वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

धन ऐठने का बहाना

प्रकाशित: 08-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
धन ऐठने का बहाना
मध्य-पूर्व जल रहा है तो पाकिस्तान इस अवसर का लाभ उठाने के लिए सािढय हो गया है। पाकिस्तान एक ऐसा मतलबी देश है जिसे न तो इस्लामिक देशों की सुरक्षा से कुछ लेना-देना है और न ही किसी देश के साथ रणनीतिक संबंध निभाना है। उसे तो मात्र धन ऐंठना है, वह चाहे जैसे हो। ईरान पर इजरायल और अमेरिकी हमले के बाद ईरानी फौज ने अमेरिकी ठिकानों को खोज-खोज कर अपने ड्रोनों और मिसाइलों से निशाना बनाया। जाहिर सी बात है कि ईरानी गोली का प्रहार इस्लामिक देशों पर ही हुआ। इससे सऊदी अरब, यूएई, ओमान आदि देशों का आग बबूला होना स्वाभाविक है। पाकिस्तान इन देशों की नाराजगी से उत्पन्न परिस्थिति का लाभ उठाने की तरकीब खोज रहा है। इसलिए अब एक ‘इस्लामिक नाटो' बनाने के उद्देश्य से शनिवार को पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने सऊदी अरब का दौरा किया और वहां के सैन्य अधिकारियों एवं सुत्लान सलमान को ईरान द्वारा किए गए ताजे हमलों का जवाब देने के लिए इस्लामिक नाटो के फायदे गिनाए। सऊदी अरब हो या दूसरे अरब मुल्क उनकी प्रवृत्ति ही है कि उन्हें कुछ न करना पड़े भले ही उनसे धन कोई ले ले। अरब मुल्कों के इसी आलसी चरित्र का लाभ उठाकर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टों ने इस्लामिक बम बना लिया और इसी चरित्र का लाभ उठाकर वह इस्लामिक बैंक बनाने की तैयारी में जुटे थे। लेकिन जनरल जिया ने उनका तख्ता पलटकर उन्हें फांसी पर चढ़वा दिया, इसलिए उनकी यह योजना धरी की धरी रह गई। अब पाकिस्तान सुरक्षा को लेकर इस्लामिक नाटो की जो अवधारणा लेकर आया है, वह नाटो चार्टर के आर्टिकल 5 जैसे प्रावधान से प्रेरित है जिसके मुताबिक किसी एक देश पर हमला किए जाने पर पूरे नाटो संगठन के देश मानेंगे कि हमला उन्हीं पर है।
वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान धन की जुगाड़ में इस तरह के नकली जुगाड़ करता रहता है। अभी 2025 में ही तो उसने सऊदी अरब से समझौता किया है कि दोनों देशों में से किसी भी देश पर हमला हुआ तो दूसरा देश उस हमले को अपने ऊपर हमला मानकर मदद करेगा। अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संपन्न हुए सुरक्षा समझौते की हकीकत देखिए। आए दिन पाकिस्तान के फौजी ठिकाने और उसके हवाई अड्डों पर अफगानी तालिबान हमले कर रहे हैं किन्तु संधि की शर्तों के मुकाबले सऊदी अरब को चाहिए था कि वह पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए तालिबान पर हमला कर देता। किन्तु अफगानिस्तान ने कुछ बोला ही नहीं, इसी तरह अभी ईरान से अन्य अरब के देशों की तरह ही जब सऊदी अरब पर भी हमले किए तो ईरान पर हमला करने का न तो पाकिस्तान को कर्तव्य बोध हुआ कि वह ईरानी हमले के खिलाफ कार्रवाई करे और न तो उसने ईरान के हमले के खिलाफ कोई बयानबाजी की। अब वह इस्लामिक नाटो का चूरन लेकर अपने सेठ सलमान के पास पहुंच गया।
बहरहाल पाकिस्तान की मित्रता के नाम पर मात्र धन ऐंठने का इतिहास रहा है अन्यथा दुनिया जानती है कि जब नाटो की मूल अवधारणा ही धराशाही हो गई तो उसकी तर्ज पर बनने वाले किसी भी मजहबी भावना वाले सुरक्षा संगठन के भविष्य का भला इस बात के कि जनरल आसिम मुनीर इस्लामिक देशों से धन उगाही के जुगाड़ में सऊदी अरब गए हैं, क्या टिप्पणी या अनुमान लगाया जा सकता है।