विदेशी फंडिंग पर शिकंजा कसते ही क्यों बेचैन हुए एनजीओ-आंदोलनकारी
प्रकाशित: 23-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अजय कुमार
भारत में विदेशी चंदे पर मोदी सरकार की सख्ती से सबसे ज्यादा बेचैनी आखिर किसे हो रही है? उन संस्थाओं को जो सचमुच गरीबों के लिए स्कूल, अस्पताल और राहत कार्य चला रही हैं या उन नेटवर्कों को जिन्हें विदेशी पैसे के सहारे भारत की नीतियों, आंदोलनों और जनमत को प्रभावित करने की आदत पड़ चुकी है? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि विदेशी फंडिंग अब केवल चैरिटी का मामला नहीं रह गई है। यह देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़ा सवाल बन चुकी है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 से 2021-22 के बीच 13,520 संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी चंदा मिला। अकेले 2021-22 में विदेशी योगदान 22,085 करोड़ रुपये से अधिक था। यानी तीन साल में 55 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी पैसा भारत आया।
अब सवाल यह है कि यह पैसा कहां से आया, किसे मिला, किस काम पर खर्च हुआ और उसका असर किस दिशा में पड़ा? किसी भी संप्रभु देश की सरकार इन सवालों से आंखें बंद नहीं कर सकती। यही वह जगह है जहां मोदी सरकार ने पुरानी व्यवस्था को चुनौती दी है।
सरकार का संदेश साफ है भारत समाजसेवा के खिलाफ नहीं है, विदेशी मदद के खिलाफ भी नहीं है, लेकिन विदेशी पैसे के नाम पर भारत की नीतियों, विकास और सामाजिक व्यवस्था में किसी बाहरी एजेंडे को घुसने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
2020 में एफसीआरए कानून में किए गए बदलावों ने इसी दिशा में बड़ा मोड़ दिया। विदेशी चंदा पाने वाली संस्थाओं के लिए एसबीआई की दिल्ली स्थित शाखा में खाता अनिवार्य किया गया। विदेशी फंड को दूसरे संगठनों को ट्रांसफर करने पर रोक लगाई गई। प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई। इसका मतलब साफ था अगर पैसा गरीबों, शिक्षा, स्वास्थ्य या राहत के नाम पर आया है तो उसका कम से कम 80 प्रतिशत उसी उद्देश्य पर खर्च होना चाहिए। विदेशी चंदे का बड़ा हिस्सा कार्यालय, यात्राओं और प्रशासनिक तंत्र में खर्च करने का दौर अब खत्म होना चाहिए।
सरकारी निगरानी का असर भी दिखाई दिया। पिछले वर्षों में हजारों संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण रद्द हुए या उनका नवीनीकरण नहीं हुआ। 15 जुलाई 2026 तक 14,449 एफसीआरए प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि 22,498 पंजीकरण रद्द और 15,212 समाप्त हो चुके थे। यह आंकड़ा बताता है कि सरकार अब केवल कागज पर मौजूद संस्थाओं को विदेशी धन का रास्ता खुला छोड़ने के मूड में नहीं है।
अब 2026 का प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन इस व्यवस्था को और कड़ा करने जा रहा है। यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाए, समाप्त हो जाए या वह समय पर नवीनीकरण न कराए, तो विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे के लिए नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है। स्कूल, अस्पताल, जमीन या कार्यालय जैसी संपत्तियां भी इसके दायरे में आ सकती हैं। यदि किसी संपत्ति में विदेशी और घरेलू दोनों पैसे लगे हैं, तो संगठन को अपने घरेलू योगदान का हिस्सा अलग से साबित करना पड़ सकता है। यही प्रावधान कुछ एनजीओ और उनके समर्थकों को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। लेकिन सवाल सीधा है अगर विदेशी पैसे से कोई संपत्ति बनाई गई है और संस्था बाद में एफसीआरए नियमों से बाहर हो जाती है, तो क्या वह विदेशी पैसे से बनी संपत्ति को हमेशा के लिए निजी संपत्ति मान सकती है? सरकार का जवाब है नहीं। विदेशी चंदे के साथ जवाबदेही भी आएगी। भारत में बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के खिलाफ हुए आंदोलनों ने इस बहस को और गंभीर बनाया है।