न्यायालय, पुलिस और जनप्रतिनिधियों के प्रति भ्रष्ट होने का पूर्वाग्रह पालना अनुचित
प्रकाशित: 08-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
इधर कुछ दिनों से एनसीईआरटी की कक्षा 8 की समाज शास्त्र की पुस्तक के न्यायपालिका के भ्रष्टाचार नामक शीर्षक से एक चैप्टर प्रकाश जिसमे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार और न्यायलयों में दशकों से लंबित मामलों की जानकारी दी गई। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस चैप्टर को बैन करने का आदेश दिया और इस प्रकार के चैप्टर के पुस्तक में शामिल होने पर नाराजगी यद्यपि एनसीईआरटी ने इस विषय में माफी मांग ली है, पर प्रश्न यह उठता है कि एनसीईआरटी जैसी संस्था जो देश में शिक्षा और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयो पर निर्णय लेती है और इसके लिए इस संस्थान में बड़े विद्वान लोगों की टीम रहती है वहां इस प्रकार की लापरवाही कैसे हुई और पाठपाम में एक ऐसा पथ जोड़ दिया गया जो देश की आने वाले युवा पीढ़ी के मन में देश की न्यायपालिका व न्यायालयों के विषय में किसी तरह का भ्रम पैदा करे।
यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका अपने उच्च आदर्शो को बनाए रखने में नाकाम रही है, जस्टिस वर्मा जिनके सरकारी आवास पर से अनगिनत नोटों के बंडल पाए गए और कुछ अन्य जजों के कृत्य के कारण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है,कुछ वर्ष पूर्व तमिलनाडु उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज जस्टिस कर्णननमैं पत्र लिख कर उच्च न्यायपालिका में कार्यरत कई जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए थे। एक बार संसद में न्यायमूर्ति जस्टिस मुखर्जी पर भ्रष्टाचार केआरोप पर महाभियोग लाया गया पर संसद के उत्तर भारत व दक्षिण भारत की लाबी में बंट जाने के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। कुछ माह पूर्व एक सिरफिरे वकील ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी आर गवई के ऊपर भरी अदालत में जूता फेंकने का साहस किया। यह घटना है उस उच्च न्यायपालिका का अपमान है जहां देश का नागरिक पीड़ित होने पर सामने वाले को बड़े गर्व से कह देता है आई विल सी यू इन द कोर्ट उसका यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि देश की न्यायपालिका जाति धर्म लिंग भेद से परे रहकर ईमानदारी से काम करती है पर पाठ्य पुस्तक में इस तरह के चैप्टर का छपना सचमुच दुर्भाग्य पूर्ण है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस सुरेश कैत खुले आम यह आरोप लगाया कि देश की न्यायालय में वंचित यानी दलित समाज के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता जबकि जस्टिस सुरेश कैत दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ अन्य न्यायालयों में सम्मानित न्यायाधीश रहे है पर हैरानी की बात यह है कि सेवा में रहते हुए उन्होंने कभी भी न्यायपालिका में दलितों व वंचितों के साथ अन्याय होने की बात नहीं उठाई, लेकिन जस्टिस सुरेश कैत ये बात सेवा में रहते हुए यह बात उठा देते तो सम्भव; इस विषय में कुछ हो सकता था, फिर भी आज भी इन सारे विवादों के प्रकाश में आने के बावजूद देश के नागरिकों में न्यायपालिका के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है।
एनसीईआरटी की पुस्तक के विवादित पाठ में न्यायालय में दशकों से लंबित मुकदमों का भी वर्णन किया गया है जिनकी संख्या लाखों में हो गई है इन बातों को समय-समय पर समाचार पत्र सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों द्वारा उठाया जाता रहा है पर न्यायालय में इतनी संख्या में लंबित मुकदमों के लिए सिर्फ कोर्ट को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों द्वारा मामलों को लंबा लटकाना पुलिस द्वारा दोषपूर्ण तफ्तीश और सरकार द्वारा न्यायालय में खाली पदों को न भरना भी एक कारण है। हमारी पुलिस कानून व्यवस्था और शिकायतों को निपटाने में सफल नहीं रही है जहां कोर्ट केस में वकील डेट लेकर मामले को लटकाते है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियांभी पीछे नहीं है चार्ज शीट समय पर फाइल न करना या प्रॉसिक्यूशन का समय पर उपस्थित न होना बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कारण है। इसकाअन्य कारण पुलिस विभाग में स्टाफ की संख्या में भारी कमी है
