संयुक्त परिवार की व्यवस्था क्या आज भी प्रासंगिक है?
प्रकाशित: 01-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
हम दिल्ली के जिस इलाके में रहते हैं उसे दिल्ली का बड़ा समृद्ध इलाका का माना जाता है लेकिन एक चीज जो प्राय मन को कचोटती रहती है की इन बड़े-बड़े घरों में वृद्ध पति पत्नी अकेले रहते हैं और उनको देखने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि इनमें से अधिकांश के बेटे बहु विदेश में रहते हैं या अच्छे अवसर की तलाश में अन्य शहरों में रहते हैं। इन वेदों की खबर लेने वाला कोई नहीं है अगर यह बीमार हो जाए तो पैसा होने के बावजूद भी उनकी देख लेकर देखरेख वाला कोई नहीं रहता। हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि की इन समृद्ध परिवारों के वृद्धो की देख-रेख करने के लिए वृद्ध आश्रम की एक विकल्प बचता है, ये भरे पूरे परिवार के होने के बावजूद अनाथालयों में या वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। खाने को भारत पूरा परिवार है बेटे बेटियां सभी उच्च पदों पर हैं लेकिन उन्हें 2 जून की रोटी देने वाला कोई नहीं है और यह समस्या पिछले 30-40 वर्षों से अधिक हो गई है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद आधुनिकता की दौड़ में हम संयुक्त परिवार प्रथा से दूर न्यूक्लियर फैमिली की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब इस समय यह विचार करने का समय आ गया है की क्या संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने से और न्यूक्लियर फैमिली कॉन्सेप्ट आने से हमारे सुकून भरे दिन अब लद चुके हैं।
वास्तविकता यह है कि डब्बे के दशक के जब से आर्थिक सुधार युग का आगमन हुआ और हम पश्चात देशों के सम्पर्क में आ गए तो हमारे आधुनिक जीवन शैली ने पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार का टूटना एकल परिवारों का बढ़ना और आपसी संवाद में कमी हमारे जीवन में चार और मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं रोजगार बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपने घरों से दूर हो रहे हैं जिसे पारिवारिक भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ रहा है। आर्थिक सुरक्षा सीमित आए परिवार की जिम्मेदारियां का दबाव और रिश्तो में प्रति दूरियां मन को अस्थिर कर रही हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद पारंपरिक और आधुनिक सोच का टकराव तथा रिश्तो के अनावश्यक हस्तक्षेप पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। आज मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती काम नहीं बल्कि कम से जुड़ा दबाव और समाज में बनी इमेज है। परिवार की उम्मीदें रिश्तेदारों की तुलना और लोग क्या कहेंगे का डर इंसान को भीतर से तोड़ रहा है और यही मानसिक दवा तनाव धीरे-धीरे हमारी मानसिक दशा को और पारिवारिक संबंधों को खराब कर रहा है।
आज अधिक पैसा कमाने और अच्छे जीवन की तलाश में लोग बाहर जा रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि है कि प्राचीन संयुक्त परिवार की परंपरा से हम दूर होते जा रहे हैं और पैसा कमाने की बोर्ड में घर का सुकून हमसे छीना जा रहा है और बड़े बुजुर्ग की ओर से हम उदासीन होते जा रहे हैं, आज के दो दशक पूर्व यदि पति पत्नी में कोई विवाद होता था तो घर के बड़े बुजुर्ग इस विवाद को बड़ी आसानी से सुलझा देते थे पर आज हम घर के बड़े बुजुर्गों से दूर हो गए हैं और पति-पत्नी कि थोड़े-थोड़े से मन मोटे झगड़ा के बाद स्थिति कोर्ट और तलाक तक पहुंच जाती हैआज के आधुनिक युग में जहां पर घर के बड़े बुजुर्ग वृद्ध आश्रम अनाथालय में रहने को मजबूर हैं वहीं पति-पत्नी के बीच कोर्ट केसेस और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है अब अवसर आ गया है किन समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचें और जान क्या आखिर क्यों हम मानसिक रूप से अस्थिर क्यों हो रहे हैं।
