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महाराज छत्रसाल बुंदेला का संघर्ष सत्ता के लिए नहीं, आत्मसम्मान और स्वराज के लिए

प्रकाशित: 04-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
महाराज छत्रसाल बुंदेला का संघर्ष सत्ता के लिए नहीं, आत्मसम्मान और स्वराज के लिए
भारत के इतिहास में वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता संग्राम की जब भी चर्चा होती है, तो बुंदेलखंड के महान योद्धा महाराजा छत्रसाल बुंदेला का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। 4 मईं को उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना न केवल उनके पराम को नमन करना है, बल्कि उस स्वतंत्रता चेतना को भी याद करना है, जिसने मुगलकालीन दमन के विरुद्ध जन-जन में आत्मविश्वास जगाया। महाराजा छत्रसाल का जन्म 4 मईं 1649 को बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता चंपतराय बुंदेला स्वयं एक पराव्रमी योद्धा थे, जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया। बाल्यकाल से ही छत्रसाल ने युद्ध कौशल, शौर्यं और स्वाधीनता की भावना अपने पिता से ही सीखी। कठिन परिस्थितियों में पलेबढ़ े छत्रसाल ने अपने जीवन का उद्देश्य अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को बना लिया।
युवावस्था में छत्रसाल ने दक्षिण भारत जाकर छत्रपति शिवाजी महाराज से भेंट की। शिवाजी महाराज के स्वराज और गुरिल्ला युद्ध नीति से वे अत्यंत प्रभावित हुए। कहा जाता है कि शिवाजी ने उन्हें बुंदेलखंड लौटकर वहां स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। यही प्रेरणा आगे चलकर उनके जीवन का आधार बनी। छत्रसाल बुंदेला ने मुगलों के विरुद्ध सशत्त संघर्ष छेड़ा और धीरे-धीरे बुंदेलखंड के विशाल क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया।
उन्होंने न केवल युद्ध में विजय प्राप्त की, बल्कि एक सुदृढ़ और सुव्यवस्थित राज्य की नींव भी रखी।
सुरेश सिह बैस ‘शाश्वत’