वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

देश का भविष्य स्कूलों में तैयार होता है

प्रकाशित: 22-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
देश के अनेक राज्यों में जैन अल्फा के स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों से जुड़ी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरना महज एक सामान्य विरोध-प्रदर्शन नहीं है। इसे देश में उभरते हुए एक नए प्रकार के छात्र जनआंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। खास बात यह है कि इस पहल में शामिल अधिकांश विद्यार्थी किसी राजनीतिक संगठन या पारंपरिक आंदोलनकारी समूह का हिस्सा नहीं हैं। वे स्कूलों में पढ़ने वाले सामान्य छात्र-छात्राएं हैं, जो अपने रोजमर्रा के अनुभवों और समस्याओं को लेकर प्रशासन तथा सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय बात विद्यार्थियों का बढ़ता आत्मविश्वास है। अब ये छात्र जिला कलेक्टर जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने से नहीं झिझकते। वे जिला शिक्षा अधिकारियों से सीधे सवाल करते हैं और जनप्रतिनिधियों को भी रोककर स्कूलों की स्थिति, आने-जाने की समस्या, सड़क, पानी, शौचालय, शिक्षकों की उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर जवाब मांगते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों और सरकारी व्यवस्थाओं के प्रति पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो रही है। इन विद्यार्थियों की मांगों का स्वरूप भी इस आंदोलन को अलग बनाता है। उनकी प्राथमिकता राजनीतिक नारे या सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि स्कूलों में आवश्यक सुविधाओं और बेहतर शिक्षा की उपलब्धता है। वे उन समस्याओं को सामने ला रहे हैं जिनका सीधा संबंध उनके भविष्य से है। कहीं विद्यालय तक पहुंचने के लिए सड़क की समस्या है, कहीं पीने का पानी उपलब्ध नहीं है, कहीं शौचालय की स्थिति खराब है, कहीं मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता पर सवाल हैं और कहीं शिक्षकों की नियमित उपस्थिति तथा पढ़ाई की व्यवस्था चिंता का विषय है। ये समस्याएं देखने में छोटी लग सकती हैं, लेकिन विद्यार्थी के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता पर इनका गहरा प्रभाव पड़ता है। इस आंदोलन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्कूल की यूनिफॉर्म में अपनी बात रखते दिखाई देते हैं। इससे उनके आंदोलन की पहचान स्पष्ट रहती है और उनकी मांगों को व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ से जोड़ना कठिन होता है। इनमें आाढाsश की जगह समस्या का समाधान खोजने की इच्छा अधिक दिखाई देती है। यदि यह भावना लंबे समय तक बनी रहती है तो यह आंदोलन स्कूलों की व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। राज्य सरकारों के लिए भी यह स्थिति एक नई चुनौती के रूप में सामने आई है। राजस्थान में विद्यार्थियों की सािढयता ने स्कूली व्यवस्था से जुड़े सवालों को प्रशासन और सरकार के सामने अधिक मजबूती से रखा है। सरकारें सुधार की बात करती रही हैं, लेकिन दूसरी ओर स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, वीडियो बनाने और फोटोग्राफी जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग प्रकार के प्रशासनिक प्रबंध किए जाने की चर्चा भी सामने आई है। उप्र में भी मुख्यमंत्री स्तर से अधिकारियों को स्कूलों की व्यवस्थाओं में कमी मिलने पर उसे दूर करने और समाधान निकालने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।