स्थानीय निधि लेखापरीक्षा का शताब्दी वर्ष
प्रकाशित: 28-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. राघवेन्द्र शुक्ल
लोकल फंड आडिट से हर गांव और शहर परिचित है, क्योंकि स्थानीय निकायों में इसकी जांच परम्परागत नहीं, संवैधानिक है। ग्राम पंचायत या नगर पंचायत, स्कूल या कालेज, विश्वविद्यालय या विकास प्राधिकरण में लोकल फंड सक्रिय है। लोकल फंड का आडिटर कार्यरत है। अर्थात, देश के हर प्रांत में लोकल फंड का तंत्र उपस्थित है। नगर पालिका, नगर महापालिका, नगर निगम- सभी में सरकारी आडिट का अवतार लोकल फंड है। राज्य सरकार स्थानीय निधि लेखा संगठन के द्वारा अपने प्रतिनिधि, एक आडिटर को निगरानी के लिए भेजती है। संगठन का ढ़ांचा हर राज्य में थोड़ा अलग हो सकता है। लेकिन इसका उद्देश्य और लक्ष्य एक समान है।
भारत के नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक के नियंत्रणाधीन स्थानीय निधि लेखा को स्वतंत्र पहचान देने के लिए पृथक कर दिया गया, क्योंकि स्थानीय निकायों की बड़ी संख्या होने के कारण पृथक व्यवस्था की आवश्यकता थी। महालेखा परीक्षक सीमित दायरे में, या कि सीमित संसाधन मे ही कार्य कर सकता है। जबकि स्थानीय निकाय विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ तंत्र हैं। इस तंत्र के लिए एक अलग यंत्र की आवश्यकता थी। जो स्थानीय निधि ने अपनी संरचना से इसे पूर्ण करने का प्रयास किया। हालांकि, सरकार इसे इंटरनल आडिट मानती है। क्योंकि स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग सीधे सरकार के नियंत्रण में है। यह स्वतंत्र संस्था नहीं है। जबकि कैग एक संवैधानिक और स्वतंत्र संस्था है। प्रश्न यही है कि कैग से अलग होने के पश्चात स्थानीय निधि को भी स्वतंत्र बनाना चाहिये था। अर्थात, सरकार का नियंत्रण इससे हटाना चाहिए। तभी लोकल फंड की व्यापकता और महत्व सिद्ध होगा, अन्यथा कभी नहीं। यह बात मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर है, कि आडिट को ऊपर रखना चाहते हैं, या नीचे। वैसे, आज की राजनैतिक नैतिकता इतनी सशक्त है नहीं कि राजधर्म के सत्य को ग्रहण कर सके। सो, राजनेता आडिट को पसंद नहीं करते। इसलिए लोकल फंड का भविष्य उज्ज्वल नहीं है।
उत्तर प्रदेश में लोकल फंड आडिट की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। महान अवसर उपस्थित हुआ है, हर्ष का विषय है। समस्त आडिट मैन को गर्व की अनुभूति हो रही है। मैं भी इसी विभाग में रहा हूं। अत, मेरे लिए एक ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। उल्लेखनीय यह भी है कि स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग, उप्र के वर्तमान निदेशक अनिल कुमार सोनी के पदस्थ रहते शताब्दी समारोह सम्पन्न होगा। इस विभाग के लिए उनका योगदान अति प्रशंसनीय रहा। उनको लेकर कोई आरोप प्रत्यारोप नहीं हुआ। वे सौम्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी हैं, सबके प्रिय और सभी के लिए उदार भाव रखने वाले। किसी को दुखी न करने वाले, किसी की सेवा ग्रहण न करने वाले, मीठी वाणी और सहज व्यवहार वाले। अनिल कुमार सोनी, एक सफल प्रशासक।
