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कल्याण के दिव्य सूत्रों का संग्रह है योग का अमृत कलश

प्रकाशित: 22-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
योग को भारतीय दर्शन का सबसे महात्वपूर्ण कारक माना जाता है। समूची दुनिया में परा विज्ञान की इस विधा को उसके सटीक परिणामों के कारण तेजी से स्वीकारा जा रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि योग क्या चन्द आसनों के व्यवहारिक प्रयोग तक ही सीमित है या फिर उसका विस्तार मानवीय काया के साथ-साथ अन्य कारकों को भी नियंत्रित करता है।
सनातन के प्राचीनतम वैज्ञानिक महर्षि पतंजलि ने कठिन परिश्रम करके 196 सूत्रों को खोजा और उसे प्रमुख रूप से चार भागों में विभाजित किया। पहले भाग में समाधि पाद के अन्तर्गत 51 विश्लेषण किये ताकि योग की मूल अवधारणा को स्पष्ट किया जा सके। दूसरे भाग में साधना पाद के अन्तर्गत 55 विश्लेषण किये जिसमें अष्टांग योग अर्थात योग के आठ चरण निरूपित किये गये हैं। इसमें मन और शरीर को स्वयं के नियंत्रण में रखने का विस्तार है। पहले चरण का विस्तार यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय अर्थात चोरी न करना, अपरिग्रह अर्थात संग्रह न करना और ब्रह्मचर्य के रूप किया गया है। दूसरे चरण का विस्तार नियम में शौच अर्थात पवित्रता, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान के रूप में किया गया है। तीसरे चरण का विस्तार आसन में शारीरिक स्थिरता और स्वास्थ्य के लिए विभिन्न मुद्राओं के रूप में किया गया है। चौथे चरण का विस्तार प्राणायाम में श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण और जीवन ऊर्जा को बढ़ाने के रूप में किया। पांचवे चरण का विस्तार प्रत्याहार में इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ने के रूप में किया। छठवें चरण का विस्तार धारणा में मन को किसी एक बिंदु या विषय पर केंद्रित करने के रूप में किया। सातवें चरण ध्यान में केंद्रित वस्तु या विचार का मन में निरंतर प्रवाहित होने के रूप में किया। दूसरे भाग का अन्तिम यानी आठवां चरण समाधि में ध्याता और ध्येय अर्थात ध्यान करने वाला और ईश्वर स्वयं के आपस में एकाकार हो जाने के रूप में किया।
तीसरे भाग में विभूति पाद के अन्तर्गत 56 विश्लेषण किये ताकि ध्यान और समाधि की गहराई को समझा जा सके। अन्तिम यानी चौथे भाग में कैवल्य पाद के अन्तर्गत 34 विश्लेषण किये जिसमें अस्थाई सांसारिकता से मुक्ति पाकर वास्तविकता को समझा जा सके। महर्षि पतंजलि ने अपनी खोज को केवल शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि मानव के आन्तरिक संसार की समूची शक्तियों को जागृत करने, नियंत्रित करने और उसके माध्यम से कल्याणकारी वातावरण की संरचना करने तक का विस्तार दिया है।
दुनिया भर को योग के वरदान से कल्याणकारी पथ पर अग्रसर करने हेतु भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में विस्तार से योग की व्याख्या ही नहीं की बल्कि प्रस्ताव भी रखा जिसे भारी समर्थन मिला। परिणामस्वरूप विगत 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को आधिकारिक तौर पर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया। इस प्रकार पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को आयोजित हुआ।
इस दिवस को अपनी सुविधा, ज्ञान और व्यवस्था के अनुरूप विभिन्न देश स्वीकार रहे हैं। योग की अनुसंधान स्थली यानी भारत में भी योग के सीमित स्वरूप को ही अंगीकार किया जा रहा है। अंश की आधारशिला पर समग्र का परिणाम पाने की कल्पना को कदापि उचित नहीं माना जा सकता। विराट को सूक्ष्म में प्रस्तुत करने से उसका वास्तविक अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। वर्तमान में केवल आसनों के ही चन्द चरण पूरे कराये जा रहे हैं। खड़े होकर किए जाने वाले आसनों में ताड़ासन, वृक्षासन, पादहस्तासन, अर्धचक्रासन, त्रिकोणासन हैं। बैठकर किए जाने वाले आसनों में भद्रासन, वज्रासन, अर्ध उष्ट्रासन, शशकासन, उत्तान मंडूकासन, पासन हैं। पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में मकरासन भुजंगासन, शलभासन हैं। पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में सेतुबंधासन, उत्तानपादासन, अर्ध हलासन, पवनमुक्तासन, शवासन हैं। ध्यान और प्राणायाम यानी मुद्रा सहित करने वाली क्रियाओं में कपालभाति, नाड़ीशोधन यानी अनुलोम-विलोम प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, ध्यान हैं। इन 21 मुख्य आसनों के अलावा अनेक स्थानों पर अन्य संशोधन भी देखने को मिले परन्तु विस्तार की संभावनाओं की किरण अभी भी अंधकार के आगोश में छुपी है।
महर्षि पतंजलि ने किसी विशेष आसन का नाम अपने सूत्रों में नहीं लिया परन्तु कालान्तर में अनेक शोधकर्ताओं ने अपने ज्ञान के आधार पर इसे तीन भागों में विभक्त कर दिया। ध्यानात्मक आसन, विश्रामात्मक आसन, संवर्धनात्मक आसन में वर्गीकृत करने वालों ने अनेक तर्कों, व्याख्याओं और विवेचनों का सहारा लेकर अपनी बात को पुष्ट करने का प्रयास भी किया है। इतिहास गवाह है कि सनातन के ऋषियों ने पराविज्ञान के जिन गूढ रहस्यों को सुलझाने के लिए लम्बे समय तक अनुसंधान किये, शाश्वत परिणाम प्राप्त किये और उस विधान को जनकल्याणार्थ प्रचारित भी किया था। अब उन्हीं को संकुचित किया जा रहा है।
विश्वगुरु के सिंहासन पर विराजमान देश आज लोकतंत्र के तीसरे स्तम्भ यानी कार्यपालिका के चन्द लोकसेवकों द्वारा विदेशी षड़यंत्रकारियों के इशारों पर ऐसे क्रियाकलाप किये जा रहे हैं जिससे वैभवशाली अतीत की कल्याणकारी विरासत का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाये। अपने ही देश में योग का मूल स्वरूप लगभग मृतप्राय हो चुका है। उसे आसनों तक ही सीमित कर दिया गया है। जब तक योग के सम्पूर्ण विधान की व्यवहारिक परिणति नहीं होगी तब तक कल्याण के अमृत सूत्र अपने परिणाम नहीं दे सकेंगे।