रील्स कैसे बदल रही हैं सार्वजनिक स्वास्थ्य की दुनिया
प्रकाशित: 27-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
असीम मिश्रा
एक समय था जब स्वास्थ्य संबंधी जानकारी केवल डॉक्टरों के क्लीनिक, अस्पतालों, सरकारी अभियानों और समाचार पत्रों तक सीमित हुआ करती थी। किसी बीमारी के लक्षण, उसके बचाव या उपचार के बारे में जानने के लिए लोगों को विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन डिजिटल युग ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। आज स्वास्थ्य जागरूकता का सबसे बड़ा मंच अस्पताल नहीं बल्कि स्मार्टफोन की पीन बन चुकी है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो जैसे छोटे डिजिटल फॉर्मेट अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे हैं। वे तेजी से जनस्वास्थ्य जागरूकता के प्रभावशाली उपकरणों में बदलते जा रहे हैं। कुछ सेकंड की एक वीडियो किसी व्यक्ति को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण पहचानना सिखा सकती है, किसी को सीपीआर देना समझा सकती है या किसी परिवार को समय रहते कैंसर स्क्रीनिंग कराने के लिए प्रेरित कर सकती है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी बदलाव नहीं है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार की पूरी अवधारणा में आया एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन है।
अब चिकित्सा केवल अस्पतालों की दीवारों के भीतर सीमित नहीं है बल्कि सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर भी जीवित है। स्वास्थ्य जागरूकता अब पोस्टर, पेंपलेट और सरकारी अभियानों से आगे बढ़कर एल्गोरिद्म और वायरल कंटेंट के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
अूaRाज्दूत् का अुग्taत् 2025 उत्दंत् ध्नन्गै Rाज्दू के अनुसार दुनिया में 5.24 अरब से अधिक सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं जो वैश्विक आबादी का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया का औसत इंटरनेट उपयोगकर्ता प्रतिदिन लगभग 2 घंटे 21 मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है। भारत में डिजिटल विस्तार की गति और भी तेज़ है। (घ्हीहू aह् श्दंग्त Assदम्ग्atग्दह द घ्ह्ग्a (घ्Aश्Aघ्) तथा ख्aहू की हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की है जो यह दर्शाती है कि डिजिटल स्वास्थ्य जागरूकता अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही। यही कारण है कि स्वास्थ्य संचार अब पहले से कहीं अधिक लोकतांत्रिक हो गया है।
अब कोई भी डॉक्टर, अस्पताल या स्वास्थ्य संस्था सीधे आम जनता से संवाद कर सकती है। पहले जहां किसी सरकारी स्वास्थ्य अभियान को गांवों और कस्बों तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे वहीं आज एक छोटी वीडियो कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।
पटना में रिकॉर्ड की गई एक स्वास्थ्य जागरूकता रील बिहार के दूरदराज गांवों से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक तेजी से पहुंच सकती है। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य साक्षरता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, यह बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (ऱइप्ए-5) और विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य अध्ययनों के अनुसार देश की बड़ी आबादी आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य जानकारी, पोषण, टीकाकरण और रोगों की शुरुआती पहचान संबंधी जागरूकता से वंचित है। ऐसे में इंटरनेट और स्मार्टफोन स्वास्थ्य जानकारी के सबसे सुलभ माध्यम बनकर उभरे हैं। कोविड-19 महामारी ने इस डिजिटल बदलाव को अभूतपूर्व गति दी। महामारी के दौरान जब लोग भय, भ्रम और अनिश्चितता से घिरे हुए थे तब सोशल मीडिया स्वास्थ्य सूचना का सबसे तेज़ माध्यम बनकर सामने आया। डॉक्टर लाइव वीडियो के माध्यम से ऑक्सीजन लेवल और पांमण के लक्षण समझा रहे थे।
