दिल्ली जिमखाना क्लब: एक क्लब पर कब्जा और वैश्विक पटल पर ‘मुफ़्त की बदनामी'
प्रकाशित: 27-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
ओंकारेश्वर पांडेय
एक क्लब पर सरकारी नियंत्रण की कार्रवाई और दुनिया के सैकड़ों ऐतिहासिक क्लबों में भारत की मुफ्त में बदनामी-यह आज के दौर की एक ऐसी दास्तां है जिस पर सिर्फ अ़फसोस ही जताया जा सकता है। दिल्ली का प्रतिष्ठित जिमखाना क्लब दुनिया के 22 देशों के 100 से अधिक ऐतिहासिक और रसूखदार क्लबों से पारस्परिक रूप से संबद्ध है।
जो लोग इसे महज़ गुलामी का प्रतीक या अभिजात्य वर्ग का अड्डा कहकर खारिज करते हैं, उन्हें एक बार इस क्लब की सदस्यता सूची और इसके वैश्विक ताने-बाने को ज़रूर समझ लेना चाहिए। इस क्लब की दीवारों ने सी. राजगोपालाचारी, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, फील्ड मार्शल सैम माणेकशाह, जनरल के.एस. थिमैया, एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह, 'फ्लाइंग सिख' मिल्खा सिंह, प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह, पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी, डॉ. करण सिंह और वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर जैसी शख्सियतों की वैचारिक बहसों को सुना है। यह महज़ ईंट-पत्थरों का चा नहीं, बल्कि भारत के 8,000 से अधिक विशिष्ट नागरिकों, न्यायविदों, नौकरशाहों और सैन्य दिग्गजों का एक जीवंत बौद्धिक मंच है। 125 से अधिक वर्षों के इतिहास वाली इस संस्था पर लिया गया सरकार का हालिया फैसला, उसकी अपनी ही राजनीतिक और रणनीतिक बौद्धिकता पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। जब संघ विश्व को भारत की परिपक्वता का भरोसा दिला रहा था, तब सरकार ने वही तोड़ दिया। विडंबना देखिए, अभी कुछ ही हफ्ते पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी का एक महत्वपूर्ण आधिकारिक दौरा किया था।
जब संघ का शीर्ष नेतृत्व दुनिया को यह भरोसा दिलाने में लगा था कि भारत में संस्थाएँ सुरक्षित हैं और न्यायप्रिय दृष्टिकोण कायम है ठीक उसी समय नई दिल्ली में, लुटियंस ज़ोन के भीतर दिल्ली जिमखाना क्लब पर अचानक कब्ज़ा करने की प्रशासनिक कार्रवाई कर दी गई। जब संघ विश्व को समझा रहा था कि भारत गैर-वर्चस्ववादी और बहुलवादी है, तब सरकार का यह कदम उस पूरे वैश्विक अभियान के हर दावे को ध्वस्त कर रहा था और वह भी बिना एक रुपया खर्च किए, मुफ्त में। उन्हीं पश्चिमी क्लबों के सदस्य, जिन्हें संघ 'कन्विंस' कर रहा था, अब इस कब्ज़े की खबर पर सवाल उठाएँगे क्या यही है वह भारत, जहाँ संस्थाएँ सुरक्षित हैं?
