विज्ञान की उड़ान, भारत की पहचान
प्रकाशित: 28-02-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
योगेश कुमार गोयल
आज का युग विज्ञान का युग है, जहां मनुष्य कम से कम मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधाएं पाने की ख्वाहिश रखता है। अपनी इन्हीं सब ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उसने जो नए-नए आविष्कार किए हैं, सब विज्ञान की ही देन हैं। ऐसे ही अनगिनत आविष्कारों के कारण आधुनिक युग में मानव जीवन पहले से बहुत ज्यादा आरामदायक हो गया है। रेडियो से लेकर टीवी, मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट इत्यादि विज्ञान की ही ऐसी देन हैं, जिन्होंने इंसानी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। मोबाइल मैसेजिंग, व्हाट्सअप, फेसबुक इत्यादि सोशल मीडिया जैसी सुविधाओं के चलते अब कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में दूसरे व्यक्ति से पलभर में सम्पर्क करने में सक्षम है तो यह सब विज्ञान की ही बदौलत संभव हुआ है। बिजली की खोज हो या यातायात के साधनों का दुनियाभर में बिछा जाल, चिकित्सा, इंजीनियरिग, कृषि क्षेत्र इत्यादि आज लगभग हर क्षेत्र में विज्ञान का बोलबाला है। चंद घंटों में ही आज हम किसी एक स्थान से हजारों मील दूर तक का सफर तय कर सकते हैं। बिजली की खोज आधुनिक युग में विज्ञान की सबसे अहम देन मानी जा सकती है क्योंकि आज लगभग सभी कार्य बिजली के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं, फिर भले ही अखबारों या किताबों की छपाई हो या औद्योगिक इकाईयों में कामकाज अथवा घरेलू कार्य। बिजली की बदौलत ही विकास की गति कई गुना तेज हुई है और लोगों का जीवन बेहद आसान हो गया है। चिकित्सा के क्षेत्र में तो इसी विज्ञान ने ऐसी ाढांतिकारी खोजें की हैं कि अब कई असाध्य मानी जाती रही बीमारियों का इलाज तो मामूली सी गोलियों से ही हो जाता है। यहां तक कि नई-नई कोशिकाओं के निर्माण में भी सफलता प्राप्त कर ली गई है।
भारतीय समाज में विज्ञान से होने वाले लाभों और विज्ञान के जरिये लोगों में जागरूकता लाने, युवाओं में वैज्ञानिक सोच पैदा करने और छात्रों को बतौर कैरियर विज्ञान को चुनने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में एक निर्धारित थीम के जरिये ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' मनाया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026 का विषय है ‘विज्ञान में महिलाएं: विकसित भारत को उत्प्रेरित करना', जो इस ऐतिहासिक विरासत को नए आयाम देता है। देश में पहला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फरवरी 1987 को मनाया गया था। दरअसल राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने वर्ष 1986 में केन्द्र सरकार को 28 फरवरी के दिन ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाए जाने का सुझाव दिया था, जिसके बाद सरकार द्वारा उसी वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का यह प्रस्ताव स्वीकार करते हुए 28 फरवरी के दिन ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के माध्यम से युवाओं को विज्ञान के प्रति आकर्षित एवं प्रेरित करते हुए जनसाधारण को विज्ञान तथा देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाने का प्रयास किया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस महान् वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन की स्मृति में मनाया जाता है। उनकी उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज ‘रमन प्रभाव' (रमन इफैक्ट) को चिह्नित करने और विज्ञान की गति को तेज करने के लिए लोगों के दैनिक जीवन में विज्ञान के महत्व और इसके अनुप्रयोग का प्रसार करने के उद्देश्य से इस दिवस की रूपरेखा बनाई गई। सर चंद्रशेखर वेंकट रमन ने रमन इफैक्ट की खोज 28 फरवरी 1928 को की थी, जिसके लिए उन्हें भौतिकी विज्ञान के क्षेत्र में वर्ष 1930 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके द्वारा की गई खोज ‘रमन इफैक्ट' फोटोन कणों के लचीले वितरण के संबंध में है। 