गर्म हवा का गुंबद बढ़ाता धरती का तापमान
प्रकाशित: 24-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रमोद भार्गव
देश के कई राज्यों में वायुमंडल में अंगड़ाई ले रहीं गर्म हवाओं ने अप्रैल माह में ही तापमान 40 डिग्री के पार पहुंचा दिया है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर वह उष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मंडरा रहा है। इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलांगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को उष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। दरअसल यह एक बर्तन के ढक्कन की तरह गर्म हवा को नीचे धरती की तरफ दवाएं रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है।
भारतीय मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान ने इस संकट को और बढ़ाने के संकेत दिए हैं। अगले कुछ दिनों में उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के ज्यादातर हिस्सों में भीषण लू के रूप में गर्म हवाएं चलने की आशंका है। इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आजकल आधे भारत में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है, जो लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहां तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पांच दिन तक यही स्थिति यथावत बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आंकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएं आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।
धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधश्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पियूश ग्रंथी के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्साशास्त्र की भाषा में हाइपर-पीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।
बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निक्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियां जानलेवा होती है। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियां काम नहीं करती हैं। क्योंकि ये दवाएं दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।
हवाएं गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाषीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पांचवां तत्व यूं ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवत आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे बह्मतत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है। क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देष भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहां खेत बंजर हो जाएंगे। पालतू मावेशी और वनजीव गर्मी से तड़प-तड़प कर प्राण छोड़ने लग जाएंगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पश्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एषिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्श चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आंधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखियों के फटने की हैरतअंगेज घटनाएं भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवषोशित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
देश के कई राज्यों में वायुमंडल में अंगड़ाई ले रहीं गर्म हवाओं ने अप्रैल माह में ही तापमान 40 डिग्री के पार पहुंचा दिया है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर वह उष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मंडरा रहा है। इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलांगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को उष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। दरअसल यह एक बर्तन के ढक्कन की तरह गर्म हवा को नीचे धरती की तरफ दवाएं रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है।
भारतीय मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान ने इस संकट को और बढ़ाने के संकेत दिए हैं। अगले कुछ दिनों में उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के ज्यादातर हिस्सों में भीषण लू के रूप में गर्म हवाएं चलने की आशंका है। इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आजकल आधे भारत में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है, जो लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहां तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पांच दिन तक यही स्थिति यथावत बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आंकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएं आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।
धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधश्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पियूश ग्रंथी के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्साशास्त्र की भाषा में हाइपर-पीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।
बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निक्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियां जानलेवा होती है। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियां काम नहीं करती हैं। क्योंकि ये दवाएं दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।
हवाएं गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाषीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पांचवां तत्व यूं ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवत आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे बह्मतत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है। क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देष भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहां खेत बंजर हो जाएंगे। पालतू मावेशी और वनजीव गर्मी से तड़प-तड़प कर प्राण छोड़ने लग जाएंगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पश्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एषिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्श चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आंधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखियों के फटने की हैरतअंगेज घटनाएं भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवषोशित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)