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सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी

प्रकाशित: 20-02-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।
दरअसल शीर्ष अदालत तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने एक याचिका दायर कर उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना किसी को निशुल्क बिजली प्रदान करने का प्रस्ताव दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी व्यक्त की है कि यदि राज्यों की मदद करते हैं तो यह बात पूरी तरह समझ में आती है लेकिन अधिकतर राज्यों का राजस्व घाटे में है, लेकिन वे विकास की अनदेखी करते हुए इस तरहकी मुफ्त सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इसतरह की सुविधाएं देने से देश के आर्थिक विकास में बाधाएं पैदा होती हैं।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ पूरे देश से है कि आखिर भारत में हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं? अदालत ने पूछा कि यह समझ में तो आता है कि कल्याणकारी योजनाओं के तहत सरकार लोगों को निशुल्क सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं किन्तु जो लोग बिजली के बिल का भुगतान करने में समर्थ हैं भला उन्हें यह मुफ्त की सुविधा क्यों? सुप्रीम कोर्ट के इस तार्किक सवाल का कोई जवाब न तो केंद्र के पास है और नहीं राज्य सरकारों के पास। कारण कि सभी राज्य सरकारों को दोबारा सत्ता हासिल करनी होती है, इसलिए राजनीतिक पार्टियां ऐसी घोषणाएं करती हैं जो स्पष्ट तौर पर तुष्टीकरण होता है।
लब्बोलुआब यह है कि जरूरतमंद नागरिकों को सरकार सुविधाएं मुफ्त में दे किन्तु आर्थिक रूप से संपन्न एवं समर्थ लोगों को यह सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। हैरानी की बात तो यह है कि दिल्ली की डीटीसी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा सुविधा मिली हुई है। सच तो यह है कि जब कोई सरकार उपभोक्ताओं को मात्र वोटर मानकर कुछ सुविधाएं देती है तो उस व्यवस्था का कबाड़ा होना निश्चित है। असल में सरकारें सरकारी संपत्ति को अपनी पार्टी की संपत्ति मानती हैं। यदि वे यह मानने लगें कि इन संपत्तियों के वे मात्र ट्रस्टी हैं, तब कदाचित मुफ्त में बिजली, मुफ्त में बस सेवा, रंगीन टीवी और कैश वितरण की प्रवृत्ति पर स्वत रोक लगाने का प्रयास सरकारें करें किन्तु जब तक सत्ता में बने रहने की राजनेताओं को ललक होगी तब तक वे राज्य या राष्ट्र की संपत्ति का खुद को ट्रस्टी मानने के बजाए स्वामी ही मानते रहेंगे और सस्ती लोकप्रियता के लिए अत्यन्त आवश्यक सेवाओं को मुफ्त में बांटने की घोषणाएं इसी तरह होती रहेंगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बातों पर भले ही केंद्र और राज्य सरकारें ध्यान न दें किन्तु कभी न कभी तो यह स्वीकार करना ही पड़ेगा ]िक आखिर अब और कितनी सुविधाएं मुफ्त में दी जानी चाहिए?