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तारिक की समझदारी

प्रकाशित: 15-02-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
तारिक की समझदारी
बांग्लादेश में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जीत से उत्साहित बीएनपी यानि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान ने शनिवार को कहा कि वह अपने देश और जनता के हित में ही विदेश नीति को तय करेंगे। रहमान 17 वर्षों तक देश से बाहर रह चुके हैं और अवामी लीग की नेता शेख हसीना के राजनीतिक विरोधी होने के कारण माना जाता है कि भारत से जब कभी उनके प्रत्यर्पण पर बात होगी तो बात बिगड़ सकती है। लेकिन रहमान ने जिस तरह भारत के साथ संबंधों को लेकर कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया और कहा कि उनकी विदेश नीति जनता के हित पर आधारित होगी उससे इतना तो स्पष्ट है कि रहमान कठमुल्ला नीति से बचने का प्रयास जरूर करेंगे।
दरअसल बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से उखाड़ पेंकने वाले छात्रों का हुल्लड़ ब्रिगेड ने जमायते इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और दोनों को ही जनता ने नकार दिया। दोनों को अपनी औकात का एहसास हो या न हो किन्तु इतना तय है कि बांग्लादेश की जनता ने भारत विरोधी तत्वों को कड़ा संदेश देते हुए देश में एक बार फिर राजनीतिक स्थिरता के लिए मतदान किया है। बीएनपी को जो दो तिहाई सीटें मिली हैं, उनमें अवामी लीग के भी वोट शामिल हैं। अवामी लीग को मोहम्मद यूनुस की सरकार ने चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी और जमायते इस्लामी एवं कट्टरपंथी ताकतों के निशाने पर परेशान अवामी लीग के समर्थक चाहते थे कि उनकी जान के दुश्मन जेहादियों को किसी भी हालत में नहीं जीतना चाहिए। इसलिए शेख हसीना की अनुपस्थिति में उन्होंने तारिक रहमान को ही जिताना अपने हित में समझा।
सच तो यह है कि मोहम्मद यूनुस तो कठमुल्लों का भी कठमुल्ला था। वह पूरी तरह जमायते इस्लामी और हिफाजते इस्लाम के इशारे पर काम करता था। उसे पता था कि अंतर्राष्ट्रीय विधि में प्रत्यर्पण उस व्यक्ति का हो ही नहीं सकता जो अपने देश में राजनीतिक विद्वेष का शिकार हो। भारत शेख हसीना का यदि प्रत्यर्पण कर भी दे तो विश्व बिरादरी की आलोचना का पात्र बनेगा। राजनीतिक आश्रय का प्रावधान पूरी दुनिया में है। भारत जब चीन से घबराता था तब भी उसने तिब्बती धर्म गुरू दलाई लामा को राजनीतिक आश्रय दिया। अब तो भारत किसी भी देश से नहीं डरता तो वह मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करके राजनीतिक आश्रय ले चुकी शेख हसीना के बारे में बांग्लादेश की किसी भी सरकार से कोई बात ही नहीं करेगा। भारत सरकार की दृढ़ नीति है कि नई दिल्ली ने शेख हसीना को रोक कर नहीं रखा है बल्कि वह खुद बांग्लादेश की अराजकता से त्रस्त होकर भारत में रह रही हैं। उन्हें जब तक जरूरत महसूस होगी वह भारत में रहेंगी और जब जाना चाहेंगी तो चली जाएंगी किन्तु कुल मिलाकर रहने या जाने का फैसला उन्हें ही करना है।
अपना मानना है कि तारिक रहमान कट्टरपंथियों की आलोचना, देश में आईएसआई के प्रभाव में ब्यूरोसी और अपनी राजनीतिक मजबूरी के कारण भले ही शेख हसीना के प्रत्यर्पण की बात ‘करने के लिए करते रहे' किन्तु भारत के रुख को देखते हुए वह अपनी जनता के हित में भारत के साथ व्यापारिक, सुरक्षा एवं कूटनीतिक संबंधों को खराब करने की नासमझी नहीं करेंगे। लगता है कि रहमान भारतीय लोकतंत्र की मजबूरियों एवं बांग्लादेश की हकीकत को महसूस करके उदार विदेश नीति अपनाएंगे। इसी में बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री की समझदारी भी है।