नदियों के अस्तित्व पर बढ़ता खतरा
प्रकाशित: 14-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
योगेश कुमार गोयल
भारत में नदियों का महत्व अत्यंत गहरा और व्यापक है। नदियां यहां केवल जलधाराएं नहीं हैं बल्कि सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिकता का आधार भी हैं। भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही नदियों को पूजनीय माना गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियां केवल भौगोलिक संरचनाएं भर नहीं हैं बल्कि भारतीय संस्कृति में इन्हें ‘मां' का दर्जा प्राप्त है। यह सम्मान केवल धार्मिक मान्यता तक ही सीमित नहीं है बल्कि व्यावहारिक रूप से भी नदियां जीवन का स्रोत रही हैं। यदि पृथ्वी को हमारी मां माना जाए तो नदियां उसकी नसों की तरह हैं, जो पूरे भूभाग में जल प्रवाहित करके उसे संजीवनी प्रदान करती हैं। जल के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है और यही कारण है कि भारत सहित पूरे विश्व में नदियों का संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। नदियों की बिगड़ती स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही प्रतिवर्ष 14 मार्च को ‘नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस' मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और नीतिगत प्रयासों को बल देना है। इस वर्ष 29वां ‘नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस' ‘नदियों की रक्षा करें, लोगों की रक्षा करें' विषय के साथ मनाया जा रहा है, जो जलवायु प्रभावों से वैश्विक नदी प्रणालियों की रक्षा करने और बदले में उन पर निर्भर समुदायों और जैव विविधता की रक्षा करने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। नदियां केवल जल स्रोत नहीं हैं बल्कि हमारी संस्कृति, आजीविका और भविष्य का अभिन्न हिस्सा हैं। यदि नदियां स्वस्थ होंगी, तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। भारत में हजारों वर्षों से नदियों के किनारे बसे नगरों और गांवों में सभ्यताओं का विकास हुआ है। सिंधु घाटी सभ्यता हो या गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र, इन स्थानों ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनने में भूमिका निभाई है। भारत में आज भी 4000 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां प्रवाहित होती हैं, जिनमें से कुछ नदियां हिमालय से निकलती हैं और ग्लेशियरों से पोषित होती हैं जबकि अन्य प्रायद्वीपीय नदियां मुख्यत वर्षा जल पर निर्भर रहती हैं। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास इत्यादि हिमालय की प्रमुख नदियां पूरे उत्तर भारत की कृषि और जलापूर्ति में अहम भूमिका निभाती हैं। वहीं, दक्षिण भारत में बहने वाली नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, साबरमती, माही, सुबर्णरेखा और लूनी नदियां भी विभिन्न राज्यों की जल आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं बल्कि वे वर्षा जल को संचित करके भूमि की नमी बनाए रखने का कार्य करती हैं। इसी कारण कृषि, पशुपालन और अन्य आजीविकाओं में नदियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक समय में नदियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अवैध खनन और औद्योगिक कचरे के कारण नदियों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। हाल के वर्षों में नदियों के जल स्तर में असामान्य कमी देखी गई है। 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की 50 प्रतिशत से अधिक नदी क्षेत्रों में जल स्तर सामान्य से कम था, जिससे जल संकट गहराता जा रहा है।
यह जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को दर्शाता है। वह लगातार तीसरा वर्ष था, जब नदियों के जल स्तर में असामान्य कमी देखी गई। भारत की सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण नदी गंगा भी प्रदूषण के गंभीर खतरे का सामना कर रही है। लगभग 2510 किलोमीटर लंबी इस नदी में अनेक शहरों और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट मिलते हैं, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। असम की जीवनरेखा कही जाने वाली 2900 किलोमीटर लंबी ब्रह्मपुत्र नदी भी प्रदूषणकारी स्रोतों से प्रभावित हो रही है। इस नदी में सीवेज अपशिष्ट, तेल और अन्य प्रदूषकों के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह न केवल जलीय जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी प्रभावित कर रहा है।