जो भी पुलिस बल हमारे पास उपलब्ध है वह कानून व्यवस्था और मुकदमों को निपटने के बजाय, भारी संख्या में वीआईपी सुरक्षा में तैनात रहती है क्योंकि सुरक्षा रखना अब नेताओं और बाहुबलियों के लिए आवश्यकता नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गया है, मैंने स्वयं अनुभव किया है कि कुछ ऐसे नेता हैं जो उम्र 80 या 90 के पड़ाव में पहुंच चुके हैं और जिन्हें यमराज के अलावा किसी और से कोई डर नहीं है पर वह भी वाई प्लस और जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा रखते हैं सरकार को चाहिए कि अब नेताओं और बाहुबलियों को दी जाने वाली सुरक्षा का रिव्यू करें और अनावश्यक सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटाकर पुलिस कर्मियों को कानून व्यवस्था अपराध रोकने और प्रॉसिक्यूशन जैसे कामों में लगाया जाए। जिससे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सके।
चाहे चाहे फिल्म उद्योग हो या मीडिया का अन्य साधन हो न्यायपालिका के साथ-साथ पुलिस और जनप्रतिनिधियों को सदैव भ्रष्टाचार में लिप्त ही दिखाई जाता है परंतु कभी भी इस तरह की फिल्मों या साहित्य पर रोक नहीं लगाई जाती, सेंसर बोर्ड इन ]िफल्मों को कैसे पास कर देता है यह समझ से परे है। जहां तक पुलिस का सवाल है कोई भी सभ्य आदमी यह नहीं चाहता की कोई वर्दी धारी पुलिस वाला उनके घर आए, मेरे एक दोस्त जो पुलिस अधिकारी है वे मेरी एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में मेरे पास आना चाहते थे, परंतु वे पहले ऑफिस से अपने घर गए और यूनिफार्म बदल करमेरे पास आएऔर पूछने पर कहने लगे कि आजकल हमारी इमेज इतनी खराब हो गई है की कोई भी शरीफ आदमी यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाली पुलिस वाला वर्दी पहनकर उनके घर आए। यह ठीक है कि जीवन के हर पक्ष से भ्रष्टाचार से मुक्ति होनी चाहिए परंतु किसी पक्ष विशेष चाहे वह पुलिस हो चाहे न्यायालय हो चाहे हमारे जनप्रतिनिधि हो उनकी इमेज को भ्रष्ट या अनैतिक दिखाना समाज के लिए ठीक नहीं है। जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में या अनाचार में लिप्त पाया जाए उसे पर तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए परंतु एक व्यक्ति के कारण उसे पूरे समाज को भ्रष्टाचार या अनाचार में लिप्त नहीं माना जाना चाहिए, इस तरह कीबनाई गई इमेज पूरे समाज को बर्बाद कर देती है इस कारण जो एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट कह कर 12-14 साल के उम्र के बच्चों के दिमाग में यह बिठा देना कि देश की न्यायपालिका भ्रष्ट है बिल्कुल ही अनुचित है।
एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायालय के भ्रष्ट होने का जो पाठ छप गया था यदि वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की छवि खराब करने के लिए किया गया है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है क्यूंकि भारत की न्यायपालिका विश्व की गिनी चुनी न्यायपालिकाओं में से एक है जिसके विषय में यह माना जाता है कि राजनीति या अन्य शक्तियों से प्रभावित नहीं होती पर यह भी आवश्यक है कि न्यायालय को भ्रष्ट और सुस्त वाली छवि से उबारने के लिए स्टीरियोटाइप वर्किंग से मुक्ति पानी होगी न्यायालय को यह देखना होगा की वही लोग जेल में डाले जाएं जिनको जेल में डालना आवश्यक हो और न्यायालय में न्याय के आशा में आए लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलनी चाहिए इससे लोगों में न्यायपालिका के प्रति आस्था में वृद्धि होगी और दशकों को से लंबित मुकदमों संख्या में कमी आएगी।
कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म ाढांतिवीर आई थी जिसमें नेता, पुलिस, जज, भूमाफिया सभी को भ्रष्टाचार में लिप्त व गरीबों का अमानवीय शोषण करने वाला दिखाया गया था निश्चय ही जनमानस के बीच सभी की नकारात्मक छवि अनुचित है और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों की छवि को धूमिल होने से बचाया जाए। यह निर्विवाद सत्य है कि भ्रष्टाचार में लिप्त में कुछ लोगों के आ जाने से देश की न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और 30 -40 साल तक न्याय न्याय के लिए भटकते लोगों को न्याय न मिलने के कारण न्यायपालिका की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना में विश्वास करते हैं और ऐसे में न्यायपालिका के बारे में जूनियर कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भ्रामक बातें लिखना और स्कूल जाने वाले बच्चों के मन में न्यायपालिका व अन्य संस्थाओं के बारे में भ्रम पैदा करना अत्यंत गंभीर है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)