मैं जब इस विभाग में आया, तो लोकप्रिय लोकसेवक राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय ने परीक्षक के रूप में विभाग की कमान संभाल रखी थी। काफी चर्चित व्यक्तित्व था, उनका। वे सात्विक और धर्मप्रिय अधिकारी थे। जब उनको देखा तो प्रभावित हुआ। सरल और निष्छल जीवन था, स्मरण शक्ति तीव्र और कार्य शैली गतिमान थी। वे प्राय अपने मुख्यालय प्रयागराज से लखनऊ आते थे। पैसेंजर ट्रेन का प्रथम श्रेणी का डिब्बा, आने और जाने पर रात के सफर में सिमट जाता था। उन्होंने विभाग की प्रगति में बड़ा योगदान किया। इतने वर्षों में ऐसा कोई विभागाध्यक्ष नहीं हुआ, जिसकी विशेष चर्चा की जा सके। कुछ निदेशकों ने तो विभाग का अहित ही किया। आज इस विभाग की दुर्गति का कारण भी वही हैं। दिनेश कुमार शुक्ल जैसे लोग भी थे, जो विश्वास के पात्र कभी नहीं बन सके। कुछ अधिकारी निदेशक पद को कलंकित करने में सुखानुभूति को प्राप्त हुये। लेकिन, शताब्दी वर्ष पर सभी पूर्व निदेशकों को नमन है। उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। उनके गुणों को स्वीकार करना हमारा दायित्व है। जो हुआ, ठीक हुआ। आगे भी ठीक होगा। यादों को भुलाना ही उचित है।
स्थानीय निधि लेखा में लेखापरीक्षक संघों की भूमिका अत्यंत अशक्त रही, सेवा संघों ने विभाग के हित में कभी विचार नहीं किया। यही हाल अधिकारी संघों का भी रहा। आडीटर अपने महत्व को समझने में पूर्णतया विफल रहे। किसी मायने में, आज भी आडिटर का महत्व निदेशक से अधिक है। क्योंकि आडिटर वह कार्य करने में सक्षम है, जो अन्य कोई अधिकारी नहीं कर सकता। लेकिन उसके अपने को दयनीय बनाया है, जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। आडिटर के पतन कि कारण उनकी स्वार्थलिप्सा है। अपने को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। महाभारत केवल द्वापर युग में नहीं था, आज भी उसकी छाया हर जगह विद्यमान है।
मेरा बैच सन् 1980 में आया, तब जे.एल.बजाज वित्त सचिव थे। दो सिद्धांतवादी संरक्षक थे, जेएल बजाज और आरपी पाण्डेय। दोनों में गजब की कैमिस्ट्री थी। मैंने देखा कि पाण्डेय साहब कभी कभी एक चपरासी की भी बात मान लेते थे, कभी कभी बजाज साहब की भी बात नहीं मानते थे। अनेक वित्त सचिव या प्रमुख सचिव आये और गये, लेकिन नृपेंद्र मिश्र का कार्यकाल बहुत यादगार रहा। वे कितने ही व्यस्त क्यों न हों, सभी को रोक कर मुझसे मिलते थे। अधिकारी होना अलग बात है, सहृदय होना बिल्कुल अलग बात है। वित्त सचिव के रूप में डी.दीप्ति विलास और बी.एल. जोशी ने भी प्रभावी किरदार निभाया। अजय अग्रवाल की तो बात ही निराली थी, वे सबके विकल्प बनें। मुख्य सचिव के रूप योगेन्द्र नारायण, सबकी आंखों के तारे रहे। मुझे एनेक्सी में अपनी अधिकृत बैठक में बुलाते थे। जब अधिकरियों की भीड़ उनसे मिलने का इंतजार कर रही होती थी, तब भी वे मुझे पहले बुलाते थे। और आज भी फोन पर मेरा हालचाल लेते हैं। ऐसे ही मुख्य सचिव आर.रमणी आज भी हैं। इसलिए यह कहना कि विभाग को महत्व नहीं दिया जाता, गलत होगा। जबकि मैं साल भर में चार पांच दिन ही कठिनाई से निकाल पाता था। मैं होम सिक था, खैर।