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना से लेकर स्टरलाइट संयंत्र तक विदेशी फंडिंग और विरोध आंदोलनों के संबंधों पर सरकारी एजेंसियां सवाल उठाती रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विरोध प्रदर्शन विदेशी साजिश है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है और सरकार की नीतियों की आलोचना भी जरूरी है। लेकिन यदि किसी आंदोलन के पीछे विदेशी पैसा है, तो यह पूछना भी उतना ही जरूरी है कि पैसा किसने दिया और उसका उद्देश्य क्या था। भारत जैसे विकासशील देश में एक बड़ी बिजली परियोजना, खनन योजना, औद्योगिक संयंत्र या बुनियादी ढांचा परियोजना वर्षों तक विरोध और मुकदमों में फंसी रहती है, तो उसका नुकसान केवल सरकार को नहीं होता। निवेश रुकता है, रोजगार प्रभावित होता है, उत्पादन घटता है और अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। इसलिए सरकार का यह देखना बिल्कुल स्वाभाविक है कि आंदोलन जनहित से चल रहा है या विदेशी वित्तीय नेटवर्क से।
आज की दुनिया में प्रभाव की लड़ाई केवल सीमा पर नहीं लड़ी जाती। थिंक टैंक, विश्वविद्यालय, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सामाजिक आंदोलनों के जरिए भी किसी देश के भीतर प्रभाव पैदा किया जाता है। अमेरिका विदेशी प्रभाव को लेकर कड़े कानून रखता है। ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी प्रभाव की पारदर्शिता के लिए कानून बनाया है। चीन ने विदेशी एनजीओ पर बेहद कड़ा नियंत्रण रखा है।
यूरोप में भी विदेशी धन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर निगरानी लगातार बढ़ रही है। फिर भारत अगर अपने हितों की रक्षा करना चाहता है तो इसमें असहज होने की जरूरत किसे है?
एफसीआरए के नए नियमों ने धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए भी जवाबदेही बढ़ाई है। विदेशी फंड की अगली किस्त पाने के लिए पहले मिले फंड का कम से कम 75 प्रतिशत उपयोग करने और उसके उपयोग का प्रमाण देने जैसी शर्तें लागू की गई हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट का उपयोगिता प्रमाणपत्र, बैंक विवरण और खर्च का रिकॉर्ड जरूरी किया गया है। संस्थाओं को अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया और प्रकाशनों से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी। यानी अब विदेशी फंड लेने वाली संस्था को यह बताना होगा कि वह केवल पैसा ले नहीं रही, बल्कि उसका इस्तेमाल कहां और कैसे कर रही है। धर्मांतरण के आरोपों पर भी सरकार का रुख सख्त है।
यहां यह स्पष्ट रहना चाहिए कि हर धार्मिक संस्था या हर सामाजिक संगठन को संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता। लेकिन यदि किसी संस्था पर जबरन धर्मांतरण, फंड के निजी इस्तेमाल या विदेशी धन के गलत उद्देश्य में इस्तेमाल के आरोप हैं, तो जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? विदेशी चंदे की निगरानी को अल्पसंख्यक विरोध या लोकतंत्र विरोध बताकर जांच से बचने की कोशिश अब नहीं चलेगी।
