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जनस्वास्थ्य की नई पटकथा लिखता मीडिया

प्रकाशित: 28-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
जनस्वास्थ्य की नई पटकथा लिखता मीडिया
असीम मिश्रा
सुबह की शुरुआत एक खबर से होती है। कहीं हीटवेव का अलर्ट, कहीं डेंगू का खतरा तो कहीं मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चेतावनी। हम पढ़ते हैं, सुनते हैं और आगे बढ़ जाते हैं लेकिन अनजाने में ये खबरें हमारे भीतर कुछ बदल रही होती हैं। हम पानी ज्यादा पीने लगते हैं, धूप से बचने लगते हैं, मास्क पहनने लगते हैं या डॉक्टर की सलाह को ज्यादा गंभीरता से लेने लगते हैं। यही मीडिया की असली ताकत है। वह केवल सूचना नहीं देता बल्कि हमारे व्यवहार को चुपचाप दिशा देता है।
आज के दौर में मीडिया समाज का दर्पण भर नहीं बल्कि एक ऐसा माध्यम बन चुका है जो यह तय करता है कि हम क्या सोचें, किससे डरें, किस पर भरोसा करें और किन आदतों को अपनाएं। विशेष रूप से जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां सूचना का सीधा संबंध जीवन और मृत्यु से होता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे संस्थानों के अनुभव भी यही बताते हैं कि सही समय पर दी गई सही जानकारी कई बार इलाज से पहले ही जीवन बचाने का काम कर सकती है।
अगर इस प्रभाव को आंकड़ों में समझें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। साल 2025 तक की बात की जाए तो भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 95 करोड़ से ज्यादो हो गई है जबकि टेलीविजन की पहुंच अब भी लगभग 70 से 80 करोड़ लोगों तक मानी जाती है। अखबारों की दैनिक पाठक संख्या भी 40 करोड़ से अधिक है। इसका मतलब है कि स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी संदेश कुछ ही घंटों में देश की आधी से ज्यादा आबादी तक पहुंच सकता है। विश्व स्तर पर देखें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कुल मौतों में लगभग 74 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों (जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर) के कारण होती हैं जिनमें जीवनशैली और व्यवहार की बड़ी भूमिका है। भारत में भी हृदय रोग और मधुमेह के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। ऐसे में यदि मीडिया नियमित रूप से संतुलित आहार, व्यायाम और नियमित जांच जैसे संदेशों को प्रभावी ढंग से प्रसारित करे तो इन बीमारियों के बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान मीडिया की भूमिका सबसे अधिक स्पष्ट होकर सामने आई। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में 80 से 90 प्रतिशत लोगों ने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए टीवी, डिजिटल मीडिया और समाचार प्लेटफॉर्म पर भरोसा किया।
भारत का टीकाकरण अभियान जिसमें 200 करोड़ से अधिक वैक्सीन डोज दी गईं उसमें मीडिया द्वारा फैलाए गए जागरूकता संदेशों ने लोगों की हिचकिचाहट कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मीडिया की प्रभावशीलता को और समझें तो व्यवहार परिवर्तन से जुड़े अध्ययनों में पाया गया है कि लगातार और स्पष्ट संदेश लोगों के निर्णयों को 30 से 60 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, तंबाकू नियंत्रण अभियानों में चेतावनी संदेशों और विज्ञापनों के कारण कई देशों में धूम्रपान की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। भारत में भी सिगरेट पैकेट पर बड़े स्वास्थ्य चेतावनी चित्रों और मीडिया अभियानों ने लोगों में जागरूकता बढ़ाई है। मीडिया की एक और बड़ी ताकत यह है कि वह यह तय करता है कि कौन सा मुद्दा महत्वपूर्ण है।
भारत में हर साल हजारों लोग हीटवेव से प्रभावित होते हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार पिछले दशक में हीटवेव से हजारों मौतें दर्ज की गईं। जिन राज्यों में मीडिया ने लगातार हीट एक्शन प्लान और सावधानियों को प्रमुखता दी वहां लोगों के व्यवहार में बदलाव देखा गया जैसे दोपहर में काम से बचना, पानी का अधिक सेवन और सार्वजनिक स्थानों पर कूलिंग व्यवस्थाओं का उपयोग।
हालांकि इस प्रभाव के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। स्वास्थ्य से जुड़ी खबरों में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि मीडिया अत्यधिक भय पैदा करता है तो लोग घबराहट में गलत निर्णय ले सकते हैं। वहीं यदि खतरे को हल्के में दिखाया जाता है तो लोग उसे नजरअंदाज कर देते हैं। शोध बताते हैं कि समाधान आधारित और संतुलित रिपोर्टिंग से लोगों के व्यवहार में 25 से 40 प्रतिशत तक अधिक सकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है। डिजिटल युग में फेक न्यूज़ एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार सोशल मीडिया पर फैलने वाली स्वास्थ्य संबंधी 30 से 50 प्रतिशत तक जानकारी भ्रामक या अपूर्ण हो सकती है। कोविड-19 के दौरान इन्फोडेमिक शब्द इसी वजह से प्रचलित हुआ जब गलत सूचनाएं वायरस से भी तेजी से फैल रही थीं। ऐसे में विश्वसनीय मीडिया की भूमिका और बढ़ जाती है क्योंकि वही तथ्य आधारित जानकारी देकर भ्रम को दूर कर सकता है। जनस्वास्थ्य में व्यवहार परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया है। केवल जानकारी देने से आदतें नहीं बदलतीं।
यूनिसेफ और अन्य संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि जब संदेश स्थानीय भाषा, सांस्कृतिक संदर्भ और भावनात्मक जुड़ाव के साथ दिया जाता है तो उसका प्रभाव दोगुना तक हो सकता है। यही कारण है कि सफल अभियानों में केवल आंकड़े नहीं बल्कि कहानियां, अनुभव और मानवीय पहलू भी शामिल किए जाते हैं। फिर भी मीडिया के सामने कई चुनौतियां हैं। तेजी से खबर देने की होड़, टीआरपी का दबाव और जटिल वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने की कठिनाई।
भारत में स्वास्थ्य पत्रकारिता अभी भी विकसित हो रही है और इसमें विशेषज्ञता की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। बढ़ते स्वास्थ्य संकटों और जलवायु परिवर्तन के दौर में मीडिया और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच समन्वय और भी महत्वपूर्ण हो गया है। स्वच्छ भारत अभियान, पल्स पोलियो कार्पाम और टीकाकरण अभियानों में मीडिया की सािढय भूमिका ने करोड़ों लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने में मदद की है। भारत में पोलियो उन्मूलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां निरंतर मीडिया अभियान और जनजागरूकता ने एक वैश्विक उपलब्धि हासिल करने में योगदान दिया। अंतत यह समझना जरूरी है कि हमारी कई आदतें जिन्हें हम अपनी व्यक्तिगत पसंद मानते हैं, दरअसल कहीं न कहीं मीडिया से प्रभावित होती हैं। इसलिए मीडिया को केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाना चाहिए क्योंकि जब खबरें जिम्मेदारी के साथ बनाई जाती हैं तो वे केवल सुर्खियां नहीं बनतीं बल्कि जीवन बचाने का काम भी करती हैं।
(लेखक जनसंपर्क अधिकारी, एम्स पटना हैं।)