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भारत-फ्रांस की विशिष्ट मैत्री

प्रकाशित: 18-02-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
भारत-फ्रांस की विशिष्ट मैत्री
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल पों की मंगलवार को मुंबई में हुई मुलाकात अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही नेताओं ने दोनों देशों के संबंधों को विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के मुकाम तक पहुंचाया और दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने बढ़ते भू-राजनीतिक उथल-पुथल के परिप्रेक्ष्य में रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंध बढ़ाने का संकल्प जो लिया है।
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी का यह आशावाद निरर्थक नहीं है कि विश्वास और साझा विजन के आधार पर भारत और फ्रांस विशेष वैश्विक हिस्सेदारी के रूप में संबंध स्थापित कर रहे हैं और अब दोनों देश मिलकर माउण्ट एवरेस्ट की ऊंचाइयों तक उड़ान भरने वाला विश्व का एकमात्र हेलीकाप्टर भारत में बनाएंगे और पूरे विश्व को एक्सपोर्ट करेंगे।
फ्रांस के साथ यही सहयोगात्मक मैत्री दूसरे देशों के साथ भारत की मित्रता को अलग करते हैं। भारत के साथ संबंधों में जो खुलापन फ्रांस के साथ है, वैसा तो रूस के साथ भी नहीं हो पाया है। रूस के साथ आए दिन भुगतान प्रािढया को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों एवं राजनयिकों के बीच सौदेबाजी होती है। चूंकि भारत और रूस दोनों एक दूसरे की भावनाओं का सममान करते हैं और दोनों की एक-दूसरे के प्रति सद्भावना है, इसलिए मामले उलझते ही सुलझ भी जाते हैं। किन्तु फ्रांस के साथ भारत के मामले उलझते ही नहीं क्योंकि फ्रांस भारतीय शर्तों को व्यावसायिक उद्देश्य के लिए स्वीकार कर लेता है। भारत भी इस बात का आकलन करता है कि उसे जो तकनीक अपनी शर्तों पर फ्रांस से मिल रही है, वही तकनीक वह अमेरिका से उसकी शर्तों पर क्यों लें? भारत की इसी सूझबूझ का परिणाम है कि भारत और फ्रांस तकनीकी सामरिक सहयोग पर दृढ़ता से आगे ही आगे बढ़ते जा रहे हैं।
अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच व्यापारिक और सामरिक सहयोग जिस विश्वास की नींव पर टिका था अब वह कमजोर पड़ गया है क्योंकि उसमें दरार पड़ गई है। अब भारत के साथ यूरोप के देश जिस विजन पर काम करना चाहते हैं, भारत को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। यह वास्तविकता है कि भारत इसलिए मेक इन इंडिया को भारतीय आर्थिक जरूरतों के लिए किसी भी देश से समझौता करने को तैयार रहता है। कुल मिलाकर दोनों देशों की मैत्री वैश्विक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
फिर बवाल
भारत में कुछ संतोष विहीन तत्व अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की आग में किसान आंदोलन पार्ट-2 शुरू करने की कोशिश में जुट गए हैं। मजे की बात तो यह है कि अभी तक भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते का संपूर्ण विवरण सामने नहीं आया है किन्तु सरकार के खिलाफ उन्हें आंदोलन चलाने का सही समय लग रहा है क्योंकि अर्धसत्य के आधार पर ही तो झूठे विमर्श गढ़ने के उत्तम अवसर उपलब्ध होते हैं। सरकार नेताओं की आशंकाओं का खुलकर कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं है क्योंकि टैरिफ शर्तों का आना अभी शेष है। दूसरी तरफ किसानों को भड़काने के लिए शरारती दिमाग अपुष्ट खबरों को टूल किट बनाकर एकतरफ किसानों को लुटा पिटा साबित करने पर जोर देंगे दूसरी तरफ यह माहौल बनाने की कोशिश करेंगे ताकि जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने वाले हैं, वहां पर केंद्र सरकार को किसान विरोधी साबित किया जा सके।
सच तो यह है कि किसानों के हितों को लेकर समूचा विपक्ष और सत्तापक्ष सभी संवेदनशील हैं। लोकतंत्र में कुछ विषय तो ऐसे होने ही चाहिए जिससे प्रतिपक्ष और विपक्ष दोनों की संवेदनशीलता परिलक्षित हो। किन्तु अर्धसत्य या फिर झूठे तथ्यों के आधार पर जब आंदोलन चलाए जाते हैं तो आयोजकों के सारे प्रयास इसी बात को लेकर होते हैं कि उनके आंदोलन क्यों तर्क संगत हैं।
लब्बोलुआब यह है कि जो लोग यह सपने देख रहे हैं कि मात्र मिथ्या विमर्श गढ़ कर मौजूदा सरकार को अस्थिर कर लेंगे, उनका बौद्धिक स्तर और राजनीतिक समझ बौनी है।