वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

लेबनान की आग ने अमेरिका-ईरान वार्ता पर डाले साए

प्रकाशित: 22-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
लेबनान की आग ने अमेरिका-ईरान वार्ता पर डाले साए
लगभग चार महीनों से पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हुआ प्रारंभिक समझौता (एमओयू) अब अपनी सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित वार्ता से पहले ही यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते का सबसे संवेदनशील मुद्दा-लेबनान में जारी इज़रायली सैन्य कार्रवाई और उससे जुड़ा युद्धविराम-अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। यही कारण है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास फिर से उभरता दिखाई दे रहा है।
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच एक 14-सूत्रीय समझौते की रूपरेखा तैयार की गई थी। इस ढांचे का उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की सुरक्षा पर आगे की बातचीत का मार्ग प्रशस्त करना था। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। समझौते के बाद स्विट्जरलैंड में औपचारिक वार्ता और आगे की बातचीत प्रस्तावित थी। लेकिन घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ ले लिया। लेबनान में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष फिर भड़क उठा। दोनों पक्षों के बीच हुए युद्धविराम के बावजूद रॉकेट हमले, जवाबी हवाई हमले और सीमा पर सैन्य गतिविधियां जारी रहीं। इन घटनाओं ने उस बुनियादी शर्त को कमजोर कर दिया जिस पर ईरान ने आगे की वार्ता के लिए सहमति जताई थी। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकती तो कूटनीतिक प्रक्रिया आगे बढ़ाना कठिन होगा। यही कारण है कि वार्ता की समय-सीमा और स्वरूप को लेकर अनिश्चितता बढ़ी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की यात्रा को पहले स्थगित किया गया था और बाद में नई बैठकों की तैयारी शुरू हुई। दूसरी ओर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने भी स्पष्ट संकेत दिए कि लेबनान का मुद्दा उनके लिए केवल एक क्षेत्रीय प्रश्न नहीं बल्कि भरोसे की कसौटी है। मौजूदा स्थिति में स्विट्जरलैंड एक बार फिर वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गया है। ज्यूरिख और अन्य स्विस स्थलों पर अमेरिकी, ईरानी, पाकिस्तानी और क़तरी प्रतिनिधियों की गतिविधियां तेज हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता को इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसने पहले भी संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराया था। इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा आयाम होर्मुज जलडमरूमध्य भी है। ईरान की ओर से समय-समय पर जलमार्ग बंद करने की चेतावनी और अमेरिका द्वारा समुद्री यातायात बनाए रखने की प्रतिबद्धता ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही जारी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान संकट समझौते के पूर्ण विफल होने का संकेत नहीं है। अमेरिका और ईरान दोनों ही पक्षों ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिया है कि वे वार्ता का दरवाजा बंद नहीं करना चाहते। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि लेबनान में संघर्ष जारी रहने पर किसी भी बड़े समझौते को आगे बढ़ाना बेहद कठिन होगा। कूटनीति तभी सफल हो सकती है जब जमीनी हालात उसमें सहयोग करें। इस समय दुनिया की निगाहें स्विट्जरलैंड पर टिकी हैं। वहां होने वाली बातचीत केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों को नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के भविष्य को प्रभावित कर सकती है। यदि वार्ता आगे बढ़ती है तो यह क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। यदि नहीं तो अविश्वास, सैन्य तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का नया दौर शुरू हो सकता है। फिलहाल स्थिति नाजुक है, लेकिन कूटनीति का इतिहास बताता है कि सबसे कठिन क्षणों में भी संवाद की संभावना बनी रहती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष संयम का परिचय देंगे, युद्धविराम का सम्मान करेंगे और टकराव की जगह बातचीत को प्राथमिकता देंगे। अंतत यही आशा है कि शांति, विवेक और सामान्य समझ की जीत होगी तथा क्षेत्र को स्थायी स्थिरता का मार्ग मिलेगा।
-आदित्य नरेन्द्र