अस्पताल हाथ धोने, मास्क के उपयोग और वैक्सीनेशन पर जागरूकता सामग्री साझा कर रहे थे। सरकारी संस्थाएं क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल एडवाइजरी जारी कर रही थीं। इसी दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘इन्फोडेमिक' शब्द का उपयोग किया। इसका अर्थ ऐसी स्थिति से है जहां सही और गलत दोनों प्रकार की सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि लोगों के लिए सत्य और भ्रम के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वीकार किया कि महामारी के दौरान गलत स्वास्थ्य जानकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन गई थी। अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार कोविड-19 से जुड़ी गलत सूचनाओं के कारण दुनिया भर में हजारों लोग गलत उपचार पद्धतियों और फर्जी सलाह का शिकार हुए।
कई मामलों में लोगों ने वैज्ञानिक उपचार छोड़कर सोशल मीडिया आधारित घरेलू इलाजों पर भरोसा किया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया जहां जीवन बचाने का माध्यम बन सकता है वहीं गलत जानकारी का स्रोत भी बन सकता है। इसके बावजूद सोशल मीडिया के सकारात्मक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज सीपीआर, स्ट्रोक, मानसिक स्वास्थ्य, कैंसर स्क्रीनिंग, अंगदान और डेंगू रोकथाम जैसे विषयों पर आधारित लाखों वीडियो प्रतिदिन देखे जा रहे हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार यदि कार्डियक अरेस्ट के तुरंत बाद सीपीआर दिया जाए तो मरीज के जीवित बचने की संभावना दोगुनी या तिगुनी हो सकती है। इसी कारण सीपीआर जागरूकता वीडियो आज वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। इसी प्रकार अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार स्ट्रोक के दौरान शुरुआती ‘गोल्डन आवर्स' में उपचार मिलने पर मृत्यु और स्थायी विकलांगता का खतरा काफी कम हो जाता है। इAएऊ (इaम drददज्ग्हु, Arस् wाaक्हे, एजाम्प् dग्fिग्म्ल्त्tब्, ऊग्स tद sााक् पत्ज्) जैसे सरल संदेश सोशल मीडिया के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंच रहे हैं और लोगों को मेडिकल इमरजेंसी पहचानने में मदद कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष दुनिया में लगभग 1.8 करोड़ लोग हृदय रोगों के कारण अपनी जान गंवाते हैं। वहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रीसर्च (घ्ण्श्R) के अनुसार भारत में कुल मौतों के लगभग 63 प्रतिशत मामलों के लिए गैर संचारी रोग जिम्मेदार हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि समय पर जागरूकता और शुरुआती पहचान कितनी महत्वपूर्ण है और सोशल मीडिया इस दिशा में एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस डिजिटल क्रांति की दूसरी तस्वीर भी उतनी ही गंभीर है। आज “चमत्कारी इलाज'', बिना वैज्ञानिक प्रमाण वाले डाइट ट्रेंड्स, फर्जी मेडिकल दावे और वैक्सीन से जुड़ी अफवाहें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाती हैं। रीसर्च पत्रिका नेचर ह्यूमेन बिहेवियर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार गलत जानकारी अक्सर तथ्यात्मक जानकारी की तुलना में अधिक तेजी से फैलती है क्योंकि भावनात्मक और सनसनीखेज सामग्री लोगों का अधिक ध्यान आकर्षित करती है। विशेष रूप से युवाओं के बीच स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का प्रमुख स्रोत अब सोशल मीडिया बनता जा रहा है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की 2024 रिपोर्ट के अनुसार नई पीढ़ी स्वास्थ्य और समाचार संबंधी जानकारी मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म्स से प्राप्त कर रही है। यह बदलाव अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए क्योंकि स्वास्थ्य जागरूकता अब पहले से अधिक तेज़, व्यापक और सुलभ हो सकती है। चुनौती इसलिए क्योंकि छोटे वीडियो हमेशा जटिल मेडिकल विषयों की पूरी गहराई नहीं समझा सकते। मानसिक स्वास्थ्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज बेचैनी, तनाव और अवसाद जैसे विषयों पर हजारों वीडियो मौजूद हैं। इनमें से कुछ विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए उपयोगी वीडियो हैं लेकिन कई वीडियो गंभीर मानसिक स्थितियों को सामान्य ट्रेंड की तरह प्रस्तुत करते हैं।
