सतर्क कूटनीति की जरूरत
प्रकाशित: 01-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
अमेरिका ने ईरान पर एपिक फ्यूरी और इजरायल ने आपरेशन रोरिंग लाइन के तहत हमले करके अपने इरादे को स्पष्ट कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान पर हमले का उद्देश्य सत्ता परिवर्तन है। उन्होंने ईरान की जनता को सलाह दी है कि अमेरिकी सेना देश पर हमले करके मौजूदा सरकार पर दबाव बनाए तो इसका फायदा उठाकर वे अपनी सरकार बना लें। राष्ट्रपति ट्रंप ने तो यह भी कह दिया कि अमेरिकी फौज एक बहुत बड़ा और लगातार चलने वाला आपरेशन कर रही है।
दरअसल अमेरिकी फौज ईरान के परमाणु केंद्रों, यूरेनियम संवर्धन केंद्रों और उसके बुनियादी केंद्रों को पूरी तरह तबाह करना चाहता है ताकि ईरान परमाणु कार्पाम चलाने में पूरी तरह असमर्थ हो जाए। सच तो यह है कि अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल से परेशान हैं। इन दोनों को लगता है कि ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल बेहद खतरनाक है इसलिए उसके परमाणु केंद्रों को तहस-नहस करके मिट्टी में मिलाना ही उनके हित में हैं।
लगता है अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हो रहे हमले का बहुत बड़ा कारण यह भी है कि जिस तरह तेहरान आए दिन फारस की खाड़ी और ऊर्जा गलियारे को बाधित करने की धमकी देता रहता है। अमेरिका और इजरायल मानते हैं कि जल डमरू मध्य और फारस की खाड़ी को पूरी तरह शांत रखा जाना जरूरी हो गया है। अमेरिका चाहता है कि यदि ईरान की नेवी को तबाह कर दिया जाए तो वह खाड़ी के देशों में तैनात अमेरिकी नेवी पर हमले की धमकी भी नहीं देता। यह सच है कि अमेरिकी नेवी बहुत पहले से कई खाड़ी के देशों में तैनात हैं। यदि ईरान ठान ले तो अमेरिकी ठिकानों को निशाना तो बना ही सकता है। अमेरिका ने इसी डर को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए ईरान के खिलाफ लम्बी अवधि तक युद्ध लड़ने का इरादा व्यक्त किया है। यह सच है कि ईरान हमेशा अमेरिका को इस बात की धमकी देता रहता है कि वह उसके सैनिकों पर हमला कर देगा, यही ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ ‘पहले हमले' का सबसे बड़ा बहाना मिल गया है। आर्थिक मजबूरियों और भूराजनीतिक परिस्थितियों के कारण ईरान के लिए खाड़ी में मौजूद अमेरिकी फौजी ठिकानों को निशाना बनाना न तो आसान है और न ही ईरान तब तक ऐसे हमले करता जब तक कि उसे छेड़ा न जाता किन्तु राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने नागरिकों पर आसन्न खतरे से बचाव के लिए इस हमले को जरूरी बताकर उचित ठहराया है।
वास्तविकता तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए। उन्हें ईरान में मौलाना राज खत्म करना है, इसके लिए वे हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। कहने को तो 57 मुस्लिम देश हैं किन्तु वे सभी या तो अमेरिका के खिलाफ कुछ भी बोलने या करने का साहस नहीं रखते या फिर बयानवीर की भूमिका निभाकर चुप्पी साथ लेते हैं। ऐसे वक्त में संयुक्त राष्ट्र की निपियता बहुत खलती है। स्थाई सदस्यों की वीटो पावर की वजह से पंगु बनी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जिन उद्देश्यों से बनी है, उसमें पूरी तरह असफल साबित हुई है।
