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चीन की नई कूटनीति या पुरानी चाल? भारत के लिए भरोसा या भविष्य का धोखा

प्रकाशित: 18-02-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
हाल के वर्षों में उपग्रह तस्वीरों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह संकेत मिले हैं कि चीन अपने सामरिक ढांचे को तेजी से मजबूत कर रहा है। दक्षिण-पश्चिमी प्रांतों में पहाड़ों के भीतर बने बड़े-बड़े बंकर, भूमिगत सुरंगें और अत्याधुनिक सुविधाएं इस ओर इशारा करती हैं कि बीजिंग अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर चुपचाप काम कर रहा है। ऐसे समय में जब वह भारत के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने और सहयोग बढ़ाने की बात करता है, यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या चीन वास्तव में भरोसेमंद साझेदार बनना चाहता है या यह उसकी रणनीतिक नीति का हिस्सा है। इतिहास गवाह है कि भारत और चीन के संबंधों में विश्वास की कमी की जड़ें गहरी हैं। वर्ष 1962 में चीन द्वारा भारत पर किया गया हमला दोनों देशों के रिश्तों में एक स्थायी अविश्वास की दीवार खड़ी कर गया। उसके बाद से सीमा विवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव और समय-समय पर होने वाली झड़पों ने यह स्पष्ट किया कि संबंधों में गर्मजोशी और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है। चीन ने कई बार शांति और सहयोग की बात की, लेकिन समानांतर रूप से अपनी सैन्य और सामरिक ताकत को भी बढ़ाया। चीन की विदेश नीति को समझने के लिए उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को देखना जरूरी है। वह तात्कालिक भावनाओं के बजाय दशकों आगे की योजना बनाकर चलता है। उसकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और विस्तार है। चाहे वह दक्षिण चीन सागर हो, ताइवान का मुद्दा हो या हिमालयी सीमा हर जगह उसकी नीति शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने की रही है। ऐसे में यदि वह भारत के साथ रिश्ते सुधारने की पहल करता है, तो यह केवल सद्भावना का परिणाम नहीं बल्कि एक सुविचारित रणनीति भी हो सकती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में चीन कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक तनाव, तकनीकी प्रतिबंध और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने उसे नए संतुलन की तलाश में डाल दिया है। भारत एक उभरती हुई आर्थिक और सामरिक शक्ति है। एशिया में स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए भारत के साथ टकराव चीन के हित में नहीं है। इसलिए संभव है कि वह सीमित सहयोग और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की नीति अपनाए, ताकि वह एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष से बच सके। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि चीन की नीतियों में पारदर्शिता का अभाव रहा है। उसकी सैन्य तैयारियों और परमाणु ढांचे के विस्तार को लेकर अक्सर बाहरी दुनिया को सीमित जानकारी ही मिलती है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।