भारत के कोने-कोने से लेकर दुनिया के शिखर तक फैलेगी बदनामी - दिल्ली जिमखाना क्लब का यह रसूखदार नेटवर्क केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक केंद्रों में फैला हुआ है। जब दक्षिण भारत के पारंपरिक और सैन्य इतिहास से जुड़े तमिलनाडु के मद्रास जिमखाना क्लब (चेन्नई) और नीलगिरि के वेलिंगटन जिमखाना क्लब के गलियारों में इसकी चर्चा होती है, तो साख पर आंच आना लाज़मी है। केरल के पहाड़ी वादियों में स्थित हाई रेंज क्लब (मुन्नार) से लेकर कर्नाटक के दिल में बसे बेंगलोर क्लब, बेंगलोर गोल्फ क्लब और तटीय इलाके के मंगलोर क्लब तक इस प्रशासनिक कार्रवाई की गूंज सुनाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोचिए कि लंदन के ऑक्सफोर्ड एंड कैम्ब्रिज क्लब, नेशनल लिबरल क्लब, कार्लटन क्लब, द ट्रैवलर्स क्लब, द स्लोन क्लब, आर्मी एंड नेवी क्लब और रॉयल ऑटोमोबाइल क्लब जैसी वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त संस्थाओं के लाउंज में भारत की इस कार्रवाई को लेकर किस तरह की अनौपचारिक चर्चाएं शुरू हो चुकी होंगी। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में द न्यू क्लब और द रॉयल स्कॉट्स क्लब से लेकर लंदन के एस्प्रीया और कंबरलैंड लॉन टेनिस क्लब एंड हैम्पस्टेड ािढकेट क्लब के सदस्य, जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केवल कानून के राज और संस्थागत गरिमा को सर्वोपरि मानते हैं, वे भारतीय लोकतंत्र की इस नई दिशा को देखकर अचंभित हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में स्थित एथेनायम क्लब और द ऑस्ट्रेलिया क्लब, कैनबरा के द कॉमनवेल्थ क्लब लिमिटेड और सिडनी के रॉयल ऑटोमोबाइल क्लब के नीति-निर्माता भी इस घटपाम को भारत की घटती लोकतांत्रिक सहनशीलता के रूप में देख रहे हैं। सबसे बड़ा झटका अमेरिका के रणनीतिक गलियारों में लगा है। वाशिंगटन डीसी के कॉसमॉस क्लब-जिसके सदस्यों में 7 अमेरिकी राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और सीआईए के पूर्व प्रमुख शामिल रहे हैं-वहां जब भारत के इस अवैध और बिना सुनवाई के किए गए नियंत्रण की बात उठती है, तो भारत को एक अप्रत्याशित रणनीतिक साझेदार माना जाने लगता है। यह अविश्वास केवल पश्चिम तक सीमित नहीं है। हमारे पड़ोस और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में, कनाडा के टोरंटो ािढकेट स्केटिंग एंड कर्लिंग क्लब और द यूनियन क्लब ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया से लेकर फ्रांस के सर्कल डे ल्यूनियन इंटरैली (पेरिस), सिंगापुर के सिंगापुर ािढकेट क्लब और द तांगलिन क्लब, श्रीलंका के द हिल क्लब (नुवारा एलिया), बांग्लादेश के ढा क्लब लिमिटेड और गुल्शन क्लब लिमिटेड, केन्या के नैरोबी जिमखाना और मोंबासा क्लब लिमिटेड, थाईलैंड के रॉयल बैंकॉक स्पोर्ट्स क्लब, मलेशिया के रॉयल इपोह क्लब और रॉयल सेलांगोर क्लब, मॉरीशस के मॉरीशस जिमखाना क्लब, पाकिस्तान के लाहौर जिमखाना और स्वीडन के स्टॉकहोम में स्थित सैल्स्केपेट जैसे प्रभावशाली क्लबों के बुलेटिनों और सोशल मीडिया ग्रुप्स में जब यह समाचार फैल रहा है कि भारत में 1928 का एक वैध लीज़ एग्रीमेंट रातों-रात एक प्रशासनिक आदेश से तोड़ दिया गया, तो वैश्विक पटल पर भारत की ब्रैंड वैल्यू को गहरा धक्का लगता है।
मुफ्त की बदनामी - मिटाने में लगेंगे 100 करोड़ रुपए- इस तरह के फैसलों से उपजी वैश्विक बदनामी को धोने और ब्रैंड इंडिया की लोकतांत्रिक छवि को बहाल करने में कितना वित्तीय भार आता है, इसका गणित बेहद चौंकाने वाला है। एडेलमैन या फ्लेशमैन-हिलार्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय पीआर एजेंसियों को रिटेन करने में 5-10 करोड़ रु. प्रति माह, इन 100 संबद्ध क्लबों के प्रभावशाली सदस्यों तक संदेश पहुंचाने में 2-3 करोड़ रु., और वाशिंगटन, लंदन, पेरिस या सिंगापुर जैसे शहरों में क्लोज्ड-डोर ब्रीफिंग्स आयोजित करने में 1-2 करोड़ रु. प्रति शहर का खर्च आता है। इसके अलावा, विदेशी विचारकों को भारत बुलाकर स्टडी टूर कराने में 50 लाख रु. से 1 करोड़ रु. और बीबीसी, सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स या फाइनेंशियल टाइम्स जैसे वैश्विक मीडिया में ओपिनियन पीस छपवाने में 10-20 करोड़ रु. स्वाहा हो जाते हैं।
लुटियंस दिल्ली और अर्बन नक्सल नारे नहीं, तथ्य बोलते हैं- अक्सर राजनीतिक रैलियों में लुटियंस दिल्ली और अर्बन नक्सल जैसे शब्दों का इस्तेमाल समर्थकों को डराने या एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा करने के लिए किया जाता है। लेकिन इतिहास की हकीकत इसके उलट बेहद व्यावहारिक रही है।