इधर कुछ दिनों से एनसीईआरटी की कक्षा 8 की समाज शास्त्र की पुस्तक के न्यायपालिका के भ्रष्टाचार नामक शीर्षक से एक चैप्टर प्रकाश जिसमे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार और न्यायलयों में दशकों से लंबित मामलों की जानकारी दी गई। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस चैप्टर को बैन करने का आदेश दिया और इस प्रकार के चैप्टर के पुस्तक में शामिल होने पर नाराजगी यद्यपि एनसीईआरटी ने इस विषय में माफी मांग ली है, पर प्रश्न यह उठता है कि एनसीईआरटी जैसी संस्था जो देश में शिक्षा और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयो पर निर्णय लेती है और इसके लिए इस संस्थान में बड़े विद्वान लोगों की टीम रहती है वहां इस प्रकार की लापरवाही कैसे हुई और पाठपाम में एक ऐसा पथ जोड़ दिया गया जो देश की आने वाले युवा पीढ़ी के मन में देश की न्यायपालिका व न्यायालयों के विषय में किसी तरह का भ्रम पैदा करे।
यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका अपने उच्च आदर्शो को बनाए रखने में नाकाम रही है, जस्टिस वर्मा जिनके सरकारी आवास पर से अनगिनत नोटों के बंडल पाए गए और कुछ अन्य जजों के कृत्य के कारण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है,कुछ वर्ष पूर्व तमिलनाडु उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज जस्टिस कर्णननमैं पत्र लिख कर उच्च न्यायपालिका में कार्यरत कई जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए थे। एक बार संसद में न्यायमूर्ति जस्टिस मुखर्जी पर भ्रष्टाचार केआरोप पर महाभियोग लाया गया पर संसद के उत्तर भारत व दक्षिण भारत की लाबी में बंट जाने के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। कुछ माह पूर्व एक सिरफिरे वकील ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी आर गवई के ऊपर भरी अदालत में जूता फेंकने का साहस किया। यह घटना है उस उच्च न्यायपालिका का अपमान है जहां देश का नागरिक पीड़ित होने पर सामने वाले को बड़े गर्व से कह देता है आई विल सी यू इन द कोर्ट उसका यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि देश की न्यायपालिका जाति धर्म लिंग भेद से परे रहकर ईमानदारी से काम करती है पर पाठ्य पुस्तक में इस तरह के चैप्टर का छपना सचमुच दुर्भाग्य पूर्ण है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस सुरेश कैत खुले आम यह आरोप लगाया कि देश की न्यायालय में वंचित यानी दलित समाज के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता जबकि जस्टिस सुरेश कैत दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ अन्य न्यायालयों में सम्मानित न्यायाधीश रहे है पर हैरानी की बात यह है कि सेवा में रहते हुए उन्होंने कभी भी न्यायपालिका में दलितों व वंचितों के साथ अन्याय होने की बात नहीं उठाई, लेकिन जस्टिस सुरेश कैत ये बात सेवा में रहते हुए यह बात उठा देते तो सम्भव; इस विषय में कुछ हो सकता था, फिर भी आज भी इन सारे विवादों के प्रकाश में आने के बावजूद देश के नागरिकों में न्यायपालिका के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है।
एनसीईआरटी की पुस्तक के विवादित पाठ में न्यायालय में दशकों से लंबित मुकदमों का भी वर्णन किया गया है जिनकी संख्या लाखों में हो गई है इन बातों को समय-समय पर समाचार पत्र सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों द्वारा उठाया जाता रहा है पर न्यायालय में इतनी संख्या में लंबित मुकदमों के लिए सिर्फ कोर्ट को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों द्वारा मामलों को लंबा लटकाना पुलिस द्वारा दोषपूर्ण तफ्तीश और सरकार द्वारा न्यायालय में खाली पदों को न भरना भी एक कारण है। हमारी पुलिस कानून व्यवस्था और शिकायतों को निपटाने में सफल नहीं रही है जहां कोर्ट केस में वकील डेट लेकर मामले को लटकाते है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियांभी पीछे नहीं है चार्ज शीट समय पर फाइल न करना या प्रॉसिक्यूशन का समय पर उपस्थित न होना बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कारण है। इसकाअन्य कारण पुलिस विभाग में स्टाफ की संख्या में भारी कमी है
