भारत-चीन सीमा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी चर्चा होनी चाहिए
प्रकाशित: 03-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
कर्नल शिवदान सिंह
(सेवानिवृत्त)
लोकसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जन नरवाने की प्रकाशित नहीं हुई पुस्तक को सदन में लहराते हुए मौजूदा सरकार को निर्णय लेने में अक्षम बताने की कोशिश की है। 2020 में गलवान संघर्ष के समय लद्दाख के कैलाश क्षेत्र में कुछ चीनी टैंकोग् की हरकत देखी गई जिसके बारे में सेना प्रमुख ने सरकार से इनके विरुद्ध कार्रवाई के बारे में जानने की कोशिश की जिसके उत्तर में जैसा कि पिछले लंबे समय से सरकार ने सेना को देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की पुरी छूट दी हुई है उसी प्रकार सरकार ने सेना प्रमुख को बताया कि जो उन्हें जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए सेना ने कोई अतिरिक्त संसाधन या गोला बारूद की मांग सरकार से नहीं की थी तो इससे साफ हो जाता है कि इसमें विवाद या सरकार की निपियता कहीं भी नजर नहीं आ रही है। इसी प्रकार कुछ राजनीतिक दल सेना और सरकार की कामयाबी को कम दिखाने के प्रयास में ऑपरेशन सिंदूर और 2016 में जम्मू कश्मीर के ऊरी क्षेत्र में पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी कैंपों पर भारतीय सेना के द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक का भी प्रूफ मांग रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि हमारी सेना ने सफलता पूर्वक पाकिस्तान में लश्करे तैयबा के 11 कैंप और वहां के पांच हवाई अड्डओ पर हमला करके उनको बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान इसके जवाब में हमारे देश का बाल बांका भी नहीं कर सका। उसके ड्रोनों और मिसाइलो को हमारा अभेद एयर डिफेंस सिस्टम सीमा में घुसने से पहले ही बर्बाद कर देता था। इसलिए दुनिया की प्रेस किसी भी भारत के नुकसान का फोटो विश्व पटल पर नहीं रख सकी। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सफलता को देखते हुए विश्व के 135 देशों ने भारत के ऑपरेशन की सराहना की थी। इस सब के बावजूद भी हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल सेना की इन सफलताओं को भी स्वीकार नहीं करके सेना के मनोबल को गिराने का प्रयास करते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नकारात्मक है।
लद्दाख क्षेत्र और चीन के बारे में प्रश्न करने वालों को इस विषय पर भी विचार करना चाहिए की 1962 के युद्ध में भारत की हार और उसके 38000 वर्ग किलो मीटर सियाचिन क्षेत्र को चीनी सेना ने किन कारणों से कब्जे में कर लिया था। 1950 के दशक में चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसी के अंतर्गत चीन ने 1955 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया तथा उसके साथ-साथ सीमावर्ती भूटान नेपाल और भारत के क्षेत्र की तरफ भी अपनी सैनिक गतिविधि बढ़ाने शुरू कर दी थी। चीन के इस कब्जे को विश्व पटल पर उचित तथा न्याय संगत ठहरने के लिए भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को उचित ठहराते हुए उसे मान्यता प्रदान कर दी और तिब्बत को चीन के भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद चीन न sतिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र से सियाचिन होकर एक सड़क बननी शुरू कर दी जिससे उसकी गतिविधियां भारतीय सीमा तक बढ़ गई। 1958 तक चीन काफी आाढामक मूड में भारतीय सीमा की तरफ बढ़ने लगा। इसको देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने चीन की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेमन को पेश करते हुए सेना के लिए आधुनिक हथियार और गोला बारूद के लिए धन की मांग की जिससे चीनी सेना का मुकाबला किया जा सके। परंतु उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने नहीं माना तथा प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा कि हमने चीन के साथ पंचशील संधि की है जिसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। जब काफी प्रयासों के बाद भी नेहरू ने अपना निर्णय न बदलते हुए सेना बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की इससे निराश होकर जन0 थीमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिसको भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद जन0 ने सेना की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद करते हुए