स्थानीय निधि लेखा की जो हालत उत्तर प्रदेश में है, कमोबेश वैसी ही स्थिति अन्य प्रदेशों में भी है। मुझे याद आता है, वह दिन जब आरपी पाण्डेय साहब ने देश के सभी प्रदेशों के लोकल फंड निदेशकों का सम्मेलन यहां आयोजित किया। वे परेशान थे। जब मैंने उनसे पूंछा, तो बोले- सम्मेलन तो बुला लिया। लेकिन विभाग के पास पैसा है नहीं। चंदा लिया नहीं जा सकता। हां, जो डोनेशन होगा तो उससे चलाना पड़ेगा। मैंने अपना एक माह का वेतन इस कार्यक्रम हेतु दिया। संभवत यह बात 1982-83 की रही थी। सम्मेलन हुआ, और उसकी रिपोर्ट भी शासन को भेजी गयी। फिर भी प्रदेशों के लोकल फंड कु एकरूपता पर सहमति नहीं बनी। आज तो लोगों को पता ही नहीं कि कहां वे सब गये, या किस हाल में हैं। शताब्दी वर्ष में सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया जाना चाहिए कि अन्य प्रदेशों से आडिट संबंधी तालमेल बराबर बना रहे। शासन आडिट को मजबूत बनाये, न कि कमजोर करे। ईमानदार अधिकारियों से आपेक्षा की जाती है कि वे आडिट को ऊपर उठाने में भूमिका निभा सकते हैं।
भ्रष्टाचार निरोध के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आडिट का विस्तार करना चाहिए। यदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार निवारण के सापेक्ष आडिट के महत्व को खड़ा कर सकें, तो निश्चय ही परिवर्तन आयेगा। आडिटर को पहचानने में सरकारें विलंब क रही हैं। एक दिन अवश्य आयेगा, जब आडिट की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका को स्थापित किया जायेगा।
स्थानीय निधि लेखापरीक्षा का स्वर्णिम इतिहास रहा है, जिसमें महान व्यक्तित्वों की महान उपलब्धियां अंकित हैं। बौद्धिकों का एक वर्ग ही इस संगठन को प्राण वायु देता रहा। इतने सिद्धहस्त आडिटर हुए, जिनकी पहचान प्रदेश भर में होती थी। कभी कभी मुख्यमंत्री को भी आडिटर से जानकारी हासिल करने का प्रसंग सुना जाता है। वर्तमान में तो शाहद ही मुख्यमंत्री को आडिटर जैसे किसी प्राणी का संज्ञान हो। आडिटर की दशा और दिशा का से भी वर्तमान सरकार का कोई प्रयोजन शेष नहीं है। आडिट है, तो चल रहा है। आडिटर है, तो घिसट रहा है। उनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो, आडिटर को कोई पसंद नहीं करता। क्योंकि आडिट किसी भी तरह पसंद का विषय नहीं है, न नेता के लिए न नौकरशाही के लिए। इसलिए आडिट मार खाता रहा, आडिटर को पीछे ढकेला जाता रहा। अंगेजों ने आडिट को स्थापित किया, लोकशाही उसे समाप्त करने का बीड़ा उठाये है। बस, यही अंतर है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को आडिट की गरिमा वापस लानी होगी। आखिर क्यों नेता और आईएस लाबी आडिट से परहेज करती है, आडिटर को अछूत समझती है। कितने शर्म की बात है कि सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी को राजपत्रित नहीं बनाया गया, जबकि सहायक लेखा अधिकारी को राजपत्रित बनाया गया है। बहुत बड़ी विडम्बना है कि लेखा संवर्ग को लेखा परीक्षा संवर्ग से ऊपर रखा जा रहा है। आडिटर को नीचा दिखाने के प्रयास सचिवालय में चलते रहते हैं। हम सभी भुक्तभोगी हैं।
