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एलओसी पर लौटती रौनक कश्मीर में शांति और विश्वास की नई तस्वीर

प्रकाशित: 28-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
कांतिलाल मांडोत
जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा (एलओसी) का नाम सुनते ही लंबे समय तक लोगों के मन में गोलाबारी, घुसपैठ, आतंकवाद और तनाव की तस्वीर उभरती थी। यह वह इलाका था जहां रहने वाले लोगों का जीवन हर पल अनिश्चितता से घिरा रहता था। खेतों में काम करने से लेकर बच्चों के स्कूल जाने तक हर गतिविधि पर सुरक्षा परिस्थितियों का असर दिखाई देता था। लेकिन समय के साथ इस क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदली है। आज वही एलओसी पर्यटकों के आकर्षण का नया केंद्र बनती जा रही है। जिन रास्तों पर कभी सैनिकों की आवाजाही और गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां आज पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते दिखाई देते हैं। यह बदलाव केवल पर्यटन की बढ़ती संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कश्मीर में लौटते विश्वास, सामान्य होते जनजीवन और स्थानीय लोगों की बदलती जिंदगी की कहानी भी कहता है।
इस वर्ष केवल सात महीनों में ही एलओसी के विभिन्न क्षेत्रों में चार लाख से अधिक पर्यटक पहुंच चुके हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष समाप्त होने तक यह संख्या सात लाख के पार पहुंच सकती है। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक पूरे वर्ष में भी इतने पर्यटक कभी नहीं पहुंचे थे।
वर्ष 2020 में जहां मात्र 7900 पर्यटक इन क्षेत्रों तक पहुंचे थे, वहीं अब यह संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया बल्कि इसके पीछे कई वर्षों के प्रयास, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था, आधारभूत ढांचे का विकास और सबसे महत्वपूर्ण भारत-पाकिस्तान के बीच फरवरी 2021 में हुए संघर्षविराम समझौते की बड़ी भूमिका रही है।
एलओसी के केरन, गुरेज, उरी, माछिल, तंगधार और किशनगंगा घाटी जैसे क्षेत्र अब पर्यटन मानचित्र पर तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। इन इलाकों की प्राकृतिक सुंदरता हमेशा से अद्भुत रही है, लेकिन सुरक्षा कारणों से आम लोगों की पहुंच यहां तक नहीं हो पाती थी। अब पर्यटक यहां की हरी-भरी वादियों, बर्फ से ढके पहाड़ों, बहती नदियों और शांत वातावरण का आनंद लेने पहुंच रहे हैं।
किशनगंगा नदी के किनारे लगाए गए टेंट और स्थानीय होमस्टे पर्यटकों से भरे हुए हैं। लोग यहां केवल प्रकृति देखने नहीं आते, बल्कि सीमावर्ती गांवों के जीवन को करीब से समझने और भारत की सीमा से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गांवों को देखने का भी अनुभव प्राप्त करते हैं।
पर्यटन के इस विस्तार का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय लोगों को मिला है। वर्षों तक सीमित अवसरों और असुरक्षा के कारण रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वाले अनेक परिवार अब वापस अपने गांव लौट रहे हैं। अपने पुश्तैनी मकानों को होमस्टे में बदलकर वे पर्यटकों की मेजबानी कर रहे हैं। युवा गाइड, टैक्सी चालक, टेंट संचालक, स्थानीय हस्तशिल्प विक्रेता और छोटे व्यवसायी बनकर अपनी आजीविका कमा रहे हैं। जिन गांवों में पहले बेरोजगारी और निराशा का माहौल था, वहां अब आर्थिक गतिविधियों की नई ऊर्जा दिखाई दे रही है।
स्थानीय लोगों की मेहमाननवाजी भी पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। कश्मीरी खानपान, नून चाय, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक जीवन शैली पर्यटकों के लिए एक नया अनुभव बन रही है। सोशल मीडिया पर इन क्षेत्रों की तस्वीरें और वीडियो तेजी से साझा किए जा रहे हैं। ट्रैवल ब्लॉगर और कंटेंट ािढएटर इन स्थानों को देशभर में लोकप्रिय बना रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले जहां लोग केवल गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग तक ही अपनी यात्रा सीमित रखते थे, अब वे एलओसी के गांवों तक पहुंचने लगे हैं।