सेना के संचालन से दूरी बना ली। इसके बाद बिना किसी कारण के चीनी सेना ने अक्टूबर 1962 में लद्दाख नेफा और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर आधुनिक हथियारों से हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास उस समय केवल बोल्ट एक्सन राइफल थी जिससे चीनी सेना की आधुनिक हथियारों का मुकाबला असंभव था। इसके अलावा भारत - चीन सीमा तक भारतीय क्षेत्र में संचार के साधन सड़क इत्यादि बिल्कुल नहीं थे इसके कारण सेना को समय पर सहायता भेजा जाना असंभव था। इसके बावजूद भी भारतीय सेवा ने बहादुरी सेचीनी हमले का मुकाबला किया और इसी हमले में लद्दाख के रेजांगला की सुरक्षा में तैनात में मेजर शैतान सिंह ने अपने 110 सैनिकों के साथ दुश्मन के 1200 सैनिकों का मुकाबला बहादुर से किया। जब उनकी रायफलों की गोलियां समाप्त हो गई और पीछे से कोई मदद की आशा नहीं थी नहीं थी। तब उस स्थिति में शैतान सिंह ने पीछे भागने के स्थान पर दुश्मन का मुकाबला राइफल की संगिनो से करने का निश्चय करके अपने सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया। जिसमें एक-एक भारतीय सैनिक ने चीन के 10-10 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और। चीन के इस हमले को नाकाम कर दिया। इस युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उसके सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। उस समय संचार व्यवस्था का इतना बुरा हाल था कि इन सैनिकों के मृत शरीरों की जानकारी पूरे 40 दिन के बाद उस समय प्राप्त हुईजब एक चरवाहा अपनी भेडॉ को चराते हुए उस क्षेत्र में गया और उसने वहां पर इन सैनिकों के शव और चीनी सैनिकों के शव चारों तरफ बिखरे हुए देखे। इसकी सूचना उसने फौरन सेना को दी तब उनकी वीरता की कहानी देश को पता चली और उनके शरीरों का अंतिम संस्कार किया जा सका। इसी ाढम में चीन ने 1967 में देश के मुख्य भाग को उत्तर पूर्वी राज्यों से से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहे जाने क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई जिसके द्वारा वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों पर कब्जा करना चाह रहा था। इसके लिए चीन ने अपनी आाढामक करवाई सिक्किम की सीमाओं पर शुरू कर दी। इसकी जानकार सिक्किम क्षेत्र के जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने सेना मुख्यालय तक पहुंचा दी थी। इस पर जन0 सागत सिंह को भारत सरकार के निर्देश सेना मुख्यालय के द्वारा प्राप्त हुये कि वे चीन के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तथा सीमाओं से 1000 मीटर पीछे हटकर मोर्चा संभालेंगे। इस प्रकार 1962 के युद्ध की तरह ही चीन को भारत सरकार पूरा मौका भारत में अंदर प्रवेश करने का दे रही थी परंतु जन0 सगत सिंह ने इस आदेश का पालन नहीं किया तथा अपने सैनिकों को और भी मजबूती से नाथुला और उसके आसपास तैनात कर दिया। जब चीन ने सितंबर 1967 में नाथुला पर हमला किया तो जन0 सगतसिंह स्वयं अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पीछे जाकर पोजीशन संभाली और घोषणा करवा दी की जो भी भारतीय सैनिक मोर्चे से पीछे भागेगा उसकी हत्या वे स्वयं वे गोली मारकर करेंगे। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों का मनोबल इतना बढ़ाया कि भारतीय सैनिकों ने चीनी हमले को नाकाम करते हुए उसके सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार देखा जा सकता है की 1962 की हार और 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में जाने के लिए किसी हद तक केवल भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। क्योंकि उसने भारतीय सेना को उचित गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जिसके कारण भारतीय सेना चीनी सेना का मुकाबला नहीं कर पाई। इसके अतिरिक्त चीन के साथ लगने वाली उत्तर पूर्वी सीमाओं और लद्दाख क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचा जैसे सड़क इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके कारण समय से सेना के लिए उचित सहायता समय से नहीं पहुंच सकी।