न्यायालय में चुनौती और अब क्या? - इस पूरे घटपाम की प्रशासनिक शुरुआत 22 मई 2026 को हुई, जब केंद्र सरकार के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय ने क्लब को एक बेदखली नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया कि क्लब की 27.3 एकड़ ज़मीन की लीज़ डीड के क्लॉज़ 4 के तहत, इस भूखंड को रक्षा अवसंरचना और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए वापस लिया जा रहा है, और इसे खाली करने के लिए 5 जून 2026 तक का समय दिया गया। जब सरकार द्वारा प्रबंधित वर्तमान बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इस आदेश के खिलाफ कानूनी रुख अपनाने के बजाय केवल पत्राचार तक खुद को सीमित रखने का फैसला किया, तो क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य विजय खुराना ने व्यक्तिगत क्षमता में दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने सरकार के इस कदम को अवैध, दुर्भावनापूर्ण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन बताते हुए याचिका दायर की है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर तत्काल सुनवाई की सहमति दे दी है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस कानूनी लड़ाई को क्लब के 500 से अधिक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित सदस्यों का लिखित व नैतिक समर्थन प्राप्त है।
सांस्कृतिक समरसता, खेल और राष्ट्रवाद का सजीव कैनवास - इस ऐतिहासिक क्लब को इतिहास के पन्नों में समेटने से पहले, इसकी जीवंत संस्कृति, सांस्कृतिक समरसता और गौरवशाली परंपराओं को पूरी गहराई से समझना आवश्यक है। यह केवल एक लक्ज़री परिसर नहीं, बल्कि भारतीय समाज, कला, सैन्य गौरव और सर्वधर्म समभाव का एक अद्भुत संगम रहा है। यह क्लब भारत की बहुरंगी और साझा संस्कृति का एक ऐसा अनोखा केंद्र रहा है, जहां भारत के सभी प्रमुख त्योहारों को समान उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहा है।
चुप रहना इस बदनामी को मंजूरी देना है - बहरहाल, मामला अब देश की शीर्ष न्यायपालिका के समक्ष है, और आने वाले दिन तय करेंगे कि कानून का शासन इस ऐतिहासिक संस्था के भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। लेकिन इतना तय है -एक क्लब पर कब्ज़ा और दुनिया के सैकड़ों क्लबों में मुफ्त की बदनामी -यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आज यह क्लब है, कल कोई और संस्था हो सकती है। अब चुप रहना, इस मुफ्त की बदनामी को मंजूरी देना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
एक क्लब पर सरकारी नियंत्रण की कार्रवाई और दुनिया के सैकड़ों ऐतिहासिक क्लबों में भारत की मुफ्त में बदनामी-यह आज के दौर की एक ऐसी दास्तां है जिस पर सिर्फ अ़फसोस ही जताया जा सकता है। दिल्ली का प्रतिष्ठित जिमखाना क्लब दुनिया के 22 देशों के 100 से अधिक ऐतिहासिक और रसूखदार क्लबों से पारस्परिक रूप से संबद्ध है।
जो लोग इसे महज़ गुलामी का प्रतीक या अभिजात्य वर्ग का अड्डा कहकर खारिज करते हैं, उन्हें एक बार इस क्लब की सदस्यता सूची और इसके वैश्विक ताने-बाने को ज़रूर समझ लेना चाहिए। इस क्लब की दीवारों ने सी. राजगोपालाचारी, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, फील्ड मार्शल सैम माणेकशाह, जनरल के.एस. थिमैया, एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह, 'फ्लाइंग सिख' मिल्खा सिंह, प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह, पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी, डॉ. करण सिंह और वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर जैसी शख्सियतों की वैचारिक बहसों को सुना है। यह महज़ ईंट-पत्थरों का चा नहीं, बल्कि भारत के 8,000 से अधिक विशिष्ट नागरिकों, न्यायविदों, नौकरशाहों और सैन्य दिग्गजों का एक जीवंत बौद्धिक मंच है। 125 से अधिक वर्षों के इतिहास वाली इस संस्था पर लिया गया सरकार का हालिया फैसला, उसकी अपनी ही राजनीतिक और रणनीतिक बौद्धिकता पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। जब संघ विश्व को भारत की परिपक्वता का भरोसा दिला रहा था, तब सरकार ने वही तोड़ दिया। विडंबना देखिए, अभी कुछ ही हफ्ते पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी का एक महत्वपूर्ण आधिकारिक दौरा किया था।
जब संघ का शीर्ष नेतृत्व दुनिया को यह भरोसा दिलाने में लगा था कि भारत में संस्थाएँ सुरक्षित हैं और न्यायप्रिय दृष्टिकोण कायम है ठीक उसी समय नई दिल्ली में, लुटियंस ज़ोन के भीतर दिल्ली जिमखाना क्लब पर अचानक कब्ज़ा करने की प्रशासनिक कार्रवाई कर दी गई। जब संघ विश्व को समझा रहा था कि भारत गैर-वर्चस्ववादी और बहुलवादी है, तब सरकार का यह कदम उस पूरे वैश्विक अभियान के हर दावे को ध्वस्त कर रहा था और वह भी बिना एक रुपया खर्च किए, मुफ्त में। उन्हीं पश्चिमी क्लबों के सदस्य, जिन्हें संघ 'कन्विंस' कर रहा था, अब इस कब्ज़े की खबर पर सवाल उठाएँगे क्या यही है वह भारत, जहाँ संस्थाएँ सुरक्षित हैं?
