विलुप्त होते जा रहे हैं जीव-जंतु और वनस्पतियां
प्रकाशित: 17-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
जलवायु परिवर्तन से दुर्लभ प्रजाति वाले जीव-जंतु और वनस्पतियां लुप्त होती जा रही हैं। जमीन, वायु और समुद्री जीव जंतुओं और वहां की वनस्पतियां इस संकट से जूझ रही हैं। जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन शुरू कर दिया। जंगलों को खत्म कर दिया गया। ऐसे ही कितने ही जीव-जंतुओं का शिकार इस हद तक किया गया कि वह विलुप्त होने की कगार में हैं और कुछ तो विलुप्त भी हो गए। पूरा संसार जंतु तथा पेड़-पौधों की विभिन्न प्रजातियों से भरा हुआ है। सभी प्रजातियों के जीव, जंतु, पेड़, पौधे तथा पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व के लिए अपने-अपने तरीकों से महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। वन्यजीव मानव अस्तित्व के समय से ही धरती पर उपस्थित हैं, तथा एक-दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग भी बन चुके हैं। नई बस्तियां बसाने, औद्योगीकरण, बढ़ती हुई आबादी, गैरकानूनी व्यापार तथा शिकार इत्यादि कार्यों का वन्यजीवों पर विपरीत असर पड़ रहा है। धरती जीव- जंतुओं तथा पौधों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या इतनी अधिक तेजी से घट रही है, जितनी तेज गति से यह पूर्व में शायद ही कभी घटी हो। प्रत्येक 24 घंटे के अंदर जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों की लगभग 200 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। इस भांति प्रति वर्ष करीब 73000 प्रजातियां पृथ्वी से विलुप्त हो रही हैं। भारत में विश्व के 5 प्रतिशत अर्थात 75000 प्रजातियों के जीव-जन्तु निवास करते हैं तथा वनस्पतियों की 45000 प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं लेकिन आज इनमें से कई विलुप्त हो गई हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर हैं। प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे का पहला कारण इनके रहने की जगह लगातार कम होना है। और इसके लिए जिम्मेदार इंसान हैं क्योंकि इनको भोजन और आश्रय प्रदान करने वाले पेड़ों को वह अपने स्वार्थ के लिए लगातार काट रहे हैं। साथ ही खनन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1992 से आज तक दुनिया भर में शहरों की संख्या दोगुनी हो गई है। जिस तरह से वर्ष 1980 से आज तक प्लास्टिक का उपयोग हुआ इसमें से 300-400 मिलियन टन विषैली धातुओं को समुद्र में डंप करके उसे जहरीला बना दिया और समुद्री जीवों का जीवन दूभर कर दिया। यह सभी जानते है कि दुनिया में मानसून समुद्र से ही तय होते हैं। ऐसे में अगर समुद्र ही दूषित होंगे तो वर्षा का जल किस प्रकार सुरक्षित हो सकता है। वर्ष 1980-2000 के बीच हमने भारी मात्रा में उष्ण कटिबंधीय वनों को नष्ट कर दिया। पिछले 5 दशकों में हमारी वनों की आवश्यकता करीब 45 फीसदी बढ़ गई है। वन्यजीव जानवर और पौधे प्रकृति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। किसी भी स्तर पर नुकसान होने पर इसके अप्राकृतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। वे पारिस्थितिक संतुलन के लिए जिम्मेदार हैं और मानव जाति के निर्वाह के लिए, यह संतुलन बनाए रखना चाहिए।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।