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छात्र आंदोलन पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आमने-सामने

प्रकाशित: 23-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
छात्रों द्वारा सांसद घेराव के एक दिन बाद जिस प्रकार छात्र आंदोलन के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हुईं, उसने इस पूरे घटनाक्रम को एक नया आयाम दे दिया। राहुल गांधी का प्रधानमंत्री आवास के निकट धरने पर बैठना तथा उनके साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं की मौजूदगी यह संकेत देती है कि आंदोलन अब केवल छात्रों की मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। इसके समानांतर आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों ने विपक्षी राजनीति में बढ़ते अविश्वास को सार्वजनिक रूप से सामने ला दिया। पार्टी के सांसद संजय सिंह द्वारा कांग्रेस और भाजपा के बीच मिलीभगत का आरोप लगाना इस बात का संकेत है कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीखी हो चुकी है। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि छात्र आंदोलन के मंच पर विपक्षी दलों की एकजुटता बनाए रखना कठिन है और इंडिया गठबंधन की एकता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। जिन दलों ने पहले कई राष्ट्रीय मुद्दों पर साथ मिलकर सरकार का विरोध किया था, वे अब एक-दूसरे के विरुद्ध खुलकर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि आंदोलन के मूल मुद्दों की अपेक्षा राजनीतिक लाभ, नेतृत्व और जनसमर्थन प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा अधिक प्रभावी होती जा रही है। ऐसे वातावरण में आंदोलन का मूल उद्देश्य पीछे छूटने का जोखिम भी बढ़ जाता है। दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। इसलिए छात्र आंदोलन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी दोनों दलों का लंबे समय तक एक साझा राजनीतिक रुख बनाए रखना चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है। कांग्रेस द्वारा अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि और राजनीतिक सहयोग के पुराने प्रसंगों को सामने लाना तथा आम आदमी पार्टी की राजनीतिक भूमिका पर प्रश्न उठाना इस बात का संकेत है कि दोनों दल अब भविष्य की चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आरोप विपक्षी एकता की विश्वसनीयता को और कमजोर करते हैं। यदि यह राजनीतिक दूरी आगे भी बनी रहती है, तो आगामी चुनावों में विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल और संयुक्त रणनीति पर उसका प्रभाव पड़ सकता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।