भारत के कोने-कोने से लेकर दुनिया के शिखर तक फैलेगी बदनामी - दिल्ली जिमखाना क्लब का यह रसूखदार नेटवर्क केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक केंद्रों में फैला हुआ है। जब दक्षिण भारत के पारंपरिक और सैन्य इतिहास से जुड़े तमिलनाडु के मद्रास जिमखाना क्लब (चेन्नई) और नीलगिरि के वेलिंगटन जिमखाना क्लब के गलियारों में इसकी चर्चा होती है, तो साख पर आंच आना लाज़मी है। केरल के पहाड़ी वादियों में स्थित हाई रेंज क्लब (मुन्नार) से लेकर कर्नाटक के दिल में बसे बेंगलोर क्लब, बेंगलोर गोल्फ क्लब और तटीय इलाके के मंगलोर क्लब तक इस प्रशासनिक कार्रवाई की गूंज सुनाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोचिए कि लंदन के ऑक्सफोर्ड एंड कैम्ब्रिज क्लब, नेशनल लिबरल क्लब, कार्लटन क्लब, द ट्रैवलर्स क्लब, द स्लोन क्लब, आर्मी एंड नेवी क्लब और रॉयल ऑटोमोबाइल क्लब जैसी वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त संस्थाओं के लाउंज में भारत की इस कार्रवाई को लेकर किस तरह की अनौपचारिक चर्चाएं शुरू हो चुकी होंगी। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में द न्यू क्लब और द रॉयल स्कॉट्स क्लब से लेकर लंदन के एस्प्रीया और कंबरलैंड लॉन टेनिस क्लब एंड हैम्पस्टेड ािढकेट क्लब के सदस्य, जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केवल कानून के राज और संस्थागत गरिमा को सर्वोपरि मानते हैं, वे भारतीय लोकतंत्र की इस नई दिशा को देखकर अचंभित हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में स्थित एथेनायम क्लब और द ऑस्ट्रेलिया क्लब, कैनबरा के द कॉमनवेल्थ क्लब लिमिटेड और सिडनी के रॉयल ऑटोमोबाइल क्लब के नीति-निर्माता भी इस घटपाम को भारत की घटती लोकतांत्रिक सहनशीलता के रूप में देख रहे हैं। सबसे बड़ा झटका अमेरिका के रणनीतिक गलियारों में लगा है। वाशिंगटन डीसी के कॉसमॉस क्लब-जिसके सदस्यों में 7 अमेरिकी राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और सीआईए के पूर्व प्रमुख शामिल रहे हैं-वहां जब भारत के इस अवैध और बिना सुनवाई के किए गए नियंत्रण की बात उठती है, तो भारत को एक अप्रत्याशित रणनीतिक साझेदार माना जाने लगता है। यह अविश्वास केवल पश्चिम तक सीमित नहीं है। हमारे पड़ोस और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में, कनाडा के टोरंटो ािढकेट स्केटिंग एंड कर्लिंग क्लब और द यूनियन क्लब ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया से लेकर फ्रांस के सर्कल डे ल्यूनियन इंटरैली (पेरिस), सिंगापुर के सिंगापुर ािढकेट क्लब और द तांगलिन क्लब, श्रीलंका के द हिल क्लब (नुवारा एलिया), बांग्लादेश के ढा क्लब लिमिटेड और गुल्शन क्लब लिमिटेड, केन्या के नैरोबी जिमखाना और मोंबासा क्लब लिमिटेड, थाईलैंड के रॉयल बैंकॉक स्पोर्ट्स क्लब, मलेशिया के रॉयल इपोह क्लब और रॉयल सेलांगोर क्लब, मॉरीशस के मॉरीशस जिमखाना क्लब, पाकिस्तान के लाहौर जिमखाना और स्वीडन के स्टॉकहोम में स्थित सैल्स्केपेट जैसे प्रभावशाली क्लबों के बुलेटिनों और सोशल मीडिया ग्रुप्स में जब यह समाचार फैल रहा है कि भारत में 1928 का एक वैध लीज़ एग्रीमेंट रातों-रात एक प्रशासनिक आदेश से तोड़ दिया गया, तो वैश्विक पटल पर भारत की ब्रैंड वैल्यू को गहरा धक्का लगता है।