सोनम वांगचुक से जुड़े संगठन का मामला भी इसी बहस को राजनीतिक रंग देता है। गृह मंत्रालय ने 2025 में उनके संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द किया। इसके बाद वांगचुक लद्दाख से जुड़े आंदोलनों में सािढय रहे। यहां किसी व्यक्ति की लोकप्रियता मुद्दा नहीं है। असली सवाल यह है कि जब किसी संगठन की विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई होती है, तो उससे जुड़े प्रभावशाली लोग नए आंदोलनों के जरिए किस तरह अपनी राजनीतिक और सामाजिक जमीन तलाशते हैं। इस सवाल पर बहस होनी चाहिए, न कि सवाल पूछने वालों को तुरंत लोकतंत्र विरोधी घोषित कर दिया जाए। मोदी सरकार की एफसीआरए नीति का मूल संदेश यही है कि भारत में अब समानांतर सत्ता नहीं चलेगी। न विदेशी फाउंडेशन भारत की विकास नीति तय करेंगे, न विदेशी नेटवर्क यह तय करेंगे कि किस मुद्दे पर आंदोलन खड़ा होगा और किस मुद्दे पर चुप्पी साधी जाएगी।
भारत की जनता ने सरकार चुनी है, किसी विदेशी संस्था ने नहीं। हां, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एफसीआरए कानून राजनीतिक बदले का हथियार न बने। ईमानदार संगठनों को पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था मिलनी चाहिए। अपील और न्यायिक समीक्षा की पर्याप्त गुंजाइश होनी चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विदेशी फंडिंग पर निगरानी ही खत्म कर दी जाए। भारत अब वह देश नहीं है जहां विदेशी पैसा आए, विदेशी एजेंडा बने और भारतीय जनता को केवल दर्शक बनाकर रखा जाए। भारत दुनिया से व्यापार करेगा, निवेश लेगा, दोस्ती करेगा और जरूरत पड़ने पर विदेशी सहयोग भी स्वीकार करेगा। लेकिन भारत की दिशा भारत के बाहर बैठे किसी फंडर, फाउंडेशन या नेटवर्क के हाथ में नहीं दी जाएगी।
विदेशी पैसा आए लेकिन नियमों के साथ। चैरिटी हो लेकिन पारदर्शिता के साथ। समाजसेवा हो लेकिन भारत की संप्रभुता की कीमत पर नहीं। मोदी सरकार का संदेश बिल्कुल साफ है भारत दुनिया के लिए खुला है, लेकिन भारत को चलाने का अधिकार केवल भारत के लोगों का है। और विदेशी चंदे के नाम पर भारत में समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश करने वालों के लिए अब रास्ते पहले जैसे खुले नहीं रहेंगे।
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
भारत में विदेशी चंदे पर मोदी सरकार की सख्ती से सबसे ज्यादा बेचैनी आखिर किसे हो रही है? उन संस्थाओं को जो सचमुच गरीबों के लिए स्कूल, अस्पताल और राहत कार्य चला रही हैं या उन नेटवर्कों को जिन्हें विदेशी पैसे के सहारे भारत की नीतियों, आंदोलनों और जनमत को प्रभावित करने की आदत पड़ चुकी है? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि विदेशी फंडिंग अब केवल चैरिटी का मामला नहीं रह गई है। यह देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़ा सवाल बन चुकी है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 से 2021-22 के बीच 13,520 संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी चंदा मिला। अकेले 2021-22 में विदेशी योगदान 22,085 करोड़ रुपये से अधिक था। यानी तीन साल में 55 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी पैसा भारत आया।
अब सवाल यह है कि यह पैसा कहां से आया, किसे मिला, किस काम पर खर्च हुआ और उसका असर किस दिशा में पड़ा? किसी भी संप्रभु देश की सरकार इन सवालों से आंखें बंद नहीं कर सकती। यही वह जगह है जहां मोदी सरकार ने पुरानी व्यवस्था को चुनौती दी है।
सरकार का संदेश साफ है भारत समाजसेवा के खिलाफ नहीं है, विदेशी मदद के खिलाफ भी नहीं है, लेकिन विदेशी पैसे के नाम पर भारत की नीतियों, विकास और सामाजिक व्यवस्था में किसी बाहरी एजेंडे को घुसने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
2020 में एफसीआरए कानून में किए गए बदलावों ने इसी दिशा में बड़ा मोड़ दिया। विदेशी चंदा पाने वाली संस्थाओं के लिए एसबीआई की दिल्ली स्थित शाखा में खाता अनिवार्य किया गया। विदेशी फंड को दूसरे संगठनों को ट्रांसफर करने पर रोक लगाई गई। प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई। इसका मतलब साफ था अगर पैसा गरीबों, शिक्षा, स्वास्थ्य या राहत के नाम पर आया है तो उसका कम से कम 80 प्रतिशत उसी उद्देश्य पर खर्च होना चाहिए। विदेशी चंदे का बड़ा हिस्सा कार्यालय, यात्राओं और प्रशासनिक तंत्र में खर्च करने का दौर अब खत्म होना चाहिए।