यह बदलाव केवल पर्यटन का विस्तार नहीं है बल्कि सामाजिक विश्वास की पुनर्स्थापना का भी प्रतीक है। लंबे समय तक संघर्ष झेलने वाले सीमावर्ती गांवों में अब सामान्य जीवन लौटता दिखाई दे रहा है। बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं, किसान खेती में जुटे हैं और महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। सड़क, बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाओं के विस्तार ने इन गांवों को देश की मुख्यधारा से अधिक मजबूती से जोड़ दिया है।
सरकार की विभिन्न योजनाओं ने भी इस परिवर्तन को गति दी है। सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम और वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत आधारभूत सुविधाओं में सुधार किया गया है। बेहतर सड़कें, संचार व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं और पर्यटन सुविधाओं के विकास ने सीमावर्ती क्षेत्रों को नई पहचान दी है। सेना और स्थानीय प्रशासन ने भी पर्यटन को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सुरक्षा के साथ-साथ पर्यटकों को सकारात्मक अनुभव देने का प्रयास इन क्षेत्रों की लोकप्रियता बढ़ाने में सहायक बना है।
एलओसी के इस पार ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की ओर भी सीमावर्ती इलाकों में पर्यटन और व्यापार में कुछ बढ़ोतरी की खबरें सामने आई हैं। सीमावर्ती गांवों के लोग बताते हैं कि दोनों ओर से आने वाले पर्यटक एक-दूसरे को हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं। यह दृश्य बताता है कि सीमाओं के बावजूद आम लोगों की इच्छा शांति और सामान्य जीवन की ही होती है। हालांकि दोनों देशों के राजनीतिक संबंध अपने स्थान पर हैं, लेकिन सीमावर्ती समाज के स्तर पर शांति का वातावरण लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
पहलगाम आतंकी हमले जैसी घटनाओं के बाद कुछ समय के लिए पर्यटकों की संख्या में गिरावट अवश्य आई थी। ऐसे हादसे यह याद दिलाते हैं कि कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता अभी भी आवश्यक है। लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि इन घटनाओं के बावजूद लोगों का विश्वास पूरी तरह नहीं टूटा। कुछ समय बाद पर्यटक फिर लौटे और पर्यटन गतिविधियां दोबारा गति पकड़ने लगीं। यह दर्शाता है कि अब कश्मीर की पहचान केवल संघर्ष से नहीं बल्कि उसकी प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और मेहमाननवाजी से भी बनने लगी है।
यह कहना सही नहीं होगा कि कश्मीर की सभी समस्याएं पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। सुरक्षा चुनौतियां अब भी मौजूद हैं और समय-समय पर सतर्क रहने की आवश्यकता बनी रहेगी। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि जिन क्षेत्रों में कभी सामान्य जीवन भी कठिन था, वहां आज हजारों पर्यटक प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है। पर्यटन किसी भी क्षेत्र में तभी विकसित होता है जब वहां लोगों को सुरक्षा, सुविधा और विश्वास का वातावरण महसूस हो। एलओसी के गांवों में बढ़ती पर्यटक संख्या इसी विश्वास का संकेत देती है।
कश्मीर की यह बदलती तस्वीर कई संदेश देती है। पहला, शांति का सबसे बड़ा लाभ आम नागरिक को मिलता है। दूसरा, विकास और सुरक्षा साथ-साथ चलें तो सीमावर्ती क्षेत्र भी समृद्धि के नए केंद्र बन सकते हैं। तीसरा, स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना कोई भी विकास स्थायी नहीं हो सकता। आज सीमावर्ती गांवों के निवासी स्वयं पर्यटन के भागीदार बनकर इस परिवर्तन को आगे बढ़ा रहे हैं।
कश्मीर की वादियां हमेशा से स्वर्ग जैसी सुंदर रही हैं। अंतर केवल इतना है कि अब वहां की सुंदरता को देखने और महसूस करने का अवसर पहले की तुलना में अधिक लोगों को मिल रहा है। एलओसी पर बढ़ती पर्यटकों की भीड़ केवल पर्यटन का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास का प्रतीक है जो धीरे-धीरे लोगों के मन में लौट रहा है। जहां कभी बारूद की गंध थी वहां आज नून चाय की खुशबू है, जहां कभी डर का साया था वहां आज कैमरों की फ्लैश और मुस्कुराते चेहरों की रौनक है। यही परिवर्तन कश्मीर की नई कहानी है और यही शांति बहाली की सबसे जीवंत तस्वीर भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)