उत्तरदायी शासन व लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए प्रभावी स्थायी समितियां अत्यंत आवश्यक : विस अध्यक्ष
प्रकाशित: 16-07-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वीर अर्जुन संवाददाता
नई दिल्ली। समिति प्रणाली विधायी कार्यप्रणाली की सर्वोत्तम परंपराओं में से एक है। धैर्यपूर्ण विचार-विमर्श, सूक्ष्म परीक्षण तथा साक्ष्य-आधारित अनुशंसाओं के माध्यम से समितियाँ न केवल कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ करती हैं, बल्कि शासन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाती हैं। यह बात दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने आज दिल्ली विधानसभा की वित्तीय समितियों एवं विभाग-संबंधित स्थायी समितियों (डीआरएससी) के अध्यक्षों के लिए आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कही। नवनियुक्त अध्यक्षों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति केवल एक औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन सुनिश्चित करने वाली विधानमंडल की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक को सशक्त बनाने का अवसर है। उन्होंने कहा कि यद्यपि सदन में होने वाली बहसें संसदीय लोकतंत्र की सबसे प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति होती हैं, किंतु विधानमंडल का अधिकांश विस्तृत कार्य उसकी समिति प्रणाली के माध्यम से होता है, जहाँ सदस्य नीतियों का परीक्षण करते हैं, सार्वजनिक व्यय की समीक्षा करते हैं, विभागों के कार्य निष्पादन का मूल्यांकन करते हैं तथा सरकार की योजनाओं के ािढयान्वयन की सूचित एवं रचनात्मक समीक्षा करते हैं। इस कार्यशाला का आयोजन वित्तीय समितियों एवं विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के माननीय अध्यक्षों को इनके संवैधानिक, प्रािढयात्मक एवं कार्यात्मक पहलुओं से परिचित कराने के उद्देश्य से किया गया, ताकि विधायी निगरानी, जवाबदेही एवं सुशासन को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके। कार्पाम में दिल्ली विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष श्री मोहन सिंह बिष्ट, संसदीय कार्य विशेषज्ञ श्री वी. सतीश, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक डॉ. रामानंद, विधानसभा सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारी तथा अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे। तकनीकी सत्रों में श्री वी. सतीश ने समिति अध्यक्षों की भूमिका एवं उत्तरदायित्व, दिल्ली विधानसभा के सचिव डॉ. युमनाम अरुण कुमार ने संस्थागत सहयोग का प्रभावी उपयोग तथा डॉ. रामानंद ने जवाबदेही एवं जनविश्वास को सुदृढ़ करना विषय पर अपने विचार रखे। इसके बाद माननीय समिति अध्यक्षों के साथ एक संवादात्मक चर्चा भी आयोजित की गई।
विधानसभा अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र की सफलता केवल कानून बनाने या सदन में बहस करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात से तय होती है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ आम जनता के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन ला पाती हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा जनहित के मुद्दों पर चर्चा और सरकार की नीतियों की समीक्षा के साथ-साथ अपनी समिति प्रणाली के माध्यम से शासन के कार्यों की गहन पड़ताल करती है। उन्होंने कहा कि स्थायी समितियाँ आज विधायी व्यवस्था का एक सशक्त स्तंभ बन चुकी हैं, जो विभागों के कार्यों, सरकारी योजनाओं, बजटीय व्यय तथा नीतियों का गहन अध्ययन कर तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ प्रस्तुत करती हैं।
उन्होंने कहा कि समिति प्रणाली हमारी लोकतांत्रिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जहाँ सदस्य राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर गंभीर एवं रचनात्मक विचार-विमर्श के माध्यम से सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं और सुशासन को सुदृढ़ बनाते हैं। श्री गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में शासन व्यवस्था अधिक व्यापक और जटिल हो गई है तथा शहरी विकास, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और जनसेवाओं जैसे विषय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में निरंतर समीक्षा, गहन अध्ययन और दूरदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि आज नागरिक केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ और बेहतर परिणामों की अपेक्षा रखते हैं। इन अपेक्षाओं को पूरा करने में स्थायी समितियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे सरकारी योजनाओं की समीक्षा, बजट के उपयोग की निगरानी, कार्यान्वयन का मूल्यांकन तथा आवश्यक सुधारों के सुझाव देकर विधानसभा की निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दिल्ली विधानसभा की नवगठित स्थायी समितियाँ जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार कर शासन व्यवस्था को और अधिक उत्तरदायी एवं प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। समिति अध्यक्षों की भूमिका एवं उत्तरदायित्व विषय पर अपने विचार रखते हुए संसदीय कार्य विशेषज्ञ श्री वी. सतीश ने भारत की संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा के व्यापक विकापाम के संदर्भ में स्थायी समितियों की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत "लोकतंत्र की जननी" होने के नाते उत्तरदायी शासन की ऐसी दीर्घकालिक सभ्यतागत परंपरा का धनी है, जो संविधान से भी पूर्व की है। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले व्यवधानों तथा विधायी मानकों में आई गिरावट ने संसदीय संस्थाओं को कमजोर किया है और जनता का विश्वास भी प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और सुदृढ़ता की रक्षा सभी राजनीतिक दलों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है तथा विधानमंडलों को मजबूत बनाना किसी सरकार या राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के लिए आवश्यक है। भारत की सार्वजनिक सेवा एवं संवैधानिक शासन की समृद्ध परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने संसदीय परंपराओं के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रतिबद्धता के माध्यम से विधायी संस्थाओं की विश्वसनीयता एवं उत्तरदायित्व बनाए रखने का आह्वान किया। स्थायी समितियों को विधायिका का सबसे प्रभावी परीक्षण एवं कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला माध्यम बताते हुए श्री सतीश ने कहा कि ये समितियाँ विभागों के कार्य, सार्वजनिक व्यय, बजटीय प्रस्तावों तथा जनमहत्व के उन विषयों की विस्तृत समीक्षा करती हैं, जिन्हें सदन की कार्यवाही के दौरान पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। उन्होंने समिति अध्यक्षों से आग्रह किया कि वे कार्यसूची और पृष्ठभूमि सामग्री का पूर्व अध्ययन करें, सूचित एवं सर्वदलीय विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करें, विभागों के साथ रचनात्मक संवाद बनाए रखें तथा विषय विशेषज्ञों, व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों और अन्य हितधारकों को समिति के समक्ष अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित करें, ताकि समिति की अनुशंसाएँ विशेषज्ञता और साक्ष्यों पर आधारित हों। उन्होंने संसद और विभिन्न राज्य विधानमंडलों की समितियों की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों एवं प्रतिवेदनों से सीख लेने, समितियों की नियमित बैठकें आयोजित करने, अनुशंसाओं पर व्यवस्थित कार्रवाई सुनिश्चित करने तथा संस्थागत शोध सहयोग को सुदृढ़ करने पर भी बल दिया, जिससे समितियाँ विधायी निगरानी, जवाबदेही और सुशासन का और अधिक प्रभावी माध्यम बन सकें। इस अवसर पर दिल्ली विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष श्री मोहन सिंह बिष्ट ने कहा कि स्थायी समितियाँ विधायी परीक्षण और कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने की सबसे प्रभावी व्यवस्थाओं में से एक हैं। उन्होंने कहा कि समिति की कार्यवाही की प्रभावशीलता सूचित नेतृत्व, नियमित सहभागिता और रचनात्मक विचार-विमर्श पर निर्भर करती है। कार्यशाला में श्री अजय कुमार महावर, अध्यक्ष, लोक लेखा समिति; श्री राज कुमार भाटिया, अध्यक्ष, सरकारी उपाम समिति; श्री गजेंद्र सिंह यादव, अध्यक्ष, प्राक्कलन समिति; श्री संजय गोयल, अध्यक्ष, स्वास्थ्य संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री श्याम शर्मा, अध्यक्ष, विकास संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री रविंदर सिंह नेगी, अध्यक्ष, वित्त एवं परिवहन संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री चंदन कुमार चौधरी, अध्यक्ष, प्राक्कलन संबंधी विभागीय स्थायी समिति; तथा श्री संदीप सेहरावत, अध्यक्ष, लोक उपयोगिताएँ एवं नागरिक सुविधाएँ संबंधी विभागीय स्थायी समिति सहित अन्य समिति अध्यक्षों ने भाग लिया।
इसके अतिरिक्त, दिल्ली विधानसभा समिति अध्यक्षों एवं सदस्यों के लिए एक एकीकृत डिजिटल पोर्टल भी विकसित कर रही है। यह पोर्टल समिति से संबंधित कार्यपत्रों, कार्यसूची, प्रतिवेदनों तथा शोध सामग्री तक एक ही मंच पर पहुँच उपलब्ध कराएगा, जिससे समिति सदस्य बेहतर तैयारी कर सकेंगे, अधिक सूचित विचार-विमर्श संभव होगा तथा समितियों की कार्यप्रणाली और अधिक प्रभावी एवं सुदृढ़ बन सकेगी।
