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सरकार का साहित्य से नहीं है कोई लेना-देना

प्रकाशित: 21-02-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
देखा जाता है समय समय पर सरकार के मुखिया अपने भाषणों में साहित्य और संस्कृति के उन्नयन की बात जोर शोर से करते रहते है मगर असल में सरकार का साहित्य और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। इसका ज्वलंत उदाहरण राजस्थान का लिया जा सकता है। हो सकता है अन्य सरकारों का भी यही रवैया हो। साहित्यकार भी संतोषजीवी है। वे अपने अधिकारों के प्रति सजग और सतर्क नहीं है। यही कारण है कि सरकारों का रवैया साहित्य के प्रति कभी अनुकूल नहीं होता। साहित्य और साहित्यकार किसी सरकार के प्रश्रय और मोहताज़ नहीं होते है। सत्य और तथ्य को बेलाग उद्घाटित करना रचनाधर्मिता है। साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाजहित में सामाजिक मूल्यों और सम्वेदनाओं को दृष्टि प्रदान करते हैं। संघर्ष पथ के राही के रूप में जीवन मूल्यों को प्रशस्त करते हुए दीनहीन की आवाज को बुलन्द करते हैं। शोषण विहीन समाज की स्थापना में साहित्य का अहम योगदान है। साहित्यकार समाज में जनजागरण का कार्य करते हैं। आज यही साहित्य सरकारों के कोपभाजन का शिकार है। लगता है सरकारों ने साहित्य, संस्कृति और कला से अपना मुंह मोड़ लाया है। इसका एक ताज़ा उदहारण राजस्थान है। पिछली गहलोत सरकार का अनुसरण करते हुए वर्तमान भजन लाल सरकार ने भी इस दिशा में अपनी कोई रूचि प्रदर्शित नहीं की है। राज्य में भजन लाल शर्मा सरकार के गठन के दो साल बाद भी प्रदेश की साहित्य कला, भाषा और संस्कृति के उन्नयन के लिए गठित एक दर्ज़न से अधिक अकादमियों में सन्नाटा पसरा है। अकादमियों में व्याप्त इस सन्नाटे को अगर जल्द नहीं तोड़ा गया तो इसका असर बहुत गहरा होगा। राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण ने गत वर्ष मुख्यमंत्री भजनलाल को एक खुला पत्र लिखकर राज्य की साहित्यिक और सांस्कृतिक अकादमियों की बदहाल स्थिति पर चिंता जताई।
-बाल मुकुंद ओझा,
जयपुर, राजस्थान।