विश्व में चीन की गतिविधियों और उसकी चालों को समझ कर भारत सरकार ने चीन की हर चाल को नाकाम करने के लिए उत्तर पूर्वी तथा लद्दाख सीमा तक संचार व्यवस्था जैसे राजमार्ग तथा हवाई अड्डे बना दिए हैं। यह राजमार्ग इतनी क्षमता के हैं कि उनके द्वारा सेना के लड़ाकू टैंक भी शीघ्रता से सीमा तक पहुंच कर चीनी हमलों को नाकाम करके चीन के अंदर तक मार कर सकते हैं। इसके लिए उत्तरपूर्व की सीमाओं के लिए स्ट्राइक कोर का गठन किया गया है जिसमें लड़ाकू टैंक होते हैं। 1962 के युद्ध में लड़ाकू विमान का प्रयोग चीनी हमले के विरुद्ध नहीं किया गया था। जिसका मुख्य कारण था किउस क्षेत्र में इन विमानो केउतरने और उड़ान भरने कीसुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसको देखते हुए अब अकेले लद्दाख क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चार हवाई अड्डे- थोयस, लेह, नियोमा तथा कारगिल में स्थापित कर दिए गए हैं। जिनसे आधुनिक राफेल विमान दुश्मन पर मार कर सकेंगे। इसके साथ ही चीन से लगती सभी सीमाओं पर आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त सैनिक तैनात किए गए हैं। जिससे चीन अपनी संख्या से हमारे सैनिकों को हराने का प्रयास न कर सके। इस सबके साथ अब 1962 और 1967 जैसी स्थिति नहीं है जिसमें जन सगत सिंह को नाथुला की सुरक्षा से पीछे हटने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिए थे। आज की स्थिति में एक सैनिक कमांडर को सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिए भारत सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती है। आज के समय में सैनिक कमांडर सीमा को सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में स्वतंत्र हैजैसा की जन0 नरवाने ने स्वयं की अपनी पुस्तक में लिखा है। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व देखते हुए उन्होंने बांग्लादेश में भी इसके समानांतर एक कॉरिडोर निर्माण का वादा किया है। जिसके द्वारा के भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ संपर्क हर स्थिति में बना रहे। यदि 1967 में जन सगतसिंह केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार कार्रवाई करते तो आज हो सकता है यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर और हमारे उत्तर पूर्व के 7। राज्य भारत का हिस्सा ना होते। इसलिए आज के समय में देश की सीमाओं की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम भारत सरकार ने थल, जल और वायु में कर दिया है। इसलिए अब चीन भारत को पहले जैसी धमकियां और आंखें नहीं दिख रहा है बल्कि वह भारत के साथ हर तरह के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के लिए तैयार है।
(सेवानिवृत्त)
लोकसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जन नरवाने की प्रकाशित नहीं हुई पुस्तक को सदन में लहराते हुए मौजूदा सरकार को निर्णय लेने में अक्षम बताने की कोशिश की है। 2020 में गलवान संघर्ष के समय लद्दाख के कैलाश क्षेत्र में कुछ चीनी टैंकोग् की हरकत देखी गई जिसके बारे में सेना प्रमुख ने सरकार से इनके विरुद्ध कार्रवाई के बारे में जानने की कोशिश की जिसके उत्तर में जैसा कि पिछले लंबे समय से सरकार ने सेना को देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की पुरी छूट दी हुई है उसी प्रकार सरकार ने सेना प्रमुख को बताया कि जो उन्हें जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए सेना ने कोई अतिरिक्त संसाधन या गोला बारूद की मांग सरकार से नहीं की थी तो इससे साफ हो जाता है कि इसमें विवाद या सरकार की निपियता कहीं भी नजर नहीं आ रही है। इसी प्रकार कुछ राजनीतिक दल सेना और सरकार की कामयाबी को कम दिखाने के प्रयास में ऑपरेशन सिंदूर और 2016 में जम्मू कश्मीर के ऊरी क्षेत्र में पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी कैंपों पर भारतीय सेना के द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक का भी प्रूफ मांग रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि हमारी सेना ने सफलता पूर्वक पाकिस्तान में लश्करे तैयबा के 11 कैंप और वहां के पांच हवाई अड्डओ पर हमला करके उनको बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान इसके जवाब में हमारे देश का बाल बांका भी नहीं कर सका। उसके ड्रोनों और मिसाइलो को हमारा अभेद एयर डिफेंस सिस्टम सीमा में घुसने से पहले ही बर्बाद कर देता था। इसलिए दुनिया की प्रेस किसी भी भारत के नुकसान का फोटो विश्व पटल पर नहीं रख सकी। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सफलता को देखते हुए विश्व के 135 देशों ने भारत के ऑपरेशन की सराहना की थी। इस सब के बावजूद भी हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल सेना की इन सफलताओं को भी स्वीकार नहीं करके सेना के मनोबल को गिराने का प्रयास करते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नकारात्मक है।