यदि हम इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करें तो हमें समझ में आता है लोगों का लगातार चिंतित रहना स्वभाव में चिडचिडापन का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का बिछड़ना है जिसकी वजह से हम या तो दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और संवाद के लिए कोई जगह नहीं होती जबकि संयुक्त परिवार प्रणाली में हम दिन भर काम करने के बाद शाम को परिवार के सभी सदस्यों के बीच संवाद करते थे समाचार सुलझाई जाती थी और फिर दूसरे दिन तरोताजा होकर कम पर जाते थे लेकिन आज संयुक्त परिवार बिगड़ने से ना तो संवाद हो रहे हैं और ना ही बड़े गुना से सलाह ली जा रही है जिसके कारण हमारा पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसी स्थिति का लगातार बने रहना बहुत ही चिंताजनक है। लगातार चिंता चिड़चिड़ापन एकाग्रता में कमी, नींद न आने की समस्या, शारीरिक थकान सामाजिक अलगाव तथा भावनात्मक असंतुलन लंबे समय तक न बने रहे इसके लिएइसका समाधान आवश्यक है।
समाधान की शुरुआत परिवार से ही होती है। खुला संवाद एक दूसरे की भावनाओं को समझना और अपनापन ही मानसिक सुकून की पहली सीढ़ी है। बच्चों को डांट नहीं सहयोग की जरूरत होती है। युवाओं को आलोचना नहीं विश्वास चाहिए और बुजुर्गों को उपेक्षा नहीं सम्मान और साथ चाहिए, पर न्यूक्लियर फैमिली की कॉन्सेप्ट आने से यह सब समाप्त हो गयाहै। परिवार का टूटना परिवार का टूटना केवल सामाजिक ढांचे का बदलाव नहीं बल्कि एक गहरी मानसिक पीड़ा है संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से ही इसके इलाकों काम किया जा सकता है जब समाज सफलता से पहले खुशहाली को प्राथमिकता देगा तो यह समस्याएं सदा समाप्त हो जाएंगे जब तक इंसान अपने मन को समझना नहीं सीखेगा तब तक बाहरी सफलताएं भी उसको शांति प्रदान नहीं करेंगी।यह जानने के पहले हमें समझना होगा कि हमारे संयुक्त परिवार से हमें क्या फायदे थे और अब संयुक्त परिवार बिखरने से क्या नुकसान हो रहे हैं।
सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवार आज के भाग दौड़ भरे तनाव युक्त जीवन में सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग,बच्चों के बेहतर लालन पालन और आर्थिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये घर के बुजुर्गों की देखभाल भी सुनिश्चित करते हैं और उनका अकेलापन दूर करते हैं और बच्चों में संस्कार और सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि बच्चे दादी-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में बेहतर सामाजिक मूल्य और संस्कार सीखते हैं और यह उन्हें एकाकीपन के कारण उपजने वाली हताशा व निराशा आज के प्रभाव से दूर करता है दूसरे शब्दों में हमारे परंपरागत संयुक्त परिवार एक साथ कई समस्याओं से निपटने का मजबूत माध्यम है। पिछले दो-तीन दशकों से हमने केंद्रीय की परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) को अपनाने के कारण जिन मुसीबत को झेला है या झेल रहे हैं उनसे निपटने के लिए यही एक मात्र साधन है।
यद्यपि आज हम 21वीं शताब्दी के वैश्विक युग में जी रहे हैं जहां प्रतिस्पर्धा की होड़ में और पूरा विश्व एकही छतरी के नीचे समाया हुआ है फिर भी भारतीय परिपेक्ष में संयुक्त परिवार आज भी बहुत प्रासंगिक है। एक संयुक्त परिवार में सभी लोग एक दूसरे का सुख-दुख आपस में बांट लेते हैं और परिवार में कोई एक व्यक्ति कमजोर या अक्षम है उसका भी गुजारा हो जाता है। अकेलेपन के कारण जो बच्चे आज कल हताशा और निराशा में आत्म हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं इन सब चीजों से बचने के संयुक्त परिवार जैसे परम्परागत समाज की ओर लौटना एक मात्र विकल्प है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)
