दो शिखर अश्वेत नेता को कैसे जोड़ते बापू और भारत
प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
विवेक शुक्ला
अमेरिका में अश्वेतों के हक के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर जब 10 फरवरी 1959 को राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। उस वक्त राजधानी कोहरे की चादर में लिपटी हुई थी। तब राजघाट का निर्माण हुआ ही था। उनके राजघाट पर आने के 31 सालों के बाद एक और महान अश्वेत नेता राजघाट पहुंचता है। उसका नाम था नेल्सन मंडेला। वे 18 अत्तूबर 1990 को राजघाट आए थे। ये दोनों आपस में कभी नहीं मिले,पर इन्हें जोड़ती गांधी और उनकी विचारधारा। दोनों ने अपने-अपने देशों में अश्वेतों के अधिकारों के लिए अहिंसा और नैतिक प्रतिरोध की राह अपनाई। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर दोनों दिल्ली आए और राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि दी।
27 साल की जेल यातना- 1990 में, 27 वर्ष की लंबी जेल यातना के बाद नेल्सन मंडेला रिहा हुए। पूरी दुनिया उन्हें सुनने को उतावली थी। उसी साल 15 अक्टूबर को वे दिल्ली पहुंचे। पालम एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत हुआ और हजारों लोग ‘मैडिबा' के जयकारे लगा रहे थे।
मंडेला ने स्पष्ट कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया। अपनी आत्मकथा थ्दहु sंaत्क् tद इrााdदस् (1994) में उन्होंने लिखा कि गांधी का सत्याग्रह उनके संघर्ष को नैतिक बल प्रदान करता रहा। वे राजघाट पहुंचे और गांधी को अपना नायक बताया। उनकी यह यात्रा छोटी अवश्य थी, लेकिन भावनात्मक रूप से बेहद गहरी।
मंडेला का नाम अमर - मंडेला की पहली यात्रा के बाद साउथ दिल्ली की एक प्रमुख सड़क (वसंत कुंज-वसंत विहार मार्ग) का नाम नेल्सन मंडेला मार्ग रख दिया गया। इसके अलावा जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2004 में नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रेजोल्यूशन की स्थापना हुई। आज भी 18 जुलाई (मंडेला दिवस) पर दिल्ली में गोष्ठियां आयोजित होती हैं। 1994 में वे दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।
उधर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर पत्नी कोरेटा स्कॉट किंग और जीवनीकार लॉरेंस रेड्डिक के साथ 9 फरवरी को बंबई होते हुए दिल्ली आए। किशोरावस्था में शिक्षक बेंजामिन एलाया मेज के मार्गदर्शन में उन्होंने गांधी साहित्य पढ़ा था, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
दिल्ली एयरपोर्ट पर गांधी स्मारक निधि के प्रतिनिधियों ने उनका स्वागत किया। किंग ने भावुक होकर कहा, ‘मैं दूसरे देशों में पर्यटक बनकर जा सकता हूं, लेकिन भारत में मैं तीर्थयात्री बनकर आया हूं, क्योंकि यह गांधी का देश है।' उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित किया, भारतीय नेताओं से मुलाकात की, गांधी परिवार के सदस्यों और सत्याग्रहियों से भेंट की। राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि देते समय उनकी आंखें नम हो गईं। यह 1956 में राजघाट बनने के बाद किसी विश्व नेता की पहली यात्रा थी।
वे जनपथ होटल (वर्तमान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) में ठहरे और दिल्ली के बाद पटना,गया,कलकत्ता,मद्रास,गांधीग्राम तथा साबरमती आश्रम भी गए।
किंग की गांधी से गहरी प्रेरणा - गांधी के अहिंसा,प्रेम और नैतिक प्रतिरोध के सिद्धांतों ने किंग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ उन्होंने गांधी के सत्याग्रह मॉडल को अपनाया। भारत यात्रा के बाद उन्होंने ंिंदहब् पत्रिका (1959) में लिखा: ‘भारत से लौटने के बाद मेरा यकीन पक्का हो गया कि अश्वेतों को अधिकार दिलाने के लिए अहिंसा के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं हो सकता।'
दोनों नेताओं का साझा प्रेरणा स्रोत - दरअसल, दोनों महानायक महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्याग्रह और नैतिक शक्ति के दर्शन से गहराई से जुड़े थे। मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ लंबे संघर्ष में गांधी की राह अपनाकर अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया। किंग ने मोंटगोमरी बस बहिष्कार और मार्चों में अहिंसक रणनीति को गांधी के प्रभाव से लिया। दोनों ने यह सीखा कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन से अन्याय के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है। मंडेला ने इसे राजनीतिक आजादी के लिए इस्तेमाल किया तो किंग ने नस्लीय समानता के लिए।