बहरहाल यदि अरब देशों के मध्यस्थता से कुछ बात बन जाए तो अच्छा है, अन्यथा लगता तो यही है कि अब अमेरिका और इजरायल ईरान की न मात्र परमाणविक महत्वाकांक्षा को दफन करने की तैयारी में है बल्कि ईरान में राजनीति सत्ता में आमूल चूल परिवर्तन करने की अपनी योजना को पूरा करेंगे। ऐसे में भारत को बहुत ही सतर्कतापूर्वक अपने कूटनीति कदम उठाने होंगे। ईरान मात्र हमारे लिए एक देश नहीं है बल्कि उसके चाबहार बंदरगाह की वजह से अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक की कनेक्विटी प्रभावित हो सकती है।
दरअसल अमेरिकी फौज ईरान के परमाणु केंद्रों, यूरेनियम संवर्धन केंद्रों और उसके बुनियादी केंद्रों को पूरी तरह तबाह करना चाहता है ताकि ईरान परमाणु कार्पाम चलाने में पूरी तरह असमर्थ हो जाए। सच तो यह है कि अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल से परेशान हैं। इन दोनों को लगता है कि ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल बेहद खतरनाक है इसलिए उसके परमाणु केंद्रों को तहस-नहस करके मिट्टी में मिलाना ही उनके हित में हैं।
लगता है अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हो रहे हमले का बहुत बड़ा कारण यह भी है कि जिस तरह तेहरान आए दिन फारस की खाड़ी और ऊर्जा गलियारे को बाधित करने की धमकी देता रहता है। अमेरिका और इजरायल मानते हैं कि जल डमरू मध्य और फारस की खाड़ी को पूरी तरह शांत रखा जाना जरूरी हो गया है। अमेरिका चाहता है कि यदि ईरान की नेवी को तबाह कर दिया जाए तो वह खाड़ी के देशों में तैनात अमेरिकी नेवी पर हमले की धमकी भी नहीं देता। यह सच है कि अमेरिकी नेवी बहुत पहले से कई खाड़ी के देशों में तैनात हैं। यदि ईरान ठान ले तो अमेरिकी ठिकानों को निशाना तो बना ही सकता है। अमेरिका ने इसी डर को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए ईरान के खिलाफ लम्बी अवधि तक युद्ध लड़ने का इरादा व्यक्त किया है। यह सच है कि ईरान हमेशा अमेरिका को इस बात की धमकी देता रहता है कि वह उसके सैनिकों पर हमला कर देगा, यही ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ ‘पहले हमले' का सबसे बड़ा बहाना मिल गया है। आर्थिक मजबूरियों और भूराजनीतिक परिस्थितियों के कारण ईरान के लिए खाड़ी में मौजूद अमेरिकी फौजी ठिकानों को निशाना बनाना न तो आसान है और न ही ईरान तब तक ऐसे हमले करता जब तक कि उसे छेड़ा न जाता किन्तु राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने नागरिकों पर आसन्न खतरे से बचाव के लिए इस हमले को जरूरी बताकर उचित ठहराया है।
वास्तविकता तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए। उन्हें ईरान में मौलाना राज खत्म करना है, इसके लिए वे हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। कहने को तो 57 मुस्लिम देश हैं किन्तु वे सभी या तो अमेरिका के खिलाफ कुछ भी बोलने या करने का साहस नहीं रखते या फिर बयानवीर की भूमिका निभाकर चुप्पी साथ लेते हैं। ऐसे वक्त में संयुक्त राष्ट्र की निपियता बहुत खलती है। स्थाई सदस्यों की वीटो पावर की वजह से पंगु बनी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जिन उद्देश्यों से बनी है, उसमें पूरी तरह असफल साबित हुई है।
बहरहाल यदि अरब देशों के मध्यस्थता से कुछ बात बन जाए तो अच्छा है, अन्यथा लगता तो यही है कि अब अमेरिका और इजरायल ईरान की न मात्र परमाणविक महत्वाकांक्षा को दफन करने की तैयारी में है बल्कि ईरान में राजनीति सत्ता में आमूल चूल परिवर्तन करने की अपनी योजना को पूरा करेंगे। ऐसे में भारत को बहुत ही सतर्कतापूर्वक अपने कूटनीति कदम उठाने होंगे। ईरान मात्र हमारे लिए एक देश नहीं है बल्कि उसके चाबहार बंदरगाह की वजह से अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक की कनेक्विटी प्रभावित हो सकती है।