1920 के दशक में एक बार सीवी रमन समुद्री जहाज से भारत लौट रहे थे, तब उनकी नजर भूमध्य सागर के जल में अनोखे नीले और दूध जैसे सफेद रंग पर पड़ी। उसके बाद कोलकाता पहुंचकर उन्होंने इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस की प्रयोगशाला में काम करते हुए पार्थिव वस्तुओं में प्रकाश के बिखरने का नियमित अध्ययन शुरू कर दिया। इस पर उन्होंने सात वर्षों से भी अधिक समय तक गहन अध्ययन किया और अंतत उनकी खोज ‘रमन इफैक्ट' के नाम से 28 फरवरी 1928 को पूरी दुनिया के सामने आई।
बहरहाल, विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक सोच का प्रसार अत्यावश्यक है और राष्ट्रीय विज्ञान दिवस जैसे आयोजन निश्चित रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। विज्ञान दिवस देश में विज्ञान की निरन्तर उन्नति का आव्हान करता है। इस दिवस के जरिये लोगों को संदेश दिया जाता है कि विकास के मार्ग में विज्ञान के बगैर तेज गति से आगे बढ़ना संभव नहीं है और विज्ञान ही है, जिससे समाज में व्याप्त गलत धारणाओं और अंधविश्वासों का विनाश होता है। दरअसल समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी निर्मूल धारणाओं और अंधविश्वासों से घिरा हुआ है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिये ही ऐसे अंधविश्वासों और धारणाओं को दूर किया जाता है। विज्ञान के जरिये ही हमारे महान् वैज्ञानिक कभी असंभव माने जाने वाले कार्यों को भी संभव बनाने में सफल हुए हैं। भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में बीते कुछ दशकों में सफलता के नए-नए शिखरों को छुआ है और विज्ञान की मदद से ही कई तरह की ाढांतिकारी खोजें कर वैज्ञानिकों ने लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। विज्ञान की मदद से ही बनाई गई अनगिनत तकनीकों और वस्तुओं का इस्तेमाल हम अपने दैनिक ािढयाकलापों में आये दिन करते हैं। निसंदेह विज्ञान के द्वारा ही समाज में लोगों का जीवन स्तर आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा खुशहाल बनाया जा सकता है। विज्ञान के क्षेत्र में अब जिस प्रकार वैज्ञानिक नित नए-नए प्रयोगों के जरिये नई-नई तकनीकों का विकास करते हुए भारत को तकनीकी दृष्टि से विश्व में एक सशक्त राष्ट्र बनाने में जी-जान से जुटे हैं, उस योगदान को शब्दों में व्यक्त करना इतना आसान नहीं है। विज्ञान की मदद से ही हम कम्प्यूटर, रोबोट जैसी प्रौद्योगिकी का आविष्कार करने के साथ अंतरिक्ष में पहुंचने तक में भी सफल हुए हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत आज दुनिया के चुनिंदा ऐसे देशों में शामिल हैं, जिसने चंद्रयान और गगनयान जैसे मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और भारतीय वैज्ञानिकों की काबिलियत का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
वैसे मानव हित में विज्ञान के जितने फायदे हैं, उसके कहीं न कहीं कुछ नुकसान भी हैं और दुरूपयोग की संभावनाएं भी हैं। हमारे जीवन को सुलभ बनाने के साथ ही विज्ञान ने कई प्रकार के गंभीर रोग, प्रदूषण और खतरे भी पैदा किए हैं। नाभिकीय और परमाणवीय प्रयोगों तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्रदूषण की समस्या विकराल हो चुकी है। बिजली उत्पन्न करने के कार्य में परमाणु ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है लेकिन दूसरी ओर से इसी से निर्मित परमाणु हथियार समस्त सृष्टि से लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हो सकते हैं। बेहतर यही है कि विज्ञान का उपयोग आवश्यकता और सुविधानुसार मानवता की भलाई के लिए ही किया जाना चाहिए, न कि इसका दुरूपयोग कर इसके अविष्कारों पर प्रश्नचिन्ह लगाने की चेष्टा की जाए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