(लेखक आडिट सेवा के पूर्व अधिकारी और आईआईपीए के सदस्य हैं।)
लोकल फंड आडिट से हर गांव और शहर परिचित है, क्योंकि स्थानीय निकायों में इसकी जांच परम्परागत नहीं, संवैधानिक है। ग्राम पंचायत या नगर पंचायत, स्कूल या कालेज, विश्वविद्यालय या विकास प्राधिकरण में लोकल फंड सक्रिय है। लोकल फंड का आडिटर कार्यरत है। अर्थात, देश के हर प्रांत में लोकल फंड का तंत्र उपस्थित है। नगर पालिका, नगर महापालिका, नगर निगम- सभी में सरकारी आडिट का अवतार लोकल फंड है। राज्य सरकार स्थानीय निधि लेखा संगठन के द्वारा अपने प्रतिनिधि, एक आडिटर को निगरानी के लिए भेजती है। संगठन का ढ़ांचा हर राज्य में थोड़ा अलग हो सकता है। लेकिन इसका उद्देश्य और लक्ष्य एक समान है।
भारत के नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक के नियंत्रणाधीन स्थानीय निधि लेखा को स्वतंत्र पहचान देने के लिए पृथक कर दिया गया, क्योंकि स्थानीय निकायों की बड़ी संख्या होने के कारण पृथक व्यवस्था की आवश्यकता थी। महालेखा परीक्षक सीमित दायरे में, या कि सीमित संसाधन मे ही कार्य कर सकता है। जबकि स्थानीय निकाय विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ तंत्र हैं। इस तंत्र के लिए एक अलग यंत्र की आवश्यकता थी। जो स्थानीय निधि ने अपनी संरचना से इसे पूर्ण करने का प्रयास किया। हालांकि, सरकार इसे इंटरनल आडिट मानती है। क्योंकि स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग सीधे सरकार के नियंत्रण में है। यह स्वतंत्र संस्था नहीं है। जबकि कैग एक संवैधानिक और स्वतंत्र संस्था है। प्रश्न यही है कि कैग से अलग होने के पश्चात स्थानीय निधि को भी स्वतंत्र बनाना चाहिये था। अर्थात, सरकार का नियंत्रण इससे हटाना चाहिए। तभी लोकल फंड की व्यापकता और महत्व सिद्ध होगा, अन्यथा कभी नहीं। यह बात मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर है, कि आडिट को ऊपर रखना चाहते हैं, या नीचे। वैसे, आज की राजनैतिक नैतिकता इतनी सशक्त है नहीं कि राजधर्म के सत्य को ग्रहण कर सके। सो, राजनेता आडिट को पसंद नहीं करते। इसलिए लोकल फंड का भविष्य उज्ज्वल नहीं है।
उत्तर प्रदेश में लोकल फंड आडिट की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। महान अवसर उपस्थित हुआ है, हर्ष का विषय है। समस्त आडिट मैन को गर्व की अनुभूति हो रही है। मैं भी इसी विभाग में रहा हूं। अत, मेरे लिए एक ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। उल्लेखनीय यह भी है कि स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग, उप्र के वर्तमान निदेशक अनिल कुमार सोनी के पदस्थ रहते शताब्दी समारोह सम्पन्न होगा। इस विभाग के लिए उनका योगदान अति प्रशंसनीय रहा। उनको लेकर कोई आरोप प्रत्यारोप नहीं हुआ। वे सौम्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी हैं, सबके प्रिय और सभी के लिए उदार भाव रखने वाले। किसी को दुखी न करने वाले, किसी की सेवा ग्रहण न करने वाले, मीठी वाणी और सहज व्यवहार वाले। अनिल कुमार सोनी, एक सफल प्रशासक।
