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यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सारनाथ

प्रकाशित: 28-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
सारनाथ का यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होना भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। भगवान बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था, जिसे बौद्ध धर्म में धर्मपा प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। यही वह स्थान है जहाँ से बौद्ध धर्म का व्यवस्थित प्रचार-प्रसार प्रारंभ हुआ। सारनाथ में स्थित धामेक स्तूप, अशोक स्तंभ, चौखंडी स्तूप, प्राचीन विहारों के अवशेष तथा पुरातात्विक संग्रहालय विश्वभर के इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। यूनेस्को द्वारा इस स्थल को विश्व धरोहर का दर्जा मिलना केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की साझा सांस्कृतिक धरोहर को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने का प्रतीक है।
विश्व धरोहर सूची में किसी भी स्थल का चयन उसकी असाधारण सार्वभौमिक महत्ता के आधार पर किया जाता है। इसके लिए उस स्थल की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, स्थापत्य, धार्मिक अथवा प्राकृतिक विशिष्टता का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। किसी स्थल के चयन के बाद उसके संरक्षण, रखरखाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान और प्रतिष्ठा में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
सारनाथ को यह मान्यता मिलने से उत्तर प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को नया आयाम मिलेगा। वाराणसी, सारनाथ, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे बौद्ध तीर्थ स्थलों को जोड़कर पर्यटन का एक मजबूत नेटवर्क विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और पर्यटन आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। साथ ही भारत आने वाले बौद्ध देशों-जैसे श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, म्यांमार, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और मंगोलिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि होने की संभावना है।
भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है और इसकी सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध एवं विविधतापूर्ण है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भारत का स्थान विश्व के अग्रणी देशों में है। वर्तमान में भारत के 45 विश्व धरोहर स्थल सूचीबद्ध हैं, जिनमें 34 सांस्कृतिक, 8 प्राकृतिक तथा 3 मिश्रित (श्ग्xाd) धरोहर स्थल शामिल हैं। इस संख्या के आधार पर भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जिनके पास सर्वाधिक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। एशिया में भी भारत का स्थान प्रमुख देशों में माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी पहले से ही विश्व धरोहर सूची में शामिल थे। सारनाथ के शामिल होने से उत्तर प्रदेश के विश्व धरोहर स्थलों की संख्या चार हो गई है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर लगातार मान्यता मिल रही है।
हालाँकि केवल विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है। इन स्थलों के संरक्षण, अपामण से मुक्ति, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक मरम्मत, आधुनिक पर्यटक सुविधाओं का विकास तथा स्थानीय समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि इन पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो धरोहर की मूल पहचान और ऐतिहासिक महत्व प्रभावित हो सकता है। इसलिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण , यूनेस्को और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
सारनाथ को विश्व धरोहर का दर्जा मिलना भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को भी नई शक्ति प्रदान करेगा। यह उपलब्धि भारत की बौद्ध विरासत को विश्व मंच पर और अधिक सशक्त रूप से स्थापित करेगी तथा "वसुधैव कुटुम्बकम्" और शांति, करुणा एवं अहिंसा के भारतीय संदेश को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाएगी। यह उपलब्धि केवल एक ऐतिहासिक स्थल की नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और मानव सभ्यता के प्रति उसके योगदान की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का प्रतीक है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।