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व्यावहारिक कूटनीति

प्रकाशित: 27-02-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
व्यावहारिक कूटनीति
एक तरफ जब पश्चिम एशिया का माहौल तनावग्रस्त है तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इजरायल के अपने प्रवास के दौरान बुधवार और बृहस्पतिवार का दिन इतना महत्वपूर्ण साबित कर दिया कि कूटनीति का आधार आदर्शवाद नहीं बल्कि व्यवहारवाद होता है। भारत इस बात को जानता है कि ईरान पर अमेरिकी हमले से भारत के हितों पर भी प्रभाव पड़ना तय है किन्तु कभी भी कोई दूरदर्शी नेता किसी भी स्थिति में आदर्शवाद के फार्मेट में अपने ठेठ हितों को नहीं साध सकता। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने व्यापार, कृषि, ऊर्जा, साइबर स्पेस और डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर तो किए ही साथ ही दोनों देशों ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के ढांचे के तहत सैन्य उपकरणों के संयुक्त विकास और संयुक्त उत्पादन की दिशा में काम करके अपनी पहले से ही घनिष्ठ रक्षा साझेदारी का विस्तार करने का भी संकल्प लिया। दोनों देशों के आतंकवाद के खिलाफ एक जैसे ही विचार हैं साथ ही दोनों देश आतंकवाद को जड़ से खत्म करने पर एक जैसे ही दृढ़ संकल्प ले चुके हैं।
असल में भारत हमेशा संकट काल में इजरायल से मदद लेता रहा है। भारत ने 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान इजरायल से गोला बारूद के अलावा मोसाद की मदद ली थी जिन की वजह से पाकिस्तान की सेना को अत्यन्त भारी नुकसान हुआ। कारगिल युद्ध के अवसर पर जब भारत के रूस द्वारा दिए हथियारों के गोला बारूद खत्म हो गए तो रूस ने उन्हें तत्काल आपूर्ति के लिए असमर्थता जताई किन्तु इजरायल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आश्वस्त किया कि भारतीय सेना को हथियारों की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा। इजरायल ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ खुफिया जानकारी भारतीय सेना को देकर उनका उत्साह बढ़ाया था। आपरेशन सिंदूर के वक्त भी भारत को खुफिया जानकारी और खुफिया संसाधनों की पूरी मदद की। भारत ने हमेशा पाकिस्तान के खिलाफ इजरायल से मदद हासिल की और फिलस्तीन के प्रति संवेदना रखी और उन्हें आर्थिक मदद भी दी। इजरायल यात्रा से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्र के मंच पर इजरायल का विरोध और फिलस्तीन के पक्ष में वोट दिया। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि भारत हमास के पक्ष में कभी भी रहा। जो हमास भारत विरोधी पाक आतंकी संगठनों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों में शामिल होता है, उसके प्रति भारत को किसी तरह की न तो संवेदना है और न ही होनी चाहिए। रही बात फिलस्तीन की तो उसके प्रति भारत की संवेदना हमेशा रहती है और साथ ही इजरायल से रणनीतिक संबंध भी जारी रहेंगे। यही तो है बहुध्रुवीय दुनिया की आत्म हितों पर आधारित व्यावहारिक कूटनीति।
सराहनीय फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एनसीईआरटी यानि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की आठवीं कक्षा की उन पुस्तकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर सराहनीय फैसला लिया है जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने दो टूक कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने के आशय से की गई सुनियोजित साजिश है। एक दिन पहले ही मुख्य न्यायाधीश ने एनसीईआरटी के इस अध्याय को न्यायपालिका पर आघात तक बता दिया था।
दरअसल देश में जो संस्थाएं स्वायत्तशासी का स्तर हासिल किए हुए हैं वहां पर कुछ ऐसे बौद्धिक प्रेत कार्य करते हैं जो दावा तो करते हैं कि वे विषय के विशेषज्ञ हैं कि वे अपने कृत्यों से निर्धारित कार्य क्षेत्र में सैद्धांतिक कूड़ा करकट भरने की कोशिश करते हैं। संवैधानिक उपबंधों के आधार पर विचाराधीन, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अपने-अपने दायित्व और अपनी-अपनी गरिमा होती है। सभी स्तंभ एक-दूसरे के पूरक हैं। लोकतांत्रिक प्रािढया में यदि तीनों स्तंभों के बारे में किशोर वय के छात्रों के मस्तिष्क में ऐसी घटिया छवि बनाई जाएगी तो भला इस देश की दशा क्या होगी? यह देश तो ‘बनाना लोकतंत्र' बनकर रह जाएगा। न्यायपालिका को भ्रष्ट बताने वालों को क्या पता, कल को वे कार्यपालिका यानि सरकार के बारे में भी छात्रों को पढ़ाएं कि मंत्री और अफसर भ्रष्ट होते हैं, इसलिए कार्यपालिका भ्रष्ट है अथवा सांसद और विधायकों में बहुत सारे के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमें चल रहे हैं, इसलिए विधायिका भी भ्रष्ट है। फिर तो बाजा ही बज जाएगा इस लोकतंत्र का। केवल एक-एक दो जजों के भ्रष्टाचार से न्यायपालिका की पवित्रता कलंकित नहीं हो सकती। बहरहाल, मुख्य न्यायाधीश का फैसला सराहनीय है।