तीस हजारी की कोर्ट में बलात्कार और अन्य गंभीर धाराओं में आरोपी बरी
प्रकाशित: 13-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वीर अर्जुन संवाददाता
नई दिल्ली। दिल्ली की एक अदालत ने कमल नामक व्यक्ति को बलात्कार, गर्भपात कराने, हमला और आपराधिक धमकी के आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपना मामला साबित नहीं कर पाया और अभियोजन पक्ष की गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त विश्वसनीय नहीं थी।
आरोपी की ओर से अदालत में विद्वान अधिवक्ता दीपक शर्मा और नितेश नागर पेश हुए और उन्होंने अपनी बात को बहुत ही गंभीरता से रखा मामला इस आरोप पर था कि कमल ने शादी के वादे पर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में जबरन संबंध बनाकर गर्भपात कराया। लेकिन कोर्ट के सामने अभियोजन पक्ष ने कई ऐसे बयान दिए जो अभियोग का समर्थन नहीं करते थे। जिरह में उसने माना कि कमल ने कभी जबरदस्ती नहीं की, संबंध सहमति से थे। दोनों परिवारों ने शादी पर बात की थी, पर असहमति की वजह से बात नहीं बनी। उसने यह भी कहा कि वह कमल से शादी को तैयार थी और उसने कभी मना नहीं किया। बाद में कमल के माता-पिता को मनाने के आश्वासन पर उसने पहले वाली शिकायत वापस ले ली थी। कोर्ट ने गर्भधारण और गर्भपात के आरोपों में विरोधाभास पाए। अभियोजन पक्ष ने कहा था कि जनवरी 2019 में वह गर्भवती हुई और कमल दवा लाया। लेकिन जिरह में उसने माना कि उसका पीरियड अनियमित था, कोई मेडिकल जांच या इलाज नहीं हुआ और परिवार को नहीं बताया। दिसंबर 2019 वाले आरोप में कहा गया था कि कोल्ड ड्रिंक में दवा मिलाकर दी गई, पर बाद में उसने माना कि कोल्ड ड्रिंक घर पर ही थी और उसने खुद परोसी थी। इस संबंध में कोई मेडिकल दस्तावेज भी पेश नहीं हुआ। अश्लील वीडियो सर्कुलेट करने की धमकी वाले आरोप पर कोर्ट ने कहा कि आरोपी के फोन से ऐसा कोई वीडियो नहीं मिला। फोरेंसिक में अभियोजन पक्ष की कुछ तस्वीरें मिलीं, पर उसने खुद कहा कि फोटो उसने खींचे और व्हाट्सएप पर कमल को भेजे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी के झूठे वादे को साबित करने के लिए यह दिखाना होगा कि शुरू से ही शादी का इरादा नहीं था। सिर्फ बाद में शादी न होना यह साबित नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि समग्र रूप से गवाही अभियोग का समर्थन नहीं करती। मुख्य गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गई, इसलिए उसकी गवाही विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती। बाकी गवाह औपचारिक थे और सीधे कमल को अपराध से नहीं जोड़ते। अदालत ने कहा "उपरोक्त गवाहों की गवाही से आरोपी के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं आया" और उचित संदेह से परे आरोप साबित न होने के कारण कमल को इंडियन पेनल कोड की धारा 376(2)(ह), 313, 323 और 509-घ्घ् से बरी कर दिया। साथ ही धारा 437- एसीआरपीसी के तहत 6 महीने के लिए जमानत बांड लागू रखने का निर्देश दिया।