हम दिल्ली के जिस इलाके में रहते हैं उसे दिल्ली का बड़ा समृद्ध इलाका का माना जाता है लेकिन एक चीज जो प्राय मन को कचोटती रहती है की इन बड़े-बड़े घरों में वृद्ध पति पत्नी अकेले रहते हैं और उनको देखने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि इनमें से अधिकांश के बेटे बहु विदेश में रहते हैं या अच्छे अवसर की तलाश में अन्य शहरों में रहते हैं। इन वेदों की खबर लेने वाला कोई नहीं है अगर यह बीमार हो जाए तो पैसा होने के बावजूद भी उनकी देख लेकर देखरेख वाला कोई नहीं रहता। हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि की इन समृद्ध परिवारों के वृद्धो की देख-रेख करने के लिए वृद्ध आश्रम की एक विकल्प बचता है, ये भरे पूरे परिवार के होने के बावजूद अनाथालयों में या वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। खाने को भारत पूरा परिवार है बेटे बेटियां सभी उच्च पदों पर हैं लेकिन उन्हें 2 जून की रोटी देने वाला कोई नहीं है और यह समस्या पिछले 30-40 वर्षों से अधिक हो गई है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद आधुनिकता की दौड़ में हम संयुक्त परिवार प्रथा से दूर न्यूक्लियर फैमिली की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब इस समय यह विचार करने का समय आ गया है की क्या संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने से और न्यूक्लियर फैमिली कॉन्सेप्ट आने से हमारे सुकून भरे दिन अब लद चुके हैं।
वास्तविकता यह है कि डब्बे के दशक के जब से आर्थिक सुधार युग का आगमन हुआ और हम पश्चात देशों के सम्पर्क में आ गए तो हमारे आधुनिक जीवन शैली ने पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार का टूटना एकल परिवारों का बढ़ना और आपसी संवाद में कमी हमारे जीवन में चार और मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं रोजगार बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपने घरों से दूर हो रहे हैं जिसे पारिवारिक भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ रहा है। आर्थिक सुरक्षा सीमित आए परिवार की जिम्मेदारियां का दबाव और रिश्तो में प्रति दूरियां मन को अस्थिर कर रही हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद पारंपरिक और आधुनिक सोच का टकराव तथा रिश्तो के अनावश्यक हस्तक्षेप पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। आज मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती काम नहीं बल्कि कम से जुड़ा दबाव और समाज में बनी इमेज है। परिवार की उम्मीदें रिश्तेदारों की तुलना और लोग क्या कहेंगे का डर इंसान को भीतर से तोड़ रहा है और यही मानसिक दवा तनाव धीरे-धीरे हमारी मानसिक दशा को और पारिवारिक संबंधों को खराब कर रहा है।
आज अधिक पैसा कमाने और अच्छे जीवन की तलाश में लोग बाहर जा रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि है कि प्राचीन संयुक्त परिवार की परंपरा से हम दूर होते जा रहे हैं और पैसा कमाने की बोर्ड में घर का सुकून हमसे छीना जा रहा है और बड़े बुजुर्ग की ओर से हम उदासीन होते जा रहे हैं, आज के दो दशक पूर्व यदि पति पत्नी में कोई विवाद होता था तो घर के बड़े बुजुर्ग इस विवाद को बड़ी आसानी से सुलझा देते थे पर आज हम घर के बड़े बुजुर्गों से दूर हो गए हैं और पति-पत्नी कि थोड़े-थोड़े से मन मोटे झगड़ा के बाद स्थिति कोर्ट और तलाक तक पहुंच जाती हैआज के आधुनिक युग में जहां पर घर के बड़े बुजुर्ग वृद्ध आश्रम अनाथालय में रहने को मजबूर हैं वहीं पति-पत्नी के बीच कोर्ट केसेस और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है अब अवसर आ गया है किन समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचें और जान क्या आखिर क्यों हम मानसिक रूप से अस्थिर क्यों हो रहे हैं।