नई दिल्ली। समिति प्रणाली विधायी कार्यप्रणाली की सर्वोत्तम परंपराओं में से एक है। धैर्यपूर्ण विचार-विमर्श, सूक्ष्म परीक्षण तथा साक्ष्य-आधारित अनुशंसाओं के माध्यम से समितियाँ न केवल कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ करती हैं, बल्कि शासन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाती हैं। यह बात दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने आज दिल्ली विधानसभा की वित्तीय समितियों एवं विभाग-संबंधित स्थायी समितियों (डीआरएससी) के अध्यक्षों के लिए आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कही। नवनियुक्त अध्यक्षों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति केवल एक औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन सुनिश्चित करने वाली विधानमंडल की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक को सशक्त बनाने का अवसर है। उन्होंने कहा कि यद्यपि सदन में होने वाली बहसें संसदीय लोकतंत्र की सबसे प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति होती हैं, किंतु विधानमंडल का अधिकांश विस्तृत कार्य उसकी समिति प्रणाली के माध्यम से होता है, जहाँ सदस्य नीतियों का परीक्षण करते हैं, सार्वजनिक व्यय की समीक्षा करते हैं, विभागों के कार्य निष्पादन का मूल्यांकन करते हैं तथा सरकार की योजनाओं के ािढयान्वयन की सूचित एवं रचनात्मक समीक्षा करते हैं। इस कार्यशाला का आयोजन वित्तीय समितियों एवं विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के माननीय अध्यक्षों को इनके संवैधानिक, प्रािढयात्मक एवं कार्यात्मक पहलुओं से परिचित कराने के उद्देश्य से किया गया, ताकि विधायी निगरानी, जवाबदेही एवं सुशासन को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके। कार्पाम में दिल्ली विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष श्री मोहन सिंह बिष्ट, संसदीय कार्य विशेषज्ञ श्री वी. सतीश, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक डॉ. रामानंद, विधानसभा सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारी तथा अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे। तकनीकी सत्रों में श्री वी. सतीश ने समिति अध्यक्षों की भूमिका एवं उत्तरदायित्व, दिल्ली विधानसभा के सचिव डॉ. युमनाम अरुण कुमार ने संस्थागत सहयोग का प्रभावी उपयोग तथा डॉ. रामानंद ने जवाबदेही एवं जनविश्वास को सुदृढ़ करना विषय पर अपने विचार रखे। इसके बाद माननीय समिति अध्यक्षों के साथ एक संवादात्मक चर्चा भी आयोजित की गई।
विधानसभा अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र की सफलता केवल कानून बनाने या सदन में बहस करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात से तय होती है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ आम जनता के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन ला पाती हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा जनहित के मुद्दों पर चर्चा और सरकार की नीतियों की समीक्षा के साथ-साथ अपनी समिति प्रणाली के माध्यम से शासन के कार्यों की गहन पड़ताल करती है। उन्होंने कहा कि स्थायी समितियाँ आज विधायी व्यवस्था का एक सशक्त स्तंभ बन चुकी हैं, जो विभागों के कार्यों, सरकारी योजनाओं, बजटीय व्यय तथा नीतियों का गहन अध्ययन कर तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ प्रस्तुत करती हैं।
उन्होंने कहा कि समिति प्रणाली हमारी लोकतांत्रिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जहाँ सदस्य राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर गंभीर एवं रचनात्मक विचार-विमर्श के माध्यम से सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं और सुशासन को सुदृढ़ बनाते हैं। श्री गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में शासन व्यवस्था अधिक व्यापक और जटिल हो गई है तथा शहरी विकास, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और जनसेवाओं जैसे विषय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में निरंतर समीक्षा, गहन अध्ययन और दूरदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि आज नागरिक केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ और बेहतर परिणामों की अपेक्षा रखते हैं। इन अपेक्षाओं को पूरा करने में स्थायी समितियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे सरकारी योजनाओं की समीक्षा, बजट के उपयोग की निगरानी, कार्यान्वयन का