राष्ट्रवाद, एकात्मता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रणेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
प्रकाशित: 23-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
सौरभ वार्ष्णेय
यह सत्य है कि कुछ महापुरुष कुछ समय के लिए पृथ्वी अवतरित होकर इस जग के लिए महान कार्य कर कालजयी हो जाते हैं ऐसे ही एक महापुरुष हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हुए जिनकी आज 23 जून 2026 को पुण्यतिथि है। हम श्री मुखर्जी को एक राजनीतिक घटना से ही याद नहीं करते वरन उनके महान कार्यों के लिए उन्हें याद करेंगे। भारतीय जनसंघ के गठन से उनकी विरासत सदा सदा के लिए अमर हो गई। 23 जून भारतीय राजनीति और राष्ट्र जीवन में एक महत्वपूर्ण तिथि है। इसी दिन देश के प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, शिक्षाविद्, स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि मनाई जाती है। वर्ष 1953 में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार, संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण आज भी भारतीय राजनीति और समाज को प्रेरित करते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने का उदाहरण रहा। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता के सबसे युवा कुलपति बने। शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में उनका योगदान असाधारण रहा। स्वतंत्रता के बाद वे देश की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हुए, लेकिन राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर मतभेद होने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना उचित समझा। यह उनके सिद्धांतवादी व्यक्तित्व का प्रमाण था। डॉ. मुखर्जी का सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरुद्ध था। उनका प्रसिद्ध नारा-एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे-राष्ट्रीय एकता की उनकी सोच को दर्शाता है। उनका मानना था कि भारत की संप्रभुता और अखंडता सर्वोपरि है तथा किसी भी राज्य के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था दीर्घकाल में राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं हो सकती।
भारतीय जनसंघ के गठन से अमर हुई विरासत - वर्ष 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। आज की भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक जड़ें भारतीय जनसंघ में ही देखी जाती हैं। संगठन निर्माण, वैचारिक स्पष्टता और लोकतांत्रिक संघर्ष की जो परंपरा उन्होंने स्थापित की, वह आज भी भारतीय राजनीति में प्रभावी दिखाई देती है। हालांकि डॉ. मुखर्जी के विचारों और नीतियों पर समय-समय पर मतभेद भी रहे हैं। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि विभिन्न विचारधाराएं अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं और जनता उनके आधार पर निर्णय लेती है। लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात निर्भीकता से रखी और सिद्धांतों के लिए राजनीतिक जोखिम उठाने से कभी पीछे नहीं हटे। आज जब देश अनेक सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि हमें यह संदेश देती है कि राष्ट्रहित, लोकतांत्रिक मूल्यों, वैचारिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र निर्माण का साधन है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि केवल एक महान नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों और विचारों पर गंभीर चिंतन का भी समय है। राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के प्रति उनका योगदान भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। राष्ट्र उनके प्रति कृतज्ञ है और आने वाली पीढ्यां उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।
21 अक्टूबर 1951 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसी दिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीके नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। यह केवल एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत में वैचारिक राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। डॉ. मुखर्जी एक प्रखर राष्ट्रवादी, शिक्षाविद् और दूरदर्शी राजनेता थे। उन्होंने उस समय की सत्ता की नीतियों से वैचारिक मतभेद होने पर सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय एक नए राजनीतिक विकल्प की स्थापना का मार्ग चुना। भारतीय जनसंघ का उद्देश्य राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को केंद्र में रखकर राजनीति करना था। 21 अक्टूबर 1951 को स्थापित भारतीय जनसंघ ने धीरे-धीरे देश की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। डॉ. मुखर्जी ने एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे का नारा देकर राष्ट्रीय एकीकरण का संदेश दिया। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरोध में उनका संघर्ष आज भी याद किया जाता है। यद्यपि 1953 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और राजनीतिक दृष्टि जीवित रहे। जनसंघ आगे चलकर 1977 में जनता पार्टी का हिस्सा बना और 1980 में भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ। आज देश की राजनीति में जिस वैचारिक धारा का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, उसकी नींव डॉ. मुखर्जी ने ही रखी थी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना करके डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय राजनीति को एक स्थायी वैचारिक दिशा दी और स्वयं को इतिहास में कालजयी बना लिया। उनका जीवन राष्ट्रहित, सिद्धांतनिष्ठा और जनसेवा का प्रेरणादायी उदाहरण है।
एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे - एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारत की एकता, अखंडता और संवैधानिक समानता का प्रबल उद्घोष था। यह उद्घोष भारत के महान राष्ट्रवादी नेता डॉ. मुखर्जी ने उस समय दिया था, जब जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक प्रावधानों के तहत अलग दर्जा प्राप्त था। आज उनकी पुण्यतिथि पर यह नारा भारतीय राजनीति और राष्ट्रवाद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रधानमंत्री (वजीर-ए-आजम) की व्यवस्था थी। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि यह व्यवस्था भारत की राष्ट्रीय एकता की भावना के विपरीत है। उनका तर्क था कि यदि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो वहां के नागरिकों को भी वही संवैधानिक व्यवस्था प्राप्त होनी चाहिए जो देश के अन्य राज्यों में लागू है। इसी विचार को लेकर उन्होंने 1953 में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय राज्य में प्रवेश के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। डॉ. मुखर्जी ने इसका विरोध करते हुए बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया और उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए बलिदान देने वाले नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
डॉ. मुखर्जी के इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। उनके द्वारा स्थापित भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लंबे समय तक जीवित रखा। बाद में यही विचारधारा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख संकल्पों में शामिल रही। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने के निर्णय को अनेक लोग डॉ. मुखर्जी के सपने की पूर्ति के रूप में देखते हैं।हालांकि इस विषय पर राजनीतिक मतभेद भी रहे हैं। कुछ लोगों का मानना था कि विशेष दर्जा जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट परिस्थितियों और पहचान की रक्षा के लिए आवश्यक था। लोकतंत्र में विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन यह भी सत्य है कि राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक समानता का प्रश्न सदैव महत्वपूर्ण बना रहेगा।
आज जब भारत एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को सशक्त बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का यह नारा और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, समान अधिकारों और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
डॉ. मुखर्जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति निष्ठा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने का सर्वोत्तम तरीका यही है कि हम भारत की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक आदर्शों को और अधिक मजबूत बनाने का संकल्प लें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।)
यह सत्य है कि कुछ महापुरुष कुछ समय के लिए पृथ्वी अवतरित होकर इस जग के लिए महान कार्य कर कालजयी हो जाते हैं ऐसे ही एक महापुरुष हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हुए जिनकी आज 23 जून 2026 को पुण्यतिथि है। हम श्री मुखर्जी को एक राजनीतिक घटना से ही याद नहीं करते वरन उनके महान कार्यों के लिए उन्हें याद करेंगे। भारतीय जनसंघ के गठन से उनकी विरासत सदा सदा के लिए अमर हो गई। 23 जून भारतीय राजनीति और राष्ट्र जीवन में एक महत्वपूर्ण तिथि है। इसी दिन देश के प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, शिक्षाविद्, स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि मनाई जाती है। वर्ष 1953 में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार, संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण आज भी भारतीय राजनीति और समाज को प्रेरित करते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने का उदाहरण रहा। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता के सबसे युवा कुलपति बने। शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में उनका योगदान असाधारण रहा। स्वतंत्रता के बाद वे देश की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हुए, लेकिन राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर मतभेद होने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना उचित समझा। यह उनके सिद्धांतवादी व्यक्तित्व का प्रमाण था। डॉ. मुखर्जी का सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरुद्ध था। उनका प्रसिद्ध नारा-एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे-राष्ट्रीय एकता की उनकी सोच को दर्शाता है। उनका मानना था कि भारत की संप्रभुता और अखंडता सर्वोपरि है तथा किसी भी राज्य के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था दीर्घकाल में राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं हो सकती।
