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कहीं यह धरना राजनीति की नई प्रयोगशाला तो नहीं?

प्रकाशित: 21-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
धरना समाप्त हो गया, लेकिन अपने पीछे अनेक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह केवल एक धरना था, या किसी नई राजनीतिक भूमिका की प्रस्तावना? पूरे घटनाक्रम में नेतृत्व, उद्देश्य और स्वर लगातार बदलते दिखाई दिए। शुरुआत एक सोशल मीडिया आधारित संगठन के धरने के रूप में हुई, फिर सोनम वांगचुक उसका प्रमुख चेहरा बनकर उभरे और उसके बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की सक्रिय उपस्थिति ने उसे नया राजनीतिक आयाम दे दिया। ऐसे में यह प्रश्न अस्वाभाविक नहीं कि क्या यह धरना केवल एक मुद्दे तक सीमित था, या इसके माध्यम से भविष्य की किसी नई राजनीतिक भूमिका की संरचना भी हो रही थी? धरना समाप्त हो गया है, लेकिन उसके पीछे छूटे प्रश्न अभी भी लोकतांत्रिक विमर्श के सामने खड़े हैं।
भारत में आंदोलनों का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही प्रेरणादायक भी है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व तक अनेक जन आंदोलनों ने देश की दिशा और दशा दोनों बदली हैं। किंतु हर विरोध-प्रदर्शन आंदोलन नहीं होता। आंदोलन वह होता है जिसके पीछे व्यापक सामाजिक उद्देश्य, स्पष्ट वैचारिक दिशा, दीर्घकालिक जनभागीदारी और परिवर्तन का संकल्प हो। इसके विपरीत, सीमित दायरे के धरना-प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार अवश्य हैं, किंतु उन्हें स्वत जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता। किसी भी धरने का मूल्यांकन उसके आकार से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, अनुशासन, वैचारिक स्पष्टता और जन स्वीकार्यता से होता है।
आज के डिजिटल युग में किसी विचार या विरोध को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनने में देर नहीं लगती। सोशल मीडिया कुछ घंटों में किसी व्यक्ति को नायक और किसी अभियान को राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकता है। किंतु डिजिटल लोकप्रियता और वास्तविक जनाधार में अंतर होता है। लोकतंत्र का अंतिम निर्णय मोबाइल की पीन पर नहीं, मतपेटी में होता है। भारत ने ऐसे अनेक डिजिटल अभियानों को देखा है जो कुछ समय बाद स्वत शांत हो गए, जबकि कुछ ने राजनीतिक दलों का रूप भी ले लिया। इसलिए किसी भी नए सामाजिक मंच को लेकर उत्साह जितना स्वाभाविक है, उतनी ही आवश्यक उसके उद्देश्य और दिशा की पड़ताल भी है। भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि गैर-राजनीतिक मंचों से भी राजनीतिक दल जन्म लेते रहे हैं। इसलिए यदि किसी नए धरना-प्रदर्शन के बारे में यह प्रश्न उठता है कि कहीं वह भविष्य की राजनीति की भूमिका तो नहीं लिख रहा, तो इसे असंगत नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में जनता केवल तालियाँ बजाने के लिए नहीं होती; उसे प्रश्न पूछने का भी अधिकार है, और ऐसे प्रश्न लोकतंत्र को ही मजबूत करते हैं।
धरने के पूरे घटनाक्रम में नेतृत्व का स्वरूप भी लगातार बदलता दिखाई दिया। शुरुआत एक सोशल मीडिया आधारित संगठन के मंच से हुई, फिर उसके केंद्र में सोनम वांगचुक दिखाई देने लगे और उसके बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की सक्रिय उपस्थिति ने इस धरने को नया राजनीतिक रंग दे दिया। एक प्रमुख राजनीतिक नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाए जाने का सुझाव भी सामने आया। तब यह प्रश्न और प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह केवल किसी सामाजिक कार्यकर्ता के प्रति सम्मान था, या किसी संभावित राजनीतिक चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का प्रयास?