मूल्यांकन तथा आवश्यक सुधारों के सुझाव देकर विधानसभा की निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दिल्ली विधानसभा की नवगठित स्थायी समितियाँ जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार कर शासन व्यवस्था को और अधिक उत्तरदायी एवं प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। समिति अध्यक्षों की भूमिका एवं उत्तरदायित्व विषय पर अपने विचार रखते हुए संसदीय कार्य विशेषज्ञ श्री वी. सतीश ने भारत की संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा के व्यापक विकापाम के संदर्भ में स्थायी समितियों की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत "लोकतंत्र की जननी" होने के नाते उत्तरदायी शासन की ऐसी दीर्घकालिक सभ्यतागत परंपरा का धनी है, जो संविधान से भी पूर्व की है। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले व्यवधानों तथा विधायी मानकों में आई गिरावट ने संसदीय संस्थाओं को कमजोर किया है और जनता का विश्वास भी प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और सुदृढ़ता की रक्षा सभी राजनीतिक दलों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है तथा विधानमंडलों को मजबूत बनाना किसी सरकार या राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के लिए आवश्यक है। भारत की सार्वजनिक सेवा एवं संवैधानिक शासन की समृद्ध परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने संसदीय परंपराओं के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रतिबद्धता के माध्यम से विधायी संस्थाओं की विश्वसनीयता एवं उत्तरदायित्व बनाए रखने का आह्वान किया। स्थायी समितियों को विधायिका का सबसे प्रभावी परीक्षण एवं कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला माध्यम बताते हुए श्री सतीश ने कहा कि ये समितियाँ विभागों के कार्य, सार्वजनिक व्यय, बजटीय प्रस्तावों तथा जनमहत्व के उन विषयों की विस्तृत समीक्षा करती हैं, जिन्हें सदन की कार्यवाही के दौरान पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। उन्होंने समिति अध्यक्षों से आग्रह किया कि वे कार्यसूची और पृष्ठभूमि सामग्री का पूर्व अध्ययन करें, सूचित एवं सर्वदलीय विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करें, विभागों के साथ रचनात्मक संवाद बनाए रखें तथा विषय विशेषज्ञों, व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों और अन्य हितधारकों को समिति के समक्ष अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित करें, ताकि समिति की अनुशंसाएँ विशेषज्ञता और साक्ष्यों पर आधारित हों। उन्होंने संसद और विभिन्न राज्य विधानमंडलों की समितियों की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों एवं प्रतिवेदनों से सीख लेने, समितियों की नियमित बैठकें आयोजित करने, अनुशंसाओं पर व्यवस्थित कार्रवाई सुनिश्चित करने तथा संस्थागत शोध सहयोग को सुदृढ़ करने पर भी बल दिया, जिससे समितियाँ विधायी निगरानी, जवाबदेही और सुशासन का और अधिक प्रभावी माध्यम बन सकें। इस अवसर पर दिल्ली विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष श्री मोहन सिंह बिष्ट ने कहा कि स्थायी समितियाँ विधायी परीक्षण और कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने की सबसे प्रभावी व्यवस्थाओं में से एक हैं। उन्होंने कहा कि समिति की कार्यवाही की प्रभावशीलता सूचित नेतृत्व, नियमित सहभागिता और रचनात्मक विचार-विमर्श पर निर्भर करती है। कार्यशाला में श्री अजय कुमार महावर, अध्यक्ष, लोक लेखा समिति; श्री राज कुमार भाटिया, अध्यक्ष, सरकारी उपाम समिति; श्री गजेंद्र सिंह यादव, अध्यक्ष, प्राक्कलन समिति; श्री संजय गोयल, अध्यक्ष, स्वास्थ्य संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री श्याम शर्मा, अध्यक्ष, विकास संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री रविंदर सिंह नेगी, अध्यक्ष, वित्त एवं परिवहन संबंधी विभागीय स्थायी समिति; श्री चंदन कुमार चौधरी, अध्यक्ष, प्राक्कलन संबंधी विभागीय स्थायी समिति; तथा श्री संदीप सेहरावत, अध्यक्ष, लोक उपयोगिताएँ एवं नागरिक सुविधाएँ संबंधी विभागीय स्थायी समिति सहित अन्य समिति अध्यक्षों ने भाग लिया।
इसके अतिरिक्त, दिल्ली विधानसभा समिति अध्यक्षों एवं सदस्यों के लिए एक एकीकृत डिजिटल पोर्टल भी विकसित कर रही है। यह पोर्टल समिति से संबंधित कार्यपत्रों, कार्यसूची, प्रतिवेदनों तथा शोध सामग्री तक एक ही मंच पर पहुँच उपलब्ध कराएगा, जिससे समिति सदस्य बेहतर तैयारी कर सकेंगे, अधिक सूचित विचार-विमर्श संभव होगा तथा समितियों की कार्यप्रणाली और अधिक प्रभावी एवं सुदृढ़ बन सकेगी।