सीटों पर पार्टी प्रत्याशी प्रतिद्वन्द्वियों से आगे चल रहे हैं।इसके विपरीत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल), नेपाली काँग्रेस और दूसरे पुराने दल प्रतिनिधि सभा की केवल 25 सीट पर सिमट कर रह गई हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मादी ने नेपाल की जनता और उसकी नई सरकार को बधाई दी।
भारत अपने पड़ोसी के साथ शान्ति, प्रगति और समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करने को प्रतिबद्ध है। इससे स्पष्ट है कि नेपाल में उभरते नए राजनीतिक नेतृत्व के साथ काम करने को भारत की तत्परता के संकेत की तौर पर देखा जा रहा है। पर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता बालेन्द्र शाह के पूर्व के भारत विरोधी रुख को दृष्टिगत रखते हुए यह आशा है कि एक बार प्रधानमंत्री पद सम्हालने के पश्चात् व्यावहारिक रवैया अपनायेंगे और ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे, जिससे सदियों पुराने रिश्ते बेहतर हों।
ऐसा होना ही दोनों पड़ोसी देशों के हित में होगा। वैसे भारत ही नहीं, नेपाल के किसी भी प्रधानमंत्री के लिए यह अपरिहार्य है कि अपने देश की जटिल भू स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने पड़ोसियों के साथ मैत्री पूर्ण सम्बन्ध और अपनी विदेश नीति को सन्तुलित रखे और बाहरी शक्ति के दबाव-प्रभाव से हर स्थिति में बचा कर रखे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)