आज का युग विज्ञान का युग है, जहां मनुष्य कम से कम मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधाएं पाने की ख्वाहिश रखता है। अपनी इन्हीं सब ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उसने जो नए-नए आविष्कार किए हैं, सब विज्ञान की ही देन हैं। ऐसे ही अनगिनत आविष्कारों के कारण आधुनिक युग में मानव जीवन पहले से बहुत ज्यादा आरामदायक हो गया है। रेडियो से लेकर टीवी, मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट इत्यादि विज्ञान की ही ऐसी देन हैं, जिन्होंने इंसानी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। मोबाइल मैसेजिंग, व्हाट्सअप, फेसबुक इत्यादि सोशल मीडिया जैसी सुविधाओं के चलते अब कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में दूसरे व्यक्ति से पलभर में सम्पर्क करने में सक्षम है तो यह सब विज्ञान की ही बदौलत संभव हुआ है। बिजली की खोज हो या यातायात के साधनों का दुनियाभर में बिछा जाल, चिकित्सा, इंजीनियरिग, कृषि क्षेत्र इत्यादि आज लगभग हर क्षेत्र में विज्ञान का बोलबाला है। चंद घंटों में ही आज हम किसी एक स्थान से हजारों मील दूर तक का सफर तय कर सकते हैं। बिजली की खोज आधुनिक युग में विज्ञान की सबसे अहम देन मानी जा सकती है क्योंकि आज लगभग सभी कार्य बिजली के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं, फिर भले ही अखबारों या किताबों की छपाई हो या औद्योगिक इकाईयों में कामकाज अथवा घरेलू कार्य। बिजली की बदौलत ही विकास की गति कई गुना तेज हुई है और लोगों का जीवन बेहद आसान हो गया है। चिकित्सा के क्षेत्र में तो इसी विज्ञान ने ऐसी ाढांतिकारी खोजें की हैं कि अब कई असाध्य मानी जाती रही बीमारियों का इलाज तो मामूली सी गोलियों से ही हो जाता है। यहां तक कि नई-नई कोशिकाओं के निर्माण में भी सफलता प्राप्त कर ली गई है।
भारतीय समाज में विज्ञान से होने वाले लाभों और विज्ञान के जरिये लोगों में जागरूकता लाने, युवाओं में वैज्ञानिक सोच पैदा करने और छात्रों को बतौर कैरियर विज्ञान को चुनने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में एक निर्धारित थीम के जरिये ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' मनाया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026 का विषय है ‘विज्ञान में महिलाएं: विकसित भारत को उत्प्रेरित करना', जो इस ऐतिहासिक विरासत को नए आयाम देता है। देश में पहला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फरवरी 1987 को मनाया गया था। दरअसल राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने वर्ष 1986 में केन्द्र सरकार को 28 फरवरी के दिन ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाए जाने का सुझाव दिया था, जिसके बाद सरकार द्वारा उसी वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का यह प्रस्ताव स्वीकार करते हुए 28 फरवरी के दिन ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के माध्यम से युवाओं को विज्ञान के प्रति आकर्षित एवं प्रेरित करते हुए जनसाधारण को विज्ञान तथा देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाने का प्रयास किया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस महान् वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन की स्मृति में मनाया जाता है। उनकी उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज ‘रमन प्रभाव' (रमन इफैक्ट) को चिह्नित करने और विज्ञान की गति को तेज करने के लिए लोगों के दैनिक जीवन में विज्ञान के महत्व और इसके अनुप्रयोग का प्रसार करने के उद्देश्य से इस दिवस की रूपरेखा बनाई गई। सर चंद्रशेखर वेंकट रमन ने रमन इफैक्ट की खोज 28 फरवरी 1928 को की थी, जिसके लिए उन्हें भौतिकी विज्ञान के क्षेत्र में वर्ष 1930 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके द्वारा की गई खोज ‘रमन इफैक्ट' फोटोन कणों के लचीले वितरण के संबंध में है। 