सोनम वांगचुक की सामाजिक विश्वसनीयता निर्विवाद रही है। लद्दाख के पर्यावरण, स्थानीय अधिकारों और जन सरोकारों के लिए उनके लंबे संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। इसलिए उनसे अपेक्षाएँ भी सामान्य सामाजिक कार्यकर्ताओं से अधिक हैं। यदि वे किसी मंच से जुड़ते हैं तो लोग यह जानना चाहते हैं कि वे उस मंच को केवल नैतिक समर्थन दे रहे हैं या उसकी भावी दिशा के साथ भी स्वयं को जोड़ रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति की नीयत जितनी महत्वपूर्ण होती है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका सार्वजनिक संदेश होता है। भारतीय राजनीति में एक प्रवृत्ति लगातार मजबूत हुई है-हर असंतोष को राजनीतिक पूँजी में बदल देने की। किसी सार्वजनिक विवाद, प्रशासनिक निर्णय या जन-असंतोष के आसपास शीघ्र ही राजनीतिक सािढयता दिखाई देने लगती है। जन भावनाएँ कई बार मुद्दा कम और राजनीतिक अवसर अधिक बन जाती हैं। यही कारण है कि हर नए धरने को लेकर जनता अब केवल नारे नहीं सुनती, बल्कि उसके पीछे की दिशा और अंतिम लक्ष्य को भी समझना चाहती है।
इसी संदर्भ में इस पूरे धरना-प्रदर्शन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। यदि प्रतिनिधिमंडल सरकार से वार्ता के लिए गया था, तो उसी समय बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों का संसद की ओर बढ़ने का प्रयास किस रणनीति का हिस्सा था? लोकतांत्रिक परंपरा तो यह कहती है कि जब संवाद चल रहा हो, तब प्रदर्शनकारी निर्धारित स्थल पर रहकर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखें। वार्ता और समानांतर टकराव-दोनों साथ-साथ कैसे चल सकते हैं? इससे यह आभास अवश्य मिलता है कि धरने का संचालन एक स्पष्ट और अनुशासित नेतृत्व के अधीन नहीं रह गया था। यदि किसी मार्च या प्रदर्शन के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं है और उसके बावजूद सुरक्षा बैरिकेटिंग को पार कर प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ने का प्रयास किया जाता है, तो यह केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, कानून-व्यवस्था का विषय भी बन जाता है। संसद केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी संस्थान है। उसकी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार की सीमा से बाहर का प्रश्न बन जाता है। विरोध का अधिकार संविधान देता है, किंतु उसी संविधान ने कानून के पालन का दायित्व भी प्रत्येक नागरिक पर रखा है।
यह भी विचारणीय है कि यदि ऐसी स्थिति में कोई दुर्घटना हो जाती, किसी प्रदर्शनकारी, पुलिसकर्मी अथवा आम नागरिक की जान-माल की हानि होती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? लोकतंत्र में भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, परंतु उत्तरदायित्व उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ-साथ चलते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में पुलिस की भूमिका पर भी संतुलित दृष्टि आवश्यक है। यदि पुलिस कानूनसम्मत ढंग से भीड़ को रोकने का प्रयास करती है, तो केवल इसलिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि सामने प्रदर्शनकारी हैं। दूसरी ओर पुलिस पर भी यह दायित्व है कि वह संयम, आवश्यकता और कानून की सीमाओं का पालन करे। लोकतंत्र में न कानून तोड़ने का अधिकार है और न कानून लागू करने के नाम पर असीमित बल प्रयोग का। कानून का शासन दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होता है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक अन्य पक्ष भी ध्यान देने योग्य है। धरने के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की बढ़ती उपस्थिति ने स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या यह केवल सामाजिक सरोकारों का मंच रह गया था, या धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति-संचय का माध्यम भी बन रहा था। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक या राजनीतिक दल को समर्थन देने का अधिकार है, किंतु जब सामाजिक प्रश्नों के मंच पर राजनीतिक संभावनाएँ अधिक दिखाई देने लगें, तब जनता के मन में संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से प्रश्न पूछना, उसे जवाबदेह बनाना और वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करना है। किंतु यदि प्रत्येक विषय केवल टकराव का माध्यम बन जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ता है। जनता विपक्ष से केवल विरोध नहीं, बल्कि विकल्प की अपेक्षा भी करती है।
सरकार के लिए भी संदेश स्पष्ट है। लोकतंत्र में असहमति को सुनना, संवाद बनाए रखना और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास करना परिपक्व शासन का लक्षण है। संवाद और कानून-दोनों का संतुलन ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
अंतत प्रश्न किसी एक व्यक्ति, एक संगठन या एक धरना-प्रदर्शन का नहीं है। प्रश्न उस प्रवृत्ति का है जिसमें सामाजिक सरोकारों के नाम पर प्रारंभ हुए धरना-प्रदर्शन धीरे-धीरे राजनीतिक संभावनाओं के मंच बनते दिखाई देते हैं। यदि यह धरना वास्तव में जनहित के किसी स्पष्ट उद्देश्य के लिए था, तो उसका मूल्यांकन उसी कसौटी पर होगा। और यदि वह भविष्य की राजनीति की प्रस्तावना था, तो उसका निर्णय भी अंतत जनता ही करेगी।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि भीड़ क्षणिक हो सकती है, नारे बदल सकते हैं, चेहरे बदल सकते हैं और मंच भी बदल सकते हैं; किंतु अंतिम निर्णय कभी नहीं बदलता। वह निर्णय केवल मतदाता का होता है। लोकतंत्र में जनता केवल सुनती नहीं, समय आने पर अपना निर्णय भी सुनाती है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)