यदि हम इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करें तो हमें समझ में आता है लोगों का लगातार चिंतित रहना स्वभाव में चिडचिडापन का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का बिछड़ना है जिसकी वजह से हम या तो दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और संवाद के लिए कोई जगह नहीं होती जबकि संयुक्त परिवार प्रणाली में हम दिन भर काम करने के बाद शाम को परिवार के सभी सदस्यों के बीच संवाद करते थे समाचार सुलझाई जाती थी और फिर दूसरे दिन तरोताजा होकर कम पर जाते थे लेकिन आज संयुक्त परिवार बिगड़ने से ना तो संवाद हो रहे हैं और ना ही बड़े गुना से सलाह ली जा रही है जिसके कारण हमारा पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसी स्थिति का लगातार बने रहना बहुत ही चिंताजनक है। लगातार चिंता चिड़चिड़ापन एकाग्रता में कमी, नींद न आने की समस्या, शारीरिक थकान सामाजिक अलगाव तथा भावनात्मक असंतुलन लंबे समय तक न बने रहे इसके लिएइसका समाधान आवश्यक है।
समाधान की शुरुआत परिवार से ही होती है। खुला संवाद एक दूसरे की भावनाओं को समझना और अपनापन ही मानसिक सुकून की पहली सीढ़ी है। बच्चों को डांट नहीं सहयोग की जरूरत होती है। युवाओं को आलोचना नहीं विश्वास चाहिए और बुजुर्गों को उपेक्षा नहीं सम्मान और साथ चाहिए, पर न्यूक्लियर फैमिली की कॉन्सेप्ट आने से यह सब समाप्त हो गयाहै। परिवार का टूटना परिवार का टूटना केवल सामाजिक ढांचे का बदलाव नहीं बल्कि एक गहरी मानसिक पीड़ा है संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से ही इसके इलाकों काम किया जा सकता है जब समाज सफलता से पहले खुशहाली को प्राथमिकता देगा तो यह समस्याएं सदा समाप्त हो जाएंगे जब तक इंसान अपने मन को समझना नहीं सीखेगा तब तक बाहरी सफलताएं भी उसको शांति प्रदान नहीं करेंगी।यह जानने के पहले हमें समझना होगा कि हमारे संयुक्त परिवार से हमें क्या फायदे थे और अब संयुक्त परिवार बिखरने से क्या नुकसान हो रहे हैं।
सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवार आज के भाग दौड़ भरे तनाव युक्त जीवन में सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग,बच्चों के बेहतर लालन पालन और आर्थिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये घर के बुजुर्गों की देखभाल भी सुनिश्चित करते हैं और उनका अकेलापन दूर करते हैं और बच्चों में संस्कार और सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि बच्चे दादी-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में बेहतर सामाजिक मूल्य और संस्कार सीखते हैं और यह उन्हें एकाकीपन के कारण उपजने वाली हताशा व निराशा आज के प्रभाव से दूर करता है दूसरे शब्दों में हमारे परंपरागत संयुक्त परिवार एक साथ कई समस्याओं से निपटने का मजबूत माध्यम है। पिछले दो-तीन दशकों से हमने केंद्रीय की परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) को अपनाने के कारण जिन मुसीबत को झेला है या झेल रहे हैं उनसे निपटने के लिए यही एक मात्र साधन है।
यद्यपि आज हम 21वीं शताब्दी के वैश्विक युग में जी रहे हैं जहां प्रतिस्पर्धा की होड़ में और पूरा विश्व एकही छतरी के नीचे समाया हुआ है फिर भी भारतीय परिपेक्ष में संयुक्त परिवार आज भी बहुत प्रासंगिक है। एक संयुक्त परिवार में सभी लोग एक दूसरे का सुख-दुख आपस में बांट लेते हैं और परिवार में कोई एक व्यक्ति कमजोर या अक्षम है उसका भी गुजारा हो जाता है। अकेलेपन के कारण जो बच्चे आज कल हताशा और निराशा में आत्म हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं इन सब चीजों से बचने के संयुक्त परिवार जैसे परम्परागत समाज की ओर लौटना एक मात्र विकल्प है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)