अस्थमा से बढ़ती मौतें और इनहेलर की सुलभता का संकट
प्रकाशित: 05-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रतिवर्ष मईं माह के पहले मंगलवार को ‘विश्व अस्थमा दिवस’ का आयोजन किया जाता है, जो इस वर्ष 5 मईं को मनाया जाता है। यह उन करोड़ों लोगों की जीवनशैली और स्वास्थ्य चुनौतियों को रेखांकित करने का एक वैश्विक मंच है, जो हर दिन एक-एक सांस के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस वर्ष ‘द ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा’
(जीआईंएनए) द्वारा निर्धारित विषय ‘अस्थमा से पीिड़त सभी लोगों के लिए सूजनरोधी इनहेलर की उपलब्धता, अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता है’ स्वास्थ्य जगत के समक्ष एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यह विषय सीधे तौर पर उस विसंगति पर प्रहार करता है, जहां आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के बावजूद एक बड़ी आबादी को जीवनरक्षक इनहेल्ड कर्ॉटिकोस्टेरॉइड्स जैसी बुनियादी दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। अस्थमा एक ऐसी दीर्घकालिक बीमारी है, जो पेफड़ों के वायुमार्ग को प्रभावित करती है, जिससे उनमें सूजन आ जाती है और वे संवुचित हो जाते हैं। इस स्थिति में मरीज को सांस लेने में भारी कठिनाईं, सीने में जकड़न, लगातार खांसी और घरघराहट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विडंबना यह है कि अस्थमा के उपचार के लिए प्रभावी चिकित्सा मौजूद होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर होने वाली मौतों का आंकड़ा डरावना है। वर्तमान वैश्विक सांख्यिकी के अनुसार, दुनियाभर में 33 करोड़ से अधिक लोग इस व्याधि से जूझ रहे हैं और हर साल लगभग 4.61 लाख लोग इसके कारण काल के गाल में समा जाते हैं।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है क्योंकि विश्व की वुल अस्थमा मौतों का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में दर्ज होता है जबकि भारत में मरीजों की संख्या लगभग तीन करोड़ के आसपास है, फिर भी मृत्यु दर का इतना ऊंचा होना हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों और जागरूकता के स्तर पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अस्थमा की गंभीरता को समझने के लिए इसके शारीरिक तंत्र को जानना आवश्यक है। जब कोईं अस्थमा रोगी किसी ‘ट्रिगर’, जैसे धूल, धुआं या प्रदूषण के संपर्व में आता है तो उसके वायुमार्ग की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। वायुमार्ग के चारों ओर की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और आंतरिक परत में सूजन आ जाती है, जिससे बलगम का निर्माण बढ़ जाता है। यह प्रािया पेफड़ों में हवा के प्रवाह को बाधित करती है, जिससे व्यत्ति को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह एक संकरी नली के माध्यम से सांस लेने की कोशिश कर रहा हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन और ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट के तुलनात्मक अध्ययन बताते हैं कि पिछले वुछ वर्षो में अस्थमा का ग्राफ तेजी से ऊपर बढ़ा है। वर्ष 2019 में जहां प्रभावितों की संख्या 26.2 करोड़ थी, वहीं 2026 तक आते-आते यह आंकड़ा 33 करोड़ को पार कर चुका है। भारत में लगभग 90 प्रतिशत मरीजों को समय पर सही और गुणवत्तापूर्ण इलाज न मिल पाना इस बीमारी को जानलेवा बना देता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
इस वर्ष ‘द ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा’
(जीआईंएनए) द्वारा निर्धारित विषय ‘अस्थमा से पीिड़त सभी लोगों के लिए सूजनरोधी इनहेलर की उपलब्धता, अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता है’ स्वास्थ्य जगत के समक्ष एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यह विषय सीधे तौर पर उस विसंगति पर प्रहार करता है, जहां आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के बावजूद एक बड़ी आबादी को जीवनरक्षक इनहेल्ड कर्ॉटिकोस्टेरॉइड्स जैसी बुनियादी दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। अस्थमा एक ऐसी दीर्घकालिक बीमारी है, जो पेफड़ों के वायुमार्ग को प्रभावित करती है, जिससे उनमें सूजन आ जाती है और वे संवुचित हो जाते हैं। इस स्थिति में मरीज को सांस लेने में भारी कठिनाईं, सीने में जकड़न, लगातार खांसी और घरघराहट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विडंबना यह है कि अस्थमा के उपचार के लिए प्रभावी चिकित्सा मौजूद होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर होने वाली मौतों का आंकड़ा डरावना है। वर्तमान वैश्विक सांख्यिकी के अनुसार, दुनियाभर में 33 करोड़ से अधिक लोग इस व्याधि से जूझ रहे हैं और हर साल लगभग 4.61 लाख लोग इसके कारण काल के गाल में समा जाते हैं।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है क्योंकि विश्व की वुल अस्थमा मौतों का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में दर्ज होता है जबकि भारत में मरीजों की संख्या लगभग तीन करोड़ के आसपास है, फिर भी मृत्यु दर का इतना ऊंचा होना हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों और जागरूकता के स्तर पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अस्थमा की गंभीरता को समझने के लिए इसके शारीरिक तंत्र को जानना आवश्यक है। जब कोईं अस्थमा रोगी किसी ‘ट्रिगर’, जैसे धूल, धुआं या प्रदूषण के संपर्व में आता है तो उसके वायुमार्ग की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। वायुमार्ग के चारों ओर की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और आंतरिक परत में सूजन आ जाती है, जिससे बलगम का निर्माण बढ़ जाता है। यह प्रािया पेफड़ों में हवा के प्रवाह को बाधित करती है, जिससे व्यत्ति को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह एक संकरी नली के माध्यम से सांस लेने की कोशिश कर रहा हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन और ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट के तुलनात्मक अध्ययन बताते हैं कि पिछले वुछ वर्षो में अस्थमा का ग्राफ तेजी से ऊपर बढ़ा है। वर्ष 2019 में जहां प्रभावितों की संख्या 26.2 करोड़ थी, वहीं 2026 तक आते-आते यह आंकड़ा 33 करोड़ को पार कर चुका है। भारत में लगभग 90 प्रतिशत मरीजों को समय पर सही और गुणवत्तापूर्ण इलाज न मिल पाना इस बीमारी को जानलेवा बना देता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)