जो भी पुलिस बल हमारे पास उपलब्ध है वह कानून व्यवस्था और मुकदमों को निपटने के बजाय, भारी संख्या में वीआईपी सुरक्षा में तैनात रहती है क्योंकि सुरक्षा रखना अब नेताओं और बाहुबलियों के लिए आवश्यकता नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गया है, मैंने स्वयं अनुभव किया है कि कुछ ऐसे नेता हैं जो उम्र 80 या 90 के पड़ाव में पहुंच चुके हैं और जिन्हें यमराज के अलावा किसी और से कोई डर नहीं है पर वह भी वाई प्लस और जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा रखते हैं सरकार को चाहिए कि अब नेताओं और बाहुबलियों को दी जाने वाली सुरक्षा का रिव्यू करें और अनावश्यक सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटाकर पुलिस कर्मियों को कानून व्यवस्था अपराध रोकने और प्रॉसिक्यूशन जैसे कामों में लगाया जाए। जिससे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सके।
चाहे चाहे फिल्म उद्योग हो या मीडिया का अन्य साधन हो न्यायपालिका के साथ-साथ पुलिस और जनप्रतिनिधियों को सदैव भ्रष्टाचार में लिप्त ही दिखाई जाता है परंतु कभी भी इस तरह की फिल्मों या साहित्य पर रोक नहीं लगाई जाती, सेंसर बोर्ड इन ]िफल्मों को कैसे पास कर देता है यह समझ से परे है। जहां तक पुलिस का सवाल है कोई भी सभ्य आदमी यह नहीं चाहता की कोई वर्दी धारी पुलिस वाला उनके घर आए, मेरे एक दोस्त जो पुलिस अधिकारी है वे मेरी एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में मेरे पास आना चाहते थे, परंतु वे पहले ऑफिस से अपने घर गए और यूनिफार्म बदल करमेरे पास आएऔर पूछने पर कहने लगे कि आजकल हमारी इमेज इतनी खराब हो गई है की कोई भी शरीफ आदमी यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाली पुलिस वाला वर्दी पहनकर उनके घर आए। यह ठीक है कि जीवन के हर पक्ष से भ्रष्टाचार से मुक्ति होनी चाहिए परंतु किसी पक्ष विशेष चाहे वह पुलिस हो चाहे न्यायालय हो चाहे हमारे जनप्रतिनिधि हो उनकी इमेज को भ्रष्ट या अनैतिक दिखाना समाज के लिए ठीक नहीं है। जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में या अनाचार में लिप्त पाया जाए उसे पर तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए परंतु एक व्यक्ति के कारण उसे पूरे समाज को भ्रष्टाचार या अनाचार में लिप्त नहीं माना जाना चाहिए, इस तरह कीबनाई गई इमेज पूरे समाज को बर्बाद कर देती है इस कारण जो एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट कह कर 12-14 साल के उम्र के बच्चों के दिमाग में यह बिठा देना कि देश की न्यायपालिका भ्रष्ट है बिल्कुल ही अनुचित है।
एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायालय के भ्रष्ट होने का जो पाठ छप गया था यदि वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की छवि खराब करने के लिए किया गया है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है क्यूंकि भारत की न्यायपालिका विश्व की गिनी चुनी न्यायपालिकाओं में से एक है जिसके विषय में यह माना जाता है कि राजनीति या अन्य शक्तियों से प्रभावित नहीं होती पर यह भी आवश्यक है कि न्यायालय को भ्रष्ट और सुस्त वाली छवि से उबारने के लिए स्टीरियोटाइप वर्किंग से मुक्ति पानी होगी न्यायालय को यह देखना होगा की वही लोग जेल में डाले जाएं जिनको जेल में डालना आवश्यक हो और न्यायालय में न्याय के आशा में आए लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलनी चाहिए इससे लोगों में न्यायपालिका के प्रति आस्था में वृद्धि होगी और दशकों को से लंबित मुकदमों संख्या में कमी आएगी।
कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म ाढांतिवीर आई थी जिसमें नेता, पुलिस, जज, भूमाफिया सभी को भ्रष्टाचार में लिप्त व गरीबों का अमानवीय शोषण करने वाला दिखाया गया था निश्चय ही जनमानस के बीच सभी की नकारात्मक छवि अनुचित है और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों की छवि को धूमिल होने से बचाया जाए। यह निर्विवाद सत्य है कि भ्रष्टाचार में लिप्त में कुछ लोगों के आ जाने से देश की न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और 30 -40 साल तक न्याय न्याय के लिए भटकते लोगों को न्याय न मिलने के कारण न्यायपालिका की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना में विश्वास करते हैं और ऐसे में न्यायपालिका के बारे में जूनियर कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भ्रामक बातें लिखना और स्कूल जाने वाले बच्चों के मन में न्यायपालिका व अन्य संस्थाओं के बारे में भ्रम पैदा करना अत्यंत गंभीर है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)