दुनिया हर साल खो देती है 24 अरब टन उपजाऊ भूमि
प्रकाशित: 17-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
संयुक्त राष्ट्र हर साल 17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखे का मुकाबला करने के लिए विश्व मरुस्थलीकरणएवंसूखाविरोधीदिवस मनाता है। इस वर्ष इस दिवस की थीम चारागाह : पहचानें और सम्मान करें रखी गई है। इस वर्ष की थीम पारिस्थितिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, लोगों की आजीविका और मानवता के सतत विकास में भूमि, घास के मैदानों, जंगलों, जल संसाधनों और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल देता है। भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। भारत की बात करें तो यहां उपजाऊ भूमि के बंजर होने का खतरा निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में मात्र 11ज्ञ् जमीन ही उपजाऊ है। मरुस्थलीकरण का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है। भारत की कुल भूमि का लगभग 30ज्ञ् हिस्सा मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित है। भारत में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर बताई जा रही है। बंजरपन का रकबा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है जिसे सख्ती से रोका नहीं गया तो देश में अनाज का संकट खड़ा हो सकता है। जलवायु परिवर्तन सहित सूखा, बाढ़,जहरीले कीटनाशकों के तेजी से इस्तेमाल, वनों की कटाई, अधिक चराई, खराब सिंचाई और अत्यधिक जल दोहन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आने से उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है। विश्व के समक्ष यह एक बड़ी समस्या है जो दिन प्रतिदिन गहराती जा रही है। हमारे लाख प्रयासों के बावजूद मरुस्थल का फैलाव रोका नहीं जा सका है। इस समस्या की जड़ में एक वजह मानवजनित कारणों को बताया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया हर साल 24 अरब टन उपजाऊ भूमि खो देती है। भूमि की गुणवत्ता खराब होने से राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में हर साल आठ प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। भूमि क्षरण और उसके दुष्प्रभावों से मानवता पर मंडराते जलवायु संकट के और गहराने की आशंका है। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े खतरे हैं जिनसे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, प्रभावित हो रहे हैं। इससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों की महती जरुरत है।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।