लद्दाख क्षेत्र और चीन के बारे में प्रश्न करने वालों को इस विषय पर भी विचार करना चाहिए की 1962 के युद्ध में भारत की हार और उसके 38000 वर्ग किलो मीटर सियाचिन क्षेत्र को चीनी सेना ने किन कारणों से कब्जे में कर लिया था। 1950 के दशक में चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसी के अंतर्गत चीन ने 1955 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया तथा उसके साथ-साथ सीमावर्ती भूटान नेपाल और भारत के क्षेत्र की तरफ भी अपनी सैनिक गतिविधि बढ़ाने शुरू कर दी थी। चीन के इस कब्जे को विश्व पटल पर उचित तथा न्याय संगत ठहरने के लिए भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को उचित ठहराते हुए उसे मान्यता प्रदान कर दी और तिब्बत को चीन के भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद चीन न sतिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र से सियाचिन होकर एक सड़क बननी शुरू कर दी जिससे उसकी गतिविधियां भारतीय सीमा तक बढ़ गई। 1958 तक चीन काफी आाढामक मूड में भारतीय सीमा की तरफ बढ़ने लगा। इसको देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने चीन की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेमन को पेश करते हुए सेना के लिए आधुनिक हथियार और गोला बारूद के लिए धन की मांग की जिससे चीनी सेना का मुकाबला किया जा सके। परंतु उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने नहीं माना तथा प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा कि हमने चीन के साथ पंचशील संधि की है जिसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। जब काफी प्रयासों के बाद भी नेहरू ने अपना निर्णय न बदलते हुए सेना बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की इससे निराश होकर जन0 थीमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिसको भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद जन0 ने सेना की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद करते हुए सेना के संचालन से दूरी बना ली। इसके बाद बिना किसी कारण के चीनी सेना ने अक्टूबर 1962 में लद्दाख नेफा और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर आधुनिक हथियारों से हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास उस समय केवल बोल्ट एक्सन राइफल थी जिससे चीनी सेना की आधुनिक हथियारों का मुकाबला असंभव था। इसके अलावा भारत - चीन सीमा तक भारतीय क्षेत्र में संचार के साधन सड़क इत्यादि बिल्कुल नहीं थे इसके कारण सेना को समय पर सहायता भेजा जाना असंभव था। इसके बावजूद भी भारतीय सेवा ने बहादुरी सेचीनी हमले का मुकाबला किया और इसी हमले में लद्दाख के रेजांगला की सुरक्षा में तैनात में मेजर शैतान सिंह ने अपने 110 सैनिकों के साथ दुश्मन के 1200 सैनिकों का मुकाबला बहादुर से किया। जब उनकी रायफलों की गोलियां समाप्त हो गई और पीछे से कोई मदद की आशा नहीं थी नहीं थी। तब उस स्थिति में शैतान सिंह ने पीछे भागने के स्थान पर दुश्मन का मुकाबला राइफल की संगिनो से करने का निश्चय करके अपने सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया। जिसमें एक-एक भारतीय सैनिक ने चीन के 10-10 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और। चीन के इस हमले को नाकाम कर दिया। इस युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उसके सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। उस समय संचार व्यवस्था का इतना बुरा हाल था कि इन सैनिकों के मृत शरीरों की जानकारी पूरे 40 दिन के बाद उस समय प्राप्त हुईजब एक चरवाहा अपनी भेडॉ को चराते हुए उस क्षेत्र में गया और उसने वहां पर इन सैनिकों के शव और चीनी सैनिकों के शव चारों तरफ बिखरे हुए देखे। इसकी सूचना उसने फौरन सेना को दी तब उनकी वीरता की कहानी देश को पता चली और उनके शरीरों का अंतिम संस्कार किया जा सका। इसी ाढम में चीन ने 1967 में देश के मुख्य भाग को उत्तर पूर्वी राज्यों से से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहे जाने क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई जिसके द्वारा वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों पर कब्जा करना चाह रहा था। इसके लिए चीन ने अपनी आाढामक करवाई सिक्किम की सीमाओं पर शुरू कर दी। इसकी जानकार सिक्किम क्षेत्र के जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने सेना मुख्यालय तक पहुंचा दी थी। इस पर जन0 सागत सिंह को भारत सरकार के निर्देश सेना मुख्यालय के द्वारा प्राप्त हुये कि वे चीन के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तथा सीमाओं से 1000 मीटर पीछे हटकर मोर्चा संभालेंगे। इस प्रकार 1962 के युद्ध की तरह ही चीन को भारत सरकार पूरा मौका भारत में अंदर प्रवेश करने का दे रही थी परंतु जन0 सगत सिंह ने इस आदेश का पालन नहीं किया तथा अपने सैनिकों को और भी मजबूती से नाथुला और उसके आसपास तैनात कर दिया। जब चीन ने सितंबर 1967 में नाथुला पर हमला किया तो जन0 सगतसिंह स्वयं अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पीछे जाकर पोजीशन संभाली और घोषणा करवा दी की जो भी भारतीय सैनिक मोर्चे से पीछे भागेगा उसकी हत्या वे स्वयं वे गोली मारकर करेंगे। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों का मनोबल इतना बढ़ाया कि भारतीय सैनिकों ने चीनी हमले को नाकाम करते हुए उसके सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार देखा जा सकता है की 1962 की हार और 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में जाने के लिए किसी हद तक केवल भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। क्योंकि उसने भारतीय सेना को उचित गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जिसके कारण भारतीय सेना चीनी सेना का मुकाबला नहीं कर पाई। इसके अतिरिक्त चीन के साथ लगने वाली उत्तर पूर्वी सीमाओं और लद्दाख क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचा जैसे सड़क इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके कारण समय से सेना के लिए उचित सहायता समय से नहीं पहुंच सकी।
विश्व में चीन की गतिविधियों और उसकी चालों को समझ कर भारत सरकार ने चीन की हर चाल को नाकाम करने के लिए उत्तर पूर्वी तथा लद्दाख सीमा तक संचार व्यवस्था जैसे राजमार्ग तथा हवाई अड्डे बना दिए हैं। यह राजमार्ग इतनी क्षमता के हैं कि उनके द्वारा सेना के लड़ाकू टैंक भी शीघ्रता से सीमा तक पहुंच कर चीनी हमलों को नाकाम करके चीन के अंदर तक मार कर सकते हैं। इसके लिए उत्तरपूर्व की सीमाओं के लिए स्ट्राइक कोर का गठन किया गया है जिसमें लड़ाकू टैंक होते हैं। 1962 के युद्ध में लड़ाकू विमान का प्रयोग चीनी हमले के विरुद्ध नहीं किया गया था। जिसका मुख्य कारण था किउस क्षेत्र में इन विमानो केउतरने और उड़ान भरने कीसुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसको देखते हुए अब अकेले लद्दाख क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चार हवाई अड्डे- थोयस, लेह, नियोमा तथा कारगिल में स्थापित कर दिए गए हैं। जिनसे आधुनिक राफेल विमान दुश्मन पर मार कर सकेंगे। इसके साथ ही चीन से लगती सभी सीमाओं पर आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त सैनिक तैनात किए गए हैं। जिससे चीन अपनी संख्या से हमारे सैनिकों को हराने का प्रयास न कर सके। इस सबके साथ अब 1962 और 1967 जैसी स्थिति नहीं है जिसमें जन सगत सिंह को नाथुला की सुरक्षा से पीछे हटने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिए थे। आज की स्थिति में एक सैनिक कमांडर को सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिए भारत सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती है। आज के समय में सैनिक कमांडर सीमा को सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में स्वतंत्र हैजैसा की जन0 नरवाने ने स्वयं की अपनी पुस्तक में लिखा है। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व देखते हुए उन्होंने बांग्लादेश में भी इसके समानांतर एक कॉरिडोर निर्माण का वादा किया है। जिसके द्वारा के भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ संपर्क हर स्थिति में बना रहे। यदि 1967 में जन सगतसिंह केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार कार्रवाई करते तो आज हो सकता है यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर और हमारे उत्तर पूर्व के 7। राज्य भारत का हिस्सा ना होते। इसलिए आज के समय में देश की सीमाओं की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम भारत सरकार ने थल, जल और वायु में कर दिया है। इसलिए अब चीन भारत को पहले जैसी धमकियां और आंखें नहीं दिख रहा है बल्कि वह भारत के साथ हर तरह के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के लिए तैयार है।