मुफ्त की बदनामी - मिटाने में लगेंगे 100 करोड़ रुपए- इस तरह के फैसलों से उपजी वैश्विक बदनामी को धोने और ब्रैंड इंडिया की लोकतांत्रिक छवि को बहाल करने में कितना वित्तीय भार आता है, इसका गणित बेहद चौंकाने वाला है। एडेलमैन या फ्लेशमैन-हिलार्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय पीआर एजेंसियों को रिटेन करने में 5-10 करोड़ रु. प्रति माह, इन 100 संबद्ध क्लबों के प्रभावशाली सदस्यों तक संदेश पहुंचाने में 2-3 करोड़ रु., और वाशिंगटन, लंदन, पेरिस या सिंगापुर जैसे शहरों में क्लोज्ड-डोर ब्रीफिंग्स आयोजित करने में 1-2 करोड़ रु. प्रति शहर का खर्च आता है। इसके अलावा, विदेशी विचारकों को भारत बुलाकर स्टडी टूर कराने में 50 लाख रु. से 1 करोड़ रु. और बीबीसी, सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स या फाइनेंशियल टाइम्स जैसे वैश्विक मीडिया में ओपिनियन पीस छपवाने में 10-20 करोड़ रु. स्वाहा हो जाते हैं।
लुटियंस दिल्ली और अर्बन नक्सल नारे नहीं, तथ्य बोलते हैं- अक्सर राजनीतिक रैलियों में लुटियंस दिल्ली और अर्बन नक्सल जैसे शब्दों का इस्तेमाल समर्थकों को डराने या एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा करने के लिए किया जाता है। लेकिन इतिहास की हकीकत इसके उलट बेहद व्यावहारिक रही है।
न्यायालय में चुनौती और अब क्या? - इस पूरे घटपाम की प्रशासनिक शुरुआत 22 मई 2026 को हुई, जब केंद्र सरकार के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय ने क्लब को एक बेदखली नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया कि क्लब की 27.3 एकड़ ज़मीन की लीज़ डीड के क्लॉज़ 4 के तहत, इस भूखंड को रक्षा अवसंरचना और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए वापस लिया जा रहा है, और इसे खाली करने के लिए 5 जून 2026 तक का समय दिया गया। जब सरकार द्वारा प्रबंधित वर्तमान बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इस आदेश के खिलाफ कानूनी रुख अपनाने के बजाय केवल पत्राचार तक खुद को सीमित रखने का फैसला किया, तो क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य विजय खुराना ने व्यक्तिगत क्षमता में दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने सरकार के इस कदम को अवैध, दुर्भावनापूर्ण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन बताते हुए याचिका दायर की है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर तत्काल सुनवाई की सहमति दे दी है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस कानूनी लड़ाई को क्लब के 500 से अधिक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित सदस्यों का लिखित व नैतिक समर्थन प्राप्त है।
सांस्कृतिक समरसता, खेल और राष्ट्रवाद का सजीव कैनवास - इस ऐतिहासिक क्लब को इतिहास के पन्नों में समेटने से पहले, इसकी जीवंत संस्कृति, सांस्कृतिक समरसता और गौरवशाली परंपराओं को पूरी गहराई से समझना आवश्यक है। यह केवल एक लक्ज़री परिसर नहीं, बल्कि भारतीय समाज, कला, सैन्य गौरव और सर्वधर्म समभाव का एक अद्भुत संगम रहा है। यह क्लब भारत की बहुरंगी और साझा संस्कृति का एक ऐसा अनोखा केंद्र रहा है, जहां भारत के सभी प्रमुख त्योहारों को समान उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहा है।
चुप रहना इस बदनामी को मंजूरी देना है - बहरहाल, मामला अब देश की शीर्ष न्यायपालिका के समक्ष है, और आने वाले दिन तय करेंगे कि कानून का शासन इस ऐतिहासिक संस्था के भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। लेकिन इतना तय है -एक क्लब पर कब्ज़ा और दुनिया के सैकड़ों क्लबों में मुफ्त की बदनामी -यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आज यह क्लब है, कल कोई और संस्था हो सकती है। अब चुप रहना, इस मुफ्त की बदनामी को मंजूरी देना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)