यौन उत्पीड़न और हत्या मामले में 16 साल से जेल में बंद व्यक्ति को उच्चतम न्यायालय ने किया बरी
प्रकाशित: 03-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली , (विसं)। उच्चतम न्यायालय ने एक व्यक्ति को नाबालिग बच्चे के कथित यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले में बुधवार को बरी कर दिया। वह इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद 16 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले की कड़ी में कई ''कड़ियां गायब'' हैं। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने व्यक्ति को दोषी हराकर उम्रकैद की सजा सुनाने में गलती की थी और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखकर गलती की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अपराध का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था और पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों तथा आरोपी और पीड़ित को ''अंतिम बार साथ देखे जाने'' के सिद्धांत पर आधारित था। पीठ ने कहा कि आरोपी द्वारा गांव के सरपंच के समक्ष कथित रूप से दिए गए न्यायेतर स्वीकारोक्ति का कोई ''विश्वसनीय स्पष्टीकरण'' नहीं है, क्योंकि न तो आरोपी और न ही पीड़ित का सरपंच से कोई संबंध था। पीठ ने कहा, ''न्यायेतर स्वीकारोक्ति कमजोर साक्ष्य होती है और स्वतंत्र तथा ठोस पुष्टिकारक परिस्थितियों या साक्ष्य के बिना इसे अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।'' शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कोई न्यायालय अभियोजन पक्ष के पूरे साक्ष्य का उचित मूल्यांकन करने के बाद न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि करना चाहता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह भरोसा पैदा करती हो और अन्य साक्ष्यों से उसकी पुष्टि होती हो। पीठ ने कहा, ''यदि न्यायेतर स्वीकारोक्ति में महत्वपूर्ण विरोधाभास या आंतरिक असंभावनाएं हों और वह अभियोजन पक्ष के दावे के अनुरूप ठोस प्रतीत न हो, तो ऐसी स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि करना कठिन हो सकता है।''
शीर्ष अदालत ने कहा कि अपराध का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था और पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों तथा आरोपी और पीड़ित को ''अंतिम बार साथ देखे जाने'' के सिद्धांत पर आधारित था। पीठ ने कहा कि आरोपी द्वारा गांव के सरपंच के समक्ष कथित रूप से दिए गए न्यायेतर स्वीकारोक्ति का कोई ''विश्वसनीय स्पष्टीकरण'' नहीं है, क्योंकि न तो आरोपी और न ही पीड़ित का सरपंच से कोई संबंध था। पीठ ने कहा, ''न्यायेतर स्वीकारोक्ति कमजोर साक्ष्य होती है और स्वतंत्र तथा ठोस पुष्टिकारक परिस्थितियों या साक्ष्य के बिना इसे अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।'' शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कोई न्यायालय अभियोजन पक्ष के पूरे साक्ष्य का उचित मूल्यांकन करने के बाद न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि करना चाहता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह भरोसा पैदा करती हो और अन्य साक्ष्यों से उसकी पुष्टि होती हो। पीठ ने कहा, ''यदि न्यायेतर स्वीकारोक्ति में महत्वपूर्ण विरोधाभास या आंतरिक असंभावनाएं हों और वह अभियोजन पक्ष के दावे के अनुरूप ठोस प्रतीत न हो, तो ऐसी स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि करना कठिन हो सकता है।''