1920 के दशक में एक बार सीवी रमन समुद्री जहाज से भारत लौट रहे थे, तब उनकी नजर भूमध्य सागर के जल में अनोखे नीले और दूध जैसे सफेद रंग पर पड़ी। उसके बाद कोलकाता पहुंचकर उन्होंने इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस की प्रयोगशाला में काम करते हुए पार्थिव वस्तुओं में प्रकाश के बिखरने का नियमित अध्ययन शुरू कर दिया। इस पर उन्होंने सात वर्षों से भी अधिक समय तक गहन अध्ययन किया और अंतत उनकी खोज ‘रमन इफैक्ट' के नाम से 28 फरवरी 1928 को पूरी दुनिया के सामने आई।
बहरहाल, विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक सोच का प्रसार अत्यावश्यक है और राष्ट्रीय विज्ञान दिवस जैसे आयोजन निश्चित रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। विज्ञान दिवस देश में विज्ञान की निरन्तर उन्नति का आव्हान करता है। इस दिवस के जरिये लोगों को संदेश दिया जाता है कि विकास के मार्ग में विज्ञान के बगैर तेज गति से आगे बढ़ना संभव नहीं है और विज्ञान ही है, जिससे समाज में व्याप्त गलत धारणाओं और अंधविश्वासों का विनाश होता है। दरअसल समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी निर्मूल धारणाओं और अंधविश्वासों से घिरा हुआ है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के जरिये ही ऐसे अंधविश्वासों और धारणाओं को दूर किया जाता है। विज्ञान के जरिये ही हमारे महान् वैज्ञानिक कभी असंभव माने जाने वाले कार्यों को भी संभव बनाने में सफल हुए हैं। भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में बीते कुछ दशकों में सफलता के नए-नए शिखरों को छुआ है और विज्ञान की मदद से ही कई तरह की ाढांतिकारी खोजें कर वैज्ञानिकों ने लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। विज्ञान की मदद से ही बनाई गई अनगिनत तकनीकों और वस्तुओं का इस्तेमाल हम अपने दैनिक ािढयाकलापों में आये दिन करते हैं। निसंदेह विज्ञान के द्वारा ही समाज में लोगों का जीवन स्तर आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा खुशहाल बनाया जा सकता है। विज्ञान के क्षेत्र में अब जिस प्रकार वैज्ञानिक नित नए-नए प्रयोगों के जरिये नई-नई तकनीकों का विकास करते हुए भारत को तकनीकी दृष्टि से विश्व में एक सशक्त राष्ट्र बनाने में जी-जान से जुटे हैं, उस योगदान को शब्दों में व्यक्त करना इतना आसान नहीं है। विज्ञान की मदद से ही हम कम्प्यूटर, रोबोट जैसी प्रौद्योगिकी का आविष्कार करने के साथ अंतरिक्ष में पहुंचने तक में भी सफल हुए हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत आज दुनिया के चुनिंदा ऐसे देशों में शामिल हैं, जिसने चंद्रयान और गगनयान जैसे मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और भारतीय वैज्ञानिकों की काबिलियत का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
वैसे मानव हित में विज्ञान के जितने फायदे हैं, उसके कहीं न कहीं कुछ नुकसान भी हैं और दुरूपयोग की संभावनाएं भी हैं। हमारे जीवन को सुलभ बनाने के साथ ही विज्ञान ने कई प्रकार के गंभीर रोग, प्रदूषण और खतरे भी पैदा किए हैं। नाभिकीय और परमाणवीय प्रयोगों तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्रदूषण की समस्या विकराल हो चुकी है। बिजली उत्पन्न करने के कार्य में परमाणु ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है लेकिन दूसरी ओर से इसी से निर्मित परमाणु हथियार समस्त सृष्टि से लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हो सकते हैं। बेहतर यही है कि विज्ञान का उपयोग आवश्यकता और सुविधानुसार मानवता की भलाई के लिए ही किया जाना चाहिए, न कि इसका दुरूपयोग कर इसके अविष्कारों पर प्रश्नचिन्ह लगाने की चेष्टा की जाए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)