सरकारी निगरानी का असर भी दिखाई दिया। पिछले वर्षों में हजारों संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण रद्द हुए या उनका नवीनीकरण नहीं हुआ। 15 जुलाई 2026 तक 14,449 एफसीआरए प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि 22,498 पंजीकरण रद्द और 15,212 समाप्त हो चुके थे। यह आंकड़ा बताता है कि सरकार अब केवल कागज पर मौजूद संस्थाओं को विदेशी धन का रास्ता खुला छोड़ने के मूड में नहीं है।
अब 2026 का प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन इस व्यवस्था को और कड़ा करने जा रहा है। यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाए, समाप्त हो जाए या वह समय पर नवीनीकरण न कराए, तो विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे के लिए नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है। स्कूल, अस्पताल, जमीन या कार्यालय जैसी संपत्तियां भी इसके दायरे में आ सकती हैं। यदि किसी संपत्ति में विदेशी और घरेलू दोनों पैसे लगे हैं, तो संगठन को अपने घरेलू योगदान का हिस्सा अलग से साबित करना पड़ सकता है। यही प्रावधान कुछ एनजीओ और उनके समर्थकों को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। लेकिन सवाल सीधा है अगर विदेशी पैसे से कोई संपत्ति बनाई गई है और संस्था बाद में एफसीआरए नियमों से बाहर हो जाती है, तो क्या वह विदेशी पैसे से बनी संपत्ति को हमेशा के लिए निजी संपत्ति मान सकती है? सरकार का जवाब है नहीं। विदेशी चंदे के साथ जवाबदेही भी आएगी। भारत में बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के खिलाफ हुए आंदोलनों ने इस बहस को और गंभीर बनाया है।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना से लेकर स्टरलाइट संयंत्र तक विदेशी फंडिंग और विरोध आंदोलनों के संबंधों पर सरकारी एजेंसियां सवाल उठाती रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विरोध प्रदर्शन विदेशी साजिश है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है और सरकार की नीतियों की आलोचना भी जरूरी है। लेकिन यदि किसी आंदोलन के पीछे विदेशी पैसा है, तो यह पूछना भी उतना ही जरूरी है कि पैसा किसने दिया और उसका उद्देश्य क्या था। भारत जैसे विकासशील देश में एक बड़ी बिजली परियोजना, खनन योजना, औद्योगिक संयंत्र या बुनियादी ढांचा परियोजना वर्षों तक विरोध और मुकदमों में फंसी रहती है, तो उसका नुकसान केवल सरकार को नहीं होता। निवेश रुकता है, रोजगार प्रभावित होता है, उत्पादन घटता है और अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। इसलिए सरकार का यह देखना बिल्कुल स्वाभाविक है कि आंदोलन जनहित से चल रहा है या विदेशी वित्तीय नेटवर्क से।
आज की दुनिया में प्रभाव की लड़ाई केवल सीमा पर नहीं लड़ी जाती। थिंक टैंक, विश्वविद्यालय, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सामाजिक आंदोलनों के जरिए भी किसी देश के भीतर प्रभाव पैदा किया जाता है। अमेरिका विदेशी प्रभाव को लेकर कड़े कानून रखता है। ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी प्रभाव की पारदर्शिता के लिए कानून बनाया है। चीन ने विदेशी एनजीओ पर बेहद कड़ा नियंत्रण रखा है।
यूरोप में भी विदेशी धन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर निगरानी लगातार बढ़ रही है। फिर भारत अगर अपने हितों की रक्षा करना चाहता है तो इसमें असहज होने की जरूरत किसे है?