परिणामस्वरूप स्व-निदान की प्रवृत्ति बढ़ रही है और लोग पेशेवर सहायता लेने से बच रहे हैं। फिर भी यह सच है कि यदि जिम्मेदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उपयोग किया जाए तो सोशल मीडिया सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास का सबसे प्रभावशाली संचार माध्यम बन सकता है। आज एक छोटी वीडियो किसी व्यक्ति को यह समझा सकती है कि महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों से अलग हो सकते हैं। एक वीडियो यह सिखा सकती है कि स्ट्रोक के दौरान हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। एक डिजिटल अभियान लोगों को अंगदान, टीकाकरण और रक्तदान के लिए प्रेरित कर सकता है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक भी है। सोशल मीडिया ने डॉक्टरों और आम जनता के बीच की दूरी कम कर दी है।
डॉक्टर अब केवल सफेद कोट पहने दूरस्थ विशेषज्ञ नहीं रहे बल्कि संवाद करने वाले, समझाने वाले और लोगों के बीच उपस्थित चेहरे बन चुके हैं। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति विश्वास भी मजबूत होता है।
ऐसे समय में एम्स जैसे सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक अस्पतालों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके पास यह अवसर है कि वे प्रमाण आधारित, सरल, बहुभाषी और नागरिक अनुकूल डिजिटल सामग्री के माध्यम से समाज के बीच विश्वसनीय स्वास्थ्य आवाज़ बनें। भविष्य का अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं होगा। वह सूचना, जागरूकता और विश्वास का भी केंद्र बनेगा। स्वास्थ्य संचार अब केवल ‘पब्लिसिटी' नहीं रहा बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आज किसी व्यक्ति की जान केवल ऑपरेशन थिएटर में ही नहीं बचती। कई बार वह एक मोबाइल पीन पर चल रही 30 सेकंड की रील से भी बच सकती है। कोई व्यक्ति किसी वीडियो से सीपीआर सीख सकता है। कोई परिवार समय रहते कैंसर की जांच करवा सकता है। कोई युवा मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना शुरू कर सकता है या कोई व्यक्ति किसी खतरनाक मिथक पर विश्वास करने से बच सकता है।
डिजिटल युग की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि जानकारी अब केवल सूचना नहीं रही बल्कि स्वास्थ्य का हिस्सा बन चुकी है। और इसलिए आज सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी का इलाज करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सच, झूठ से तेज लोगों तक पहुंचे।
(लेखक जनसंपर्क अधिकारी, एम्स पटना हैं।)
एक समय था जब स्वास्थ्य संबंधी जानकारी केवल डॉक्टरों के क्लीनिक, अस्पतालों, सरकारी अभियानों और समाचार पत्रों तक सीमित हुआ करती थी। किसी बीमारी के लक्षण, उसके बचाव या उपचार के बारे में जानने के लिए लोगों को विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन डिजिटल युग ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। आज स्वास्थ्य जागरूकता का सबसे बड़ा मंच अस्पताल नहीं बल्कि स्मार्टफोन की पीन बन चुकी है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो जैसे छोटे डिजिटल फॉर्मेट अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे हैं। वे तेजी से जनस्वास्थ्य जागरूकता के प्रभावशाली उपकरणों में बदलते जा रहे हैं। कुछ सेकंड की एक वीडियो किसी व्यक्ति को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण पहचानना सिखा सकती है, किसी को सीपीआर देना समझा सकती है या किसी परिवार को समय रहते कैंसर स्क्रीनिंग कराने के लिए प्रेरित कर सकती है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी बदलाव नहीं है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार की पूरी अवधारणा में आया एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन है।
अब चिकित्सा केवल अस्पतालों की दीवारों के भीतर सीमित नहीं है बल्कि सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर भी जीवित है। स्वास्थ्य जागरूकता अब पोस्टर, पेंपलेट और सरकारी अभियानों से आगे बढ़कर एल्गोरिद्म और वायरल कंटेंट के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
अूaRाज्दूत् का अुग्taत् 2025 उत्दंत् ध्नन्गै Rाज्दू के अनुसार दुनिया में 5.24 अरब से अधिक सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं जो वैश्विक आबादी का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया का औसत इंटरनेट उपयोगकर्ता प्रतिदिन लगभग 2 घंटे 21 मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है। भारत में डिजिटल विस्तार की गति और भी तेज़ है। (घ्हीहू aह् श्दंग्त Assदम्ग्atग्दह द घ्ह्ग्a (घ्Aश्Aघ्) तथा ख्aहू की हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की है जो यह दर्शाती है कि डिजिटल स्वास्थ्य जागरूकता अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही। यही कारण है कि स्वास्थ्य संचार अब पहले से कहीं अधिक लोकतांत्रिक हो गया है।