साझा प्रेरणा का केंद्र - इन दोनों दिल्ली यात्राओं का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यहां से दोनों को नई ऊर्जा और विश्वास मिला। मंडेला की यात्रा ने उनके वैश्विक समर्थन को मजबूत किया, जबकि किंग की यात्रा ने उनके आंतरिक संकल्प को और गहरा किया। दिल्ली गांधी के माध्यम से इन दोनों महान व्यक्तियों का साझा प्रेरणा स्थल बन गई।
नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर विश्व इतिहास के उन दुर्लभ व्यक्तियों में शामिल हैं, जो सदैव दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। अहिंसा, सत्याग्रह, प्रेम और नैतिक प्रतिरोध के सिद्धांतों को अपनाकर उन्होंने अपने युग के सबसे कठिन संघर्षों का सामना किया और मानवता को नई राह दिखाई।
मंडेला न केवल दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने,बल्कि पूरे विश्व को सिखाया कि क्षमा और सुलह से भी ाढांति लाई जा सकती है। वहीं मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अहिंसक आंदोलन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने साबित किया कि नैतिक शक्ति हथियारों से कहीं अधिक प्रभावी होती है।
दोनों की दिल्ली यात्राएं इस सच्चाई को रेखांकित करती हैं कि गांधी की भूमि से मिली प्रेरणा ने उनके संघर्ष को वैश्विक मान्यता दिलाई। मंडेला और किंग ने दिखाया कि असली नेतृत्व हिंसा या बदले की भावना से नहीं,बल्कि न्याय,समानता और मानवीय गरिमा की रक्षा से उपजता है। आज भी जब दुनिया कहीं नस्लवाद,अन्याय और असमानता से जूझ रही है,उनके जीवन दुनिया को संदेश देते हैं कि अंधकार के समय में भी आशा की किरण बनना संभव है।
उनकी विरासत साबित करती है कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति और नैतिक साहस पूरे समाज को बदल सकता है। महात्मा गांधी की विचारधारा इन दोनों महान नेताओं के माध्यम से अनंत काल तक जीवित रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ लड़ने का साहस प्रदान करती रहेगी। मंडेला और किंग जूनियर सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं,बल्कि हर उस व्यक्ति के हृदय में अमर हैं जो स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
अमेरिका में अश्वेतों के हक के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर जब 10 फरवरी 1959 को राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। उस वक्त राजधानी कोहरे की चादर में लिपटी हुई थी। तब राजघाट का निर्माण हुआ ही था। उनके राजघाट पर आने के 31 सालों के बाद एक और महान अश्वेत नेता राजघाट पहुंचता है। उसका नाम था नेल्सन मंडेला। वे 18 अत्तूबर 1990 को राजघाट आए थे। ये दोनों आपस में कभी नहीं मिले,पर इन्हें जोड़ती गांधी और उनकी विचारधारा। दोनों ने अपने-अपने देशों में अश्वेतों के अधिकारों के लिए अहिंसा और नैतिक प्रतिरोध की राह अपनाई। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर दोनों दिल्ली आए और राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि दी।
27 साल की जेल यातना- 1990 में, 27 वर्ष की लंबी जेल यातना के बाद नेल्सन मंडेला रिहा हुए। पूरी दुनिया उन्हें सुनने को उतावली थी। उसी साल 15 अक्टूबर को वे दिल्ली पहुंचे। पालम एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत हुआ और हजारों लोग ‘मैडिबा' के जयकारे लगा रहे थे।
मंडेला ने स्पष्ट कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया। अपनी आत्मकथा थ्दहु sंaत्क् tद इrााdदस् (1994) में उन्होंने लिखा कि गांधी का सत्याग्रह उनके संघर्ष को नैतिक बल प्रदान करता रहा। वे राजघाट पहुंचे और गांधी को अपना नायक बताया। उनकी यह यात्रा छोटी अवश्य थी, लेकिन भावनात्मक रूप से बेहद गहरी।
मंडेला का नाम अमर - मंडेला की पहली यात्रा के बाद साउथ दिल्ली की एक प्रमुख सड़क (वसंत कुंज-वसंत विहार मार्ग) का नाम नेल्सन मंडेला मार्ग रख दिया गया। इसके अलावा जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2004 में नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रेजोल्यूशन की स्थापना हुई। आज भी 18 जुलाई (मंडेला दिवस) पर दिल्ली में गोष्ठियां आयोजित होती हैं। 1994 में वे दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।
