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सजा की जगह जुर्माना प्रावधान प्रशासनिक सुधार की दिशा में अग्रणी कदम

प्रकाशित: 10-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
सजा की जगह जुर्माना प्रावधान प्रशासनिक सुधार की दिशा में अग्रणी कदम
डॉ. राजेंद्र प्रसाद शर्मा
राजस्थान सरकार ने जन विश्वास उपबंधों में संशोधन करते हुए 11 अधिनियमों में होने वाली जेल की सजा के स्थान पर अब जुर्माने का प्रावधान किया है। यह केन्द्र सरकार द्वारा 300 से अधिक कानूनों में संशोधन की दिशा में ही बढ़ता हुआ कदम माना जा सकता है। सरकार भले ही इसे ईज ऑफ लिविंग और ईज ऑफ डूइंग बिजनस की दिशा में बढ़ता कदम बता रही हो पर सही मायने में देखा जाएं तो न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों के बोझ और छोटे छोटे सामान्य श्रेणी के मुकदमों में भी वर्षों तक न्याय के इंतजार की वास्तविकता को समझते हुए उठाया गया व्यावहारिक कदम माना जाना चाहिए। अब जाने अनजाने वन क्षेत्र में मवेशी चरते हुए पकड़े जाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान को किसी कारणवश अधिक देरी तक खुली रखने, दस्तावेज प्रस्तुत करने में देरी, बिना लाइसेंस के भण्डारण, प्रािढयात्मक त्रुटी और इसी तरह की अन्य गतिविधियों में जेल प्रावधानों के स्थान पर जुर्माने के प्रावधान से जहां एक और त्वरित कार्रवाई संभव हो सकेगी, राजकोष में तत्काल राशि प्राप्त हो सकेगी। वहीं न्यायालयों में मुकदमों के बोझ के साथ ही जेल में जमानत या निर्णय होने तक बंद रहने की स्थिति से दो चार नहीं होना पड़ेगा। इससे एक बात और साफ हो जाती है कि समय और धन की बचत भी होगी। राजस्थान विधानसभा में जो संषोधन प्रावधान किये गये हैं उनमें राजस्थान वन अधिनियम 1953, राजस्थान टेनेंसी अधिनियम 1955, राजस्थान वेयरहाउस अधिनियम1958, राजस्थान सहायता उद्योग अधिनियम1961, राजस्थान विद्युत शुल्क अधिनियम1961, राजस्थान साहूकार अधिनियम 1963, राजस्थान गैरसरकारी शैक्षिक अधिनियम 1989, राजस्थान स्टॉम्प अधिनियम 1998, राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 व राजस्थान जल आपूर्ति व सीवरेज अधिनियम 2018 में जेल की सजा के स्थान पर अब जुर्माने का प्रावधान किया गया है। अब भले ही जुर्माने की राशि को लेकर आलोचना प्रत्यालोचना हो सकती है पर न्यायिक और प्रशासनिक सुधार की दृष्टि से इसे सकारात्म कदम माना जा सकता है। न्यायालयों में लंबित मुकदमों की बात की जाएं तो केन्द्राrय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकड़ो की ही माने तो देश के उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकदमें निर्णय के इंतजार में दशकों से प्रतीक्षारत है। मजे की बात तो यह है कि 3 हजार से अधिक मामलें तो 50 साल भी अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। दस साल या इससे अधिक समय से निर्णय का इंतजार कर रहे मुकदमों की ही बात करें तो यह संख्या इतनी अधिक है कि सोचने का मजबूर कर देती है। देश के 25 उच्च न्यायालयां व राज्यों के जिला अदालतों में लबित मुकदमों की बात की जाएं तो यह सामने आ रहा है कि 54 लाख 58 हजार 832 मुकदमें 10 से 20 साल की अवधि के हैं और निष्पादन का इंतजार कर रहे हैं। 20 से 30 साल और 30 से 40 साल की अवधि के निर्णय के इंतजार के मुकदमें भी लाखों में हैं। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि सालों से लोक अदालतें भी लग रही है पर मुकदमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों को लेकर न्यायपालिका और सरकार दोनों ही चिंतित है। सवाल यह भी है कि जिन मामलों को आसानी से प्रशासनिक प्रािढया के तहत ही निपटाया जा सकता है उन्हें न्यायिक प्रािढया में लंबे समय तक उलझाये रखना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। इससे समय और धन दोनों का ही नुकसान होता है। सवाल यह भी उठता है कि कानून कायदों का मतलब अपराध को रोकना होना चाहिए या कानूनी प्रािढया में ही उलझा कर लंबित रखते हुए बोझ बनाना होना चाहिए? ऐसी स्थिति में सरकार और वादी दोनों को ही कोई खास लाभ नहीं मिल पाता और न्यायालय का समय भी जाया जाता है। ऐसे में जुर्माना लगाना और वसूली सुनिश्चित करना व्यावहारिक समाधान हो सकता है और यह इसी दिशा में बढ़ता कदम माना जाना चाहिए। वैसे भी प्रािढयात्मक त्रुटियों या अवहेलना जैसे प्रकरणों में न्यायालयों के चक्कर काटने-कटवाने के स्थान पर जुर्माना तय करना और उसे वसूलना अधिक व्यावहारिक समाधान है। वैसे भी कानून कायदों का मतलब अपराधीकरण को कम करना होना चाहिए और प्रािढयात्मक सुधार और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक सुसंगत होना चाहिए। प्रशासनिक अमले का भी एक दायित्व होता है और प्रशासनिक अमले द्वारा प्रावधानों के दुरुपयोग ना होने के संकल्प के साथ सुधारात्मक निर्णय किया जाता है तो यह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी होगा। न्यायिक प्रािढया में सुधार की दिशा में इसे अग्रगामी कदम माना जाना चाहिए। केन्द्र और राजस्थान सरकार की तरह अन्य प्रदेशों की सरकारों को भी इस दिशा में पहल करनी होगी।