अब कोई भी डॉक्टर, अस्पताल या स्वास्थ्य संस्था सीधे आम जनता से संवाद कर सकती है। पहले जहां किसी सरकारी स्वास्थ्य अभियान को गांवों और कस्बों तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे वहीं आज एक छोटी वीडियो कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।
पटना में रिकॉर्ड की गई एक स्वास्थ्य जागरूकता रील बिहार के दूरदराज गांवों से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक तेजी से पहुंच सकती है। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य साक्षरता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, यह बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (ऱइप्ए-5) और विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य अध्ययनों के अनुसार देश की बड़ी आबादी आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य जानकारी, पोषण, टीकाकरण और रोगों की शुरुआती पहचान संबंधी जागरूकता से वंचित है। ऐसे में इंटरनेट और स्मार्टफोन स्वास्थ्य जानकारी के सबसे सुलभ माध्यम बनकर उभरे हैं। कोविड-19 महामारी ने इस डिजिटल बदलाव को अभूतपूर्व गति दी। महामारी के दौरान जब लोग भय, भ्रम और अनिश्चितता से घिरे हुए थे तब सोशल मीडिया स्वास्थ्य सूचना का सबसे तेज़ माध्यम बनकर सामने आया। डॉक्टर लाइव वीडियो के माध्यम से ऑक्सीजन लेवल और पांमण के लक्षण समझा रहे थे।
अस्पताल हाथ धोने, मास्क के उपयोग और वैक्सीनेशन पर जागरूकता सामग्री साझा कर रहे थे। सरकारी संस्थाएं क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल एडवाइजरी जारी कर रही थीं। इसी दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘इन्फोडेमिक' शब्द का उपयोग किया। इसका अर्थ ऐसी स्थिति से है जहां सही और गलत दोनों प्रकार की सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि लोगों के लिए सत्य और भ्रम के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वीकार किया कि महामारी के दौरान गलत स्वास्थ्य जानकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन गई थी। अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार कोविड-19 से जुड़ी गलत सूचनाओं के कारण दुनिया भर में हजारों लोग गलत उपचार पद्धतियों और फर्जी सलाह का शिकार हुए।
कई मामलों में लोगों ने वैज्ञानिक उपचार छोड़कर सोशल मीडिया आधारित घरेलू इलाजों पर भरोसा किया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया जहां जीवन बचाने का माध्यम बन सकता है वहीं गलत जानकारी का स्रोत भी बन सकता है। इसके बावजूद सोशल मीडिया के सकारात्मक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज सीपीआर, स्ट्रोक, मानसिक स्वास्थ्य, कैंसर स्क्रीनिंग, अंगदान और डेंगू रोकथाम जैसे विषयों पर आधारित लाखों वीडियो प्रतिदिन देखे जा रहे हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार यदि कार्डियक अरेस्ट के तुरंत बाद सीपीआर दिया जाए तो मरीज के जीवित बचने की संभावना दोगुनी या तिगुनी हो सकती है। इसी कारण सीपीआर जागरूकता वीडियो आज वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। इसी प्रकार अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार स्ट्रोक के दौरान शुरुआती ‘गोल्डन आवर्स' में उपचार मिलने पर मृत्यु और स्थायी विकलांगता का खतरा काफी कम हो जाता है। इAएऊ (इaम drददज्ग्हु, Arस् wाaक्हे, एजाम्प् dग्fिग्म्ल्त्tब्, ऊग्स tद sााक् पत्ज्) जैसे सरल संदेश सोशल मीडिया के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंच रहे हैं और लोगों को मेडिकल इमरजेंसी पहचानने में मदद कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष दुनिया में लगभग 1.8 करोड़ लोग हृदय रोगों के कारण अपनी जान गंवाते हैं। वहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रीसर्च (घ्ण्श्R) के अनुसार भारत में कुल मौतों के लगभग 63 प्रतिशत मामलों के लिए गैर संचारी रोग जिम्मेदार हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि समय पर जागरूकता और शुरुआती पहचान कितनी महत्वपूर्ण है और सोशल मीडिया इस दिशा में एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस डिजिटल क्रांति की दूसरी तस्वीर भी उतनी ही गंभीर है। आज “चमत्कारी इलाज'', बिना वैज्ञानिक प्रमाण वाले डाइट ट्रेंड्स, फर्जी मेडिकल दावे और वैक्सीन से जुड़ी अफवाहें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाती हैं। रीसर्च पत्रिका नेचर ह्यूमेन बिहेवियर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार गलत जानकारी अक्सर तथ्यात्मक जानकारी की तुलना में अधिक तेजी से फैलती है क्योंकि भावनात्मक और सनसनीखेज सामग्री लोगों का अधिक ध्यान आकर्षित करती है। विशेष रूप से युवाओं के बीच स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का प्रमुख स्रोत अब सोशल मीडिया बनता जा रहा है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की 2024 रिपोर्ट के अनुसार नई पीढ़ी स्वास्थ्य और समाचार संबंधी जानकारी मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म्स से प्राप्त कर रही है। यह बदलाव अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए क्योंकि स्वास्थ्य जागरूकता अब पहले से अधिक तेज़, व्यापक और सुलभ हो सकती है। चुनौती इसलिए क्योंकि छोटे वीडियो हमेशा जटिल मेडिकल विषयों की पूरी गहराई नहीं समझा सकते। मानसिक स्वास्थ्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज बेचैनी, तनाव और अवसाद जैसे विषयों पर हजारों वीडियो मौजूद हैं। इनमें से कुछ विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए उपयोगी वीडियो हैं लेकिन कई वीडियो गंभीर मानसिक स्थितियों को सामान्य ट्रेंड की तरह प्रस्तुत करते हैं।
परिणामस्वरूप स्व-निदान की प्रवृत्ति बढ़ रही है और लोग पेशेवर सहायता लेने से बच रहे हैं। फिर भी यह सच है कि यदि जिम्मेदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उपयोग किया जाए तो सोशल मीडिया सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास का सबसे प्रभावशाली संचार माध्यम बन सकता है। आज एक छोटी वीडियो किसी व्यक्ति को यह समझा सकती है कि महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों से अलग हो सकते हैं। एक वीडियो यह सिखा सकती है कि स्ट्रोक के दौरान हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। एक डिजिटल अभियान लोगों को अंगदान, टीकाकरण और रक्तदान के लिए प्रेरित कर सकता है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक भी है। सोशल मीडिया ने डॉक्टरों और आम जनता के बीच की दूरी कम कर दी है।
डॉक्टर अब केवल सफेद कोट पहने दूरस्थ विशेषज्ञ नहीं रहे बल्कि संवाद करने वाले, समझाने वाले और लोगों के बीच उपस्थित चेहरे बन चुके हैं। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति विश्वास भी मजबूत होता है।
ऐसे समय में एम्स जैसे सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक अस्पतालों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके पास यह अवसर है कि वे प्रमाण आधारित, सरल, बहुभाषी और नागरिक अनुकूल डिजिटल सामग्री के माध्यम से समाज के बीच विश्वसनीय स्वास्थ्य आवाज़ बनें। भविष्य का अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं होगा। वह सूचना, जागरूकता और विश्वास का भी केंद्र बनेगा। स्वास्थ्य संचार अब केवल ‘पब्लिसिटी' नहीं रहा बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आज किसी व्यक्ति की जान केवल ऑपरेशन थिएटर में ही नहीं बचती। कई बार वह एक मोबाइल पीन पर चल रही 30 सेकंड की रील से भी बच सकती है। कोई व्यक्ति किसी वीडियो से सीपीआर सीख सकता है। कोई परिवार समय रहते कैंसर की जांच करवा सकता है। कोई युवा मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना शुरू कर सकता है या कोई व्यक्ति किसी खतरनाक मिथक पर विश्वास करने से बच सकता है।
डिजिटल युग की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि जानकारी अब केवल सूचना नहीं रही बल्कि स्वास्थ्य का हिस्सा बन चुकी है। और इसलिए आज सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी का इलाज करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सच, झूठ से तेज लोगों तक पहुंचे।
(लेखक जनसंपर्क अधिकारी, एम्स पटना हैं।)