मैं जब इस विभाग में आया, तो लोकप्रिय लोकसेवक राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय ने परीक्षक के रूप में विभाग की कमान संभाल रखी थी। काफी चर्चित व्यक्तित्व था, उनका। वे सात्विक और धर्मप्रिय अधिकारी थे। जब उनको देखा तो प्रभावित हुआ। सरल और निष्छल जीवन था, स्मरण शक्ति तीव्र और कार्य शैली गतिमान थी। वे प्राय अपने मुख्यालय प्रयागराज से लखनऊ आते थे। पैसेंजर ट्रेन का प्रथम श्रेणी का डिब्बा, आने और जाने पर रात के सफर में सिमट जाता था। उन्होंने विभाग की प्रगति में बड़ा योगदान किया। इतने वर्षों में ऐसा कोई विभागाध्यक्ष नहीं हुआ, जिसकी विशेष चर्चा की जा सके। कुछ निदेशकों ने तो विभाग का अहित ही किया। आज इस विभाग की दुर्गति का कारण भी वही हैं। दिनेश कुमार शुक्ल जैसे लोग भी थे, जो विश्वास के पात्र कभी नहीं बन सके। कुछ अधिकारी निदेशक पद को कलंकित करने में सुखानुभूति को प्राप्त हुये। लेकिन, शताब्दी वर्ष पर सभी पूर्व निदेशकों को नमन है। उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। उनके गुणों को स्वीकार करना हमारा दायित्व है। जो हुआ, ठीक हुआ। आगे भी ठीक होगा। यादों को भुलाना ही उचित है।
स्थानीय निधि लेखा में लेखापरीक्षक संघों की भूमिका अत्यंत अशक्त रही, सेवा संघों ने विभाग के हित में कभी विचार नहीं किया। यही हाल अधिकारी संघों का भी रहा। आडीटर अपने महत्व को समझने में पूर्णतया विफल रहे। किसी मायने में, आज भी आडिटर का महत्व निदेशक से अधिक है। क्योंकि आडिटर वह कार्य करने में सक्षम है, जो अन्य कोई अधिकारी नहीं कर सकता। लेकिन उसके अपने को दयनीय बनाया है, जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। आडिटर के पतन कि कारण उनकी स्वार्थलिप्सा है। अपने को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। महाभारत केवल द्वापर युग में नहीं था, आज भी उसकी छाया हर जगह विद्यमान है।
मेरा बैच सन् 1980 में आया, तब जे.एल.बजाज वित्त सचिव थे। दो सिद्धांतवादी संरक्षक थे, जेएल बजाज और आरपी पाण्डेय। दोनों में गजब की कैमिस्ट्री थी। मैंने देखा कि पाण्डेय साहब कभी कभी एक चपरासी की भी बात मान लेते थे, कभी कभी बजाज साहब की भी बात नहीं मानते थे। अनेक वित्त सचिव या प्रमुख सचिव आये और गये, लेकिन नृपेंद्र मिश्र का कार्यकाल बहुत यादगार रहा। वे कितने ही व्यस्त क्यों न हों, सभी को रोक कर मुझसे मिलते थे। अधिकारी होना अलग बात है, सहृदय होना बिल्कुल अलग बात है। वित्त सचिव के रूप में डी.दीप्ति विलास और बी.एल. जोशी ने भी प्रभावी किरदार निभाया। अजय अग्रवाल की तो बात ही निराली थी, वे सबके विकल्प बनें। मुख्य सचिव के रूप योगेन्द्र नारायण, सबकी आंखों के तारे रहे। मुझे एनेक्सी में अपनी अधिकृत बैठक में बुलाते थे। जब अधिकरियों की भीड़ उनसे मिलने का इंतजार कर रही होती थी, तब भी वे मुझे पहले बुलाते थे। और आज भी फोन पर मेरा हालचाल लेते हैं। ऐसे ही मुख्य सचिव आर.रमणी आज भी हैं। इसलिए यह कहना कि विभाग को महत्व नहीं दिया जाता, गलत होगा। जबकि मैं साल भर में चार पांच दिन ही कठिनाई से निकाल पाता था। मैं होम सिक था, खैर।