एफसीआरए के नए नियमों ने धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए भी जवाबदेही बढ़ाई है। विदेशी फंड की अगली किस्त पाने के लिए पहले मिले फंड का कम से कम 75 प्रतिशत उपयोग करने और उसके उपयोग का प्रमाण देने जैसी शर्तें लागू की गई हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट का उपयोगिता प्रमाणपत्र, बैंक विवरण और खर्च का रिकॉर्ड जरूरी किया गया है। संस्थाओं को अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया और प्रकाशनों से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी। यानी अब विदेशी फंड लेने वाली संस्था को यह बताना होगा कि वह केवल पैसा ले नहीं रही, बल्कि उसका इस्तेमाल कहां और कैसे कर रही है। धर्मांतरण के आरोपों पर भी सरकार का रुख सख्त है।
यहां यह स्पष्ट रहना चाहिए कि हर धार्मिक संस्था या हर सामाजिक संगठन को संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता। लेकिन यदि किसी संस्था पर जबरन धर्मांतरण, फंड के निजी इस्तेमाल या विदेशी धन के गलत उद्देश्य में इस्तेमाल के आरोप हैं, तो जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? विदेशी चंदे की निगरानी को अल्पसंख्यक विरोध या लोकतंत्र विरोध बताकर जांच से बचने की कोशिश अब नहीं चलेगी।
सोनम वांगचुक से जुड़े संगठन का मामला भी इसी बहस को राजनीतिक रंग देता है। गृह मंत्रालय ने 2025 में उनके संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द किया। इसके बाद वांगचुक लद्दाख से जुड़े आंदोलनों में सािढय रहे। यहां किसी व्यक्ति की लोकप्रियता मुद्दा नहीं है। असली सवाल यह है कि जब किसी संगठन की विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई होती है, तो उससे जुड़े प्रभावशाली लोग नए आंदोलनों के जरिए किस तरह अपनी राजनीतिक और सामाजिक जमीन तलाशते हैं। इस सवाल पर बहस होनी चाहिए, न कि सवाल पूछने वालों को तुरंत लोकतंत्र विरोधी घोषित कर दिया जाए। मोदी सरकार की एफसीआरए नीति का मूल संदेश यही है कि भारत में अब समानांतर सत्ता नहीं चलेगी। न विदेशी फाउंडेशन भारत की विकास नीति तय करेंगे, न विदेशी नेटवर्क यह तय करेंगे कि किस मुद्दे पर आंदोलन खड़ा होगा और किस मुद्दे पर चुप्पी साधी जाएगी।
भारत की जनता ने सरकार चुनी है, किसी विदेशी संस्था ने नहीं। हां, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एफसीआरए कानून राजनीतिक बदले का हथियार न बने। ईमानदार संगठनों को पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था मिलनी चाहिए। अपील और न्यायिक समीक्षा की पर्याप्त गुंजाइश होनी चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विदेशी फंडिंग पर निगरानी ही खत्म कर दी जाए। भारत अब वह देश नहीं है जहां विदेशी पैसा आए, विदेशी एजेंडा बने और भारतीय जनता को केवल दर्शक बनाकर रखा जाए। भारत दुनिया से व्यापार करेगा, निवेश लेगा, दोस्ती करेगा और जरूरत पड़ने पर विदेशी सहयोग भी स्वीकार करेगा। लेकिन भारत की दिशा भारत के बाहर बैठे किसी फंडर, फाउंडेशन या नेटवर्क के हाथ में नहीं दी जाएगी।
विदेशी पैसा आए लेकिन नियमों के साथ। चैरिटी हो लेकिन पारदर्शिता के साथ। समाजसेवा हो लेकिन भारत की संप्रभुता की कीमत पर नहीं। मोदी सरकार का संदेश बिल्कुल साफ है भारत दुनिया के लिए खुला है, लेकिन भारत को चलाने का अधिकार केवल भारत के लोगों का है। और विदेशी चंदे के नाम पर भारत में समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश करने वालों के लिए अब रास्ते पहले जैसे खुले नहीं रहेंगे।
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)