भारतीय जनसंघ के गठन से अमर हुई विरासत - वर्ष 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। आज की भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक जड़ें भारतीय जनसंघ में ही देखी जाती हैं। संगठन निर्माण, वैचारिक स्पष्टता और लोकतांत्रिक संघर्ष की जो परंपरा उन्होंने स्थापित की, वह आज भी भारतीय राजनीति में प्रभावी दिखाई देती है। हालांकि डॉ. मुखर्जी के विचारों और नीतियों पर समय-समय पर मतभेद भी रहे हैं। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि विभिन्न विचारधाराएं अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं और जनता उनके आधार पर निर्णय लेती है। लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात निर्भीकता से रखी और सिद्धांतों के लिए राजनीतिक जोखिम उठाने से कभी पीछे नहीं हटे। आज जब देश अनेक सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि हमें यह संदेश देती है कि राष्ट्रहित, लोकतांत्रिक मूल्यों, वैचारिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र निर्माण का साधन है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि केवल एक महान नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों और विचारों पर गंभीर चिंतन का भी समय है। राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के प्रति उनका योगदान भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। राष्ट्र उनके प्रति कृतज्ञ है और आने वाली पीढ्यां उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।
21 अक्टूबर 1951 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसी दिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीके नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। यह केवल एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत में वैचारिक राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। डॉ. मुखर्जी एक प्रखर राष्ट्रवादी, शिक्षाविद् और दूरदर्शी राजनेता थे। उन्होंने उस समय की सत्ता की नीतियों से वैचारिक मतभेद होने पर सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय एक नए राजनीतिक विकल्प की स्थापना का मार्ग चुना। भारतीय जनसंघ का उद्देश्य राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को केंद्र में रखकर राजनीति करना था। 21 अक्टूबर 1951 को स्थापित भारतीय जनसंघ ने धीरे-धीरे देश की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। डॉ. मुखर्जी ने एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे का नारा देकर राष्ट्रीय एकीकरण का संदेश दिया। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरोध में उनका संघर्ष आज भी याद किया जाता है। यद्यपि 1953 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और राजनीतिक दृष्टि जीवित रहे। जनसंघ आगे चलकर 1977 में जनता पार्टी का हिस्सा बना और 1980 में भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ। आज देश की राजनीति में जिस वैचारिक धारा का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, उसकी नींव डॉ. मुखर्जी ने ही रखी थी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना करके डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय राजनीति को एक स्थायी वैचारिक दिशा दी और स्वयं को इतिहास में कालजयी बना लिया। उनका जीवन राष्ट्रहित, सिद्धांतनिष्ठा और जनसेवा का प्रेरणादायी उदाहरण है।
एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे - एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारत की एकता, अखंडता और संवैधानिक समानता का प्रबल उद्घोष था। यह उद्घोष भारत के महान राष्ट्रवादी नेता डॉ. मुखर्जी ने उस समय दिया था, जब जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक प्रावधानों के तहत अलग दर्जा प्राप्त था। आज उनकी पुण्यतिथि पर यह नारा भारतीय राजनीति और राष्ट्रवाद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रधानमंत्री (वजीर-ए-आजम) की व्यवस्था थी। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि यह व्यवस्था भारत की राष्ट्रीय एकता की भावना के विपरीत है। उनका तर्क था कि यदि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो वहां के नागरिकों को भी वही संवैधानिक व्यवस्था प्राप्त होनी चाहिए जो देश के अन्य राज्यों में लागू है। इसी विचार को लेकर उन्होंने 1953 में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय राज्य में प्रवेश के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। डॉ. मुखर्जी ने इसका विरोध करते हुए बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया और उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए बलिदान देने वाले नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
डॉ. मुखर्जी के इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। उनके द्वारा स्थापित भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लंबे समय तक जीवित रखा। बाद में यही विचारधारा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख संकल्पों में शामिल रही। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने के निर्णय को अनेक लोग डॉ. मुखर्जी के सपने की पूर्ति के रूप में देखते हैं।हालांकि इस विषय पर राजनीतिक मतभेद भी रहे हैं। कुछ लोगों का मानना था कि विशेष दर्जा जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट परिस्थितियों और पहचान की रक्षा के लिए आवश्यक था। लोकतंत्र में विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन यह भी सत्य है कि राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक समानता का प्रश्न सदैव महत्वपूर्ण बना रहेगा।
आज जब भारत एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को सशक्त बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का यह नारा और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, समान अधिकारों और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
डॉ. मुखर्जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति निष्ठा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने का सर्वोत्तम तरीका यही है कि हम भारत की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक आदर्शों को और अधिक मजबूत बनाने का संकल्प लें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।)