स्थानीय निधि लेखा की जो हालत उत्तर प्रदेश में है, कमोबेश वैसी ही स्थिति अन्य प्रदेशों में भी है। मुझे याद आता है, वह दिन जब आरपी पाण्डेय साहब ने देश के सभी प्रदेशों के लोकल फंड निदेशकों का सम्मेलन यहां आयोजित किया। वे परेशान थे। जब मैंने उनसे पूंछा, तो बोले- सम्मेलन तो बुला लिया। लेकिन विभाग के पास पैसा है नहीं। चंदा लिया नहीं जा सकता। हां, जो डोनेशन होगा तो उससे चलाना पड़ेगा। मैंने अपना एक माह का वेतन इस कार्यक्रम हेतु दिया। संभवत यह बात 1982-83 की रही थी। सम्मेलन हुआ, और उसकी रिपोर्ट भी शासन को भेजी गयी। फिर भी प्रदेशों के लोकल फंड कु एकरूपता पर सहमति नहीं बनी। आज तो लोगों को पता ही नहीं कि कहां वे सब गये, या किस हाल में हैं। शताब्दी वर्ष में सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया जाना चाहिए कि अन्य प्रदेशों से आडिट संबंधी तालमेल बराबर बना रहे। शासन आडिट को मजबूत बनाये, न कि कमजोर करे। ईमानदार अधिकारियों से आपेक्षा की जाती है कि वे आडिट को ऊपर उठाने में भूमिका निभा सकते हैं।
भ्रष्टाचार निरोध के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आडिट का विस्तार करना चाहिए। यदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार निवारण के सापेक्ष आडिट के महत्व को खड़ा कर सकें, तो निश्चय ही परिवर्तन आयेगा। आडिटर को पहचानने में सरकारें विलंब क रही हैं। एक दिन अवश्य आयेगा, जब आडिट की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका को स्थापित किया जायेगा।
स्थानीय निधि लेखापरीक्षा का स्वर्णिम इतिहास रहा है, जिसमें महान व्यक्तित्वों की महान उपलब्धियां अंकित हैं। बौद्धिकों का एक वर्ग ही इस संगठन को प्राण वायु देता रहा। इतने सिद्धहस्त आडिटर हुए, जिनकी पहचान प्रदेश भर में होती थी। कभी कभी मुख्यमंत्री को भी आडिटर से जानकारी हासिल करने का प्रसंग सुना जाता है। वर्तमान में तो शाहद ही मुख्यमंत्री को आडिटर जैसे किसी प्राणी का संज्ञान हो। आडिटर की दशा और दिशा का से भी वर्तमान सरकार का कोई प्रयोजन शेष नहीं है। आडिट है, तो चल रहा है। आडिटर है, तो घिसट रहा है। उनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो, आडिटर को कोई पसंद नहीं करता। क्योंकि आडिट किसी भी तरह पसंद का विषय नहीं है, न नेता के लिए न नौकरशाही के लिए। इसलिए आडिट मार खाता रहा, आडिटर को पीछे ढकेला जाता रहा। अंगेजों ने आडिट को स्थापित किया, लोकशाही उसे समाप्त करने का बीड़ा उठाये है। बस, यही अंतर है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को आडिट की गरिमा वापस लानी होगी। आखिर क्यों नेता और आईएस लाबी आडिट से परहेज करती है, आडिटर को अछूत समझती है। कितने शर्म की बात है कि सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी को राजपत्रित नहीं बनाया गया, जबकि सहायक लेखा अधिकारी को राजपत्रित बनाया गया है। बहुत बड़ी विडम्बना है कि लेखा संवर्ग को लेखा परीक्षा संवर्ग से ऊपर रखा जा रहा है। आडिटर को नीचा दिखाने के प्रयास सचिवालय में चलते रहते हैं। हम सभी भुक्तभोगी हैं।
(लेखक आडिट सेवा के पूर्व अधिकारी और आईआईपीए के सदस्य हैं।)