उधर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर पत्नी कोरेटा स्कॉट किंग और जीवनीकार लॉरेंस रेड्डिक के साथ 9 फरवरी को बंबई होते हुए दिल्ली आए। किशोरावस्था में शिक्षक बेंजामिन एलाया मेज के मार्गदर्शन में उन्होंने गांधी साहित्य पढ़ा था, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
दिल्ली एयरपोर्ट पर गांधी स्मारक निधि के प्रतिनिधियों ने उनका स्वागत किया। किंग ने भावुक होकर कहा, ‘मैं दूसरे देशों में पर्यटक बनकर जा सकता हूं, लेकिन भारत में मैं तीर्थयात्री बनकर आया हूं, क्योंकि यह गांधी का देश है।' उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित किया, भारतीय नेताओं से मुलाकात की, गांधी परिवार के सदस्यों और सत्याग्रहियों से भेंट की। राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि देते समय उनकी आंखें नम हो गईं। यह 1956 में राजघाट बनने के बाद किसी विश्व नेता की पहली यात्रा थी।
वे जनपथ होटल (वर्तमान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) में ठहरे और दिल्ली के बाद पटना,गया,कलकत्ता,मद्रास,गांधीग्राम तथा साबरमती आश्रम भी गए।
किंग की गांधी से गहरी प्रेरणा - गांधी के अहिंसा,प्रेम और नैतिक प्रतिरोध के सिद्धांतों ने किंग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ उन्होंने गांधी के सत्याग्रह मॉडल को अपनाया। भारत यात्रा के बाद उन्होंने ंिंदहब् पत्रिका (1959) में लिखा: ‘भारत से लौटने के बाद मेरा यकीन पक्का हो गया कि अश्वेतों को अधिकार दिलाने के लिए अहिंसा के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं हो सकता।'
दोनों नेताओं का साझा प्रेरणा स्रोत - दरअसल, दोनों महानायक महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्याग्रह और नैतिक शक्ति के दर्शन से गहराई से जुड़े थे। मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ लंबे संघर्ष में गांधी की राह अपनाकर अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया। किंग ने मोंटगोमरी बस बहिष्कार और मार्चों में अहिंसक रणनीति को गांधी के प्रभाव से लिया। दोनों ने यह सीखा कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन से अन्याय के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है। मंडेला ने इसे राजनीतिक आजादी के लिए इस्तेमाल किया तो किंग ने नस्लीय समानता के लिए।
साझा प्रेरणा का केंद्र - इन दोनों दिल्ली यात्राओं का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यहां से दोनों को नई ऊर्जा और विश्वास मिला। मंडेला की यात्रा ने उनके वैश्विक समर्थन को मजबूत किया, जबकि किंग की यात्रा ने उनके आंतरिक संकल्प को और गहरा किया। दिल्ली गांधी के माध्यम से इन दोनों महान व्यक्तियों का साझा प्रेरणा स्थल बन गई।
नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर विश्व इतिहास के उन दुर्लभ व्यक्तियों में शामिल हैं, जो सदैव दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। अहिंसा, सत्याग्रह, प्रेम और नैतिक प्रतिरोध के सिद्धांतों को अपनाकर उन्होंने अपने युग के सबसे कठिन संघर्षों का सामना किया और मानवता को नई राह दिखाई।
मंडेला न केवल दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने,बल्कि पूरे विश्व को सिखाया कि क्षमा और सुलह से भी ाढांति लाई जा सकती है। वहीं मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अहिंसक आंदोलन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने साबित किया कि नैतिक शक्ति हथियारों से कहीं अधिक प्रभावी होती है।
दोनों की दिल्ली यात्राएं इस सच्चाई को रेखांकित करती हैं कि गांधी की भूमि से मिली प्रेरणा ने उनके संघर्ष को वैश्विक मान्यता दिलाई। मंडेला और किंग ने दिखाया कि असली नेतृत्व हिंसा या बदले की भावना से नहीं,बल्कि न्याय,समानता और मानवीय गरिमा की रक्षा से उपजता है। आज भी जब दुनिया कहीं नस्लवाद,अन्याय और असमानता से जूझ रही है,उनके जीवन दुनिया को संदेश देते हैं कि अंधकार के समय में भी आशा की किरण बनना संभव है।
उनकी विरासत साबित करती है कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति और नैतिक साहस पूरे समाज को बदल सकता है। महात्मा गांधी की विचारधारा इन दोनों महान नेताओं के माध्यम से अनंत काल तक जीवित रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ लड़ने का साहस प्रदान करती रहेगी। मंडेला और किंग जूनियर सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं,बल्कि हर उस व्यक्ति के हृदय में अमर हैं जो स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)