नदियों के प्रदूषण के कई प्रमुख कारण हैं, जिनमें औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा और अवैध खनन मुख्य रूप से शामिल हैं। उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक पदार्थ और विषैले तत्व नदियों में मिलकर उन्हें प्रदूषित करते हैं। यद्यपि इन अपशिष्टों के निपटान के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं लेकिन उनके प्रभावी ािढयान्वयन की कमी के कारण प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। प्लास्टिक प्रदूषण भी नदियों के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया की 20 सबसे प्रदूषित नदियों के माध्यम से सबसे अधिक प्लास्टिक महासागरों तक पहुंच रहा है। चीन की यांग्त्जे नदी से प्रतिवर्ष 3.33 लाख टन प्लास्टिक महासागरों में जाता है जबकि गंगा नदी से 1.15 लाख टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है। वहीं, अवैध खनन नदियों की प्राकृतिक संरचना और प्रवाह में बाधा डालता है, जिससे उनकी जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रेत खनन और अन्य अवैध गतिविधियां नदियों के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाती हैं। फिलहाल नदियों के संरक्षण के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा प्रकाशित ‘नदी बेसिन एटलस' नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है, जिससे नदियों के प्रबंधन और संरक्षण में सहायता मिलती है। इसके अलावा नदियों के संरक्षण के लिए सामुदायिक सहभागिता, सख्त कानूनों का पालन और सतत विकास नीतियों का कार्यान्वयन आवश्यक है। सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विभिन्न नदी सफाई अभियान चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ‘नमामि गंगे' परियोजना गंगा की स्वच्छता को पुनर्स्थापित करने के लिए एक प्रमुख सरकारी पहल है।
बहरहाल, नदियों का महत्व केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है। वे कृषि, उद्योग, परिवहन और जल आपूर्ति का आधार हैं। यदि नदियां सुरक्षित नहीं रहेंगी तो जल संकट, खाद्य संकट और पारिस्थितिक असंतुलन की संभावना बढ़ेगी। इसलिए नदियों का संरक्षण हमारे भविष्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। हमें नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ठोस उपाय करने होंगे और जन चेतना जागृत करनी होगी ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और समृद्ध पर्यावरण सुनिश्चित कर सकें। नदियों की रक्षा करना केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य भी है। यदि हम सामूहिक रूप से प्रयास करें तो हमारी नदियां पुन स्वच्छ और समृद्ध हो सकती हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
भारत में नदियों का महत्व अत्यंत गहरा और व्यापक है। नदियां यहां केवल जलधाराएं नहीं हैं बल्कि सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिकता का आधार भी हैं। भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही नदियों को पूजनीय माना गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियां केवल भौगोलिक संरचनाएं भर नहीं हैं बल्कि भारतीय संस्कृति में इन्हें ‘मां' का दर्जा प्राप्त है। यह सम्मान केवल धार्मिक मान्यता तक ही सीमित नहीं है बल्कि व्यावहारिक रूप से भी नदियां जीवन का स्रोत रही हैं। यदि पृथ्वी को हमारी मां माना जाए तो नदियां उसकी नसों की तरह हैं, जो पूरे भूभाग में जल प्रवाहित करके उसे संजीवनी प्रदान करती हैं। जल के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है और यही कारण है कि भारत सहित पूरे विश्व में नदियों का संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। नदियों की बिगड़ती स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही प्रतिवर्ष 14 मार्च को ‘नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस' मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और नीतिगत प्रयासों को बल देना है। इस वर्ष 29वां ‘नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस' ‘नदियों की रक्षा करें, लोगों की रक्षा करें' विषय के साथ मनाया जा रहा है, जो जलवायु प्रभावों से वैश्विक नदी प्रणालियों की रक्षा करने और बदले में उन पर निर्भर समुदायों और जैव विविधता की रक्षा करने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। नदियां केवल जल स्रोत नहीं हैं बल्कि हमारी संस्कृति, आजीविका और भविष्य का अभिन्न हिस्सा हैं। यदि नदियां स्वस्थ होंगी, तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। भारत में हजारों वर्षों से नदियों के किनारे बसे नगरों और गांवों में सभ्यताओं का विकास हुआ है। सिंधु घाटी सभ्यता हो या गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र, इन स्थानों ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनने में भूमिका निभाई है। भारत में आज भी 4000 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां प्रवाहित होती हैं, जिनमें से कुछ नदियां हिमालय से निकलती हैं और ग्लेशियरों से पोषित होती हैं जबकि अन्य प्रायद्वीपीय नदियां मुख्यत वर्षा जल पर निर्भर रहती हैं। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास इत्यादि हिमालय की प्रमुख नदियां पूरे उत्तर भारत की कृषि और जलापूर्ति में अहम भूमिका निभाती हैं। वहीं, दक्षिण भारत में बहने वाली नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, साबरमती, माही, सुबर्णरेखा और लूनी नदियां भी विभिन्न राज्यों की जल आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं बल्कि वे वर्षा जल को संचित करके भूमि की नमी बनाए रखने का कार्य करती हैं। इसी कारण कृषि, पशुपालन और अन्य आजीविकाओं में नदियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक समय में नदियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अवैध खनन और औद्योगिक कचरे के कारण नदियों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। हाल के वर्षों में नदियों के जल स्तर में असामान्य कमी देखी गई है। 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की 50 प्रतिशत से अधिक नदी क्षेत्रों में जल स्तर सामान्य से कम था, जिससे जल संकट गहराता जा रहा है।
यह जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को दर्शाता है। वह लगातार तीसरा वर्ष था, जब नदियों के जल स्तर में असामान्य कमी देखी गई। भारत की सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण नदी गंगा भी प्रदूषण के गंभीर खतरे का सामना कर रही है। लगभग 2510 किलोमीटर लंबी इस नदी में अनेक शहरों और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट मिलते हैं, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। असम की जीवनरेखा कही जाने वाली 2900 किलोमीटर लंबी ब्रह्मपुत्र नदी भी प्रदूषणकारी स्रोतों से प्रभावित हो रही है। इस नदी में सीवेज अपशिष्ट, तेल और अन्य प्रदूषकों के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह न केवल जलीय जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी प्रभावित कर रहा है।
नदियों के प्रदूषण के कई प्रमुख कारण हैं, जिनमें औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा और अवैध खनन मुख्य रूप से शामिल हैं। उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक पदार्थ और विषैले तत्व नदियों में मिलकर उन्हें प्रदूषित करते हैं। यद्यपि इन अपशिष्टों के निपटान के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं लेकिन उनके प्रभावी ािढयान्वयन की कमी के कारण प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। प्लास्टिक प्रदूषण भी नदियों के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया की 20 सबसे प्रदूषित नदियों के माध्यम से सबसे अधिक प्लास्टिक महासागरों तक पहुंच रहा है। चीन की यांग्त्जे नदी से प्रतिवर्ष 3.33 लाख टन प्लास्टिक महासागरों में जाता है जबकि गंगा नदी से 1.15 लाख टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है। वहीं, अवैध खनन नदियों की प्राकृतिक संरचना और प्रवाह में बाधा डालता है, जिससे उनकी जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रेत खनन और अन्य अवैध गतिविधियां नदियों के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाती हैं। फिलहाल नदियों के संरक्षण के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा प्रकाशित ‘नदी बेसिन एटलस' नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है, जिससे नदियों के प्रबंधन और संरक्षण में सहायता मिलती है। इसके अलावा नदियों के संरक्षण के लिए सामुदायिक सहभागिता, सख्त कानूनों का पालन और सतत विकास नीतियों का कार्यान्वयन आवश्यक है। सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विभिन्न नदी सफाई अभियान चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ‘नमामि गंगे' परियोजना गंगा की स्वच्छता को पुनर्स्थापित करने के लिए एक प्रमुख सरकारी पहल है।
बहरहाल, नदियों का महत्व केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है। वे कृषि, उद्योग, परिवहन और जल आपूर्ति का आधार हैं। यदि नदियां सुरक्षित नहीं रहेंगी तो जल संकट, खाद्य संकट और पारिस्थितिक असंतुलन की संभावना बढ़ेगी। इसलिए नदियों का संरक्षण हमारे भविष्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। हमें नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ठोस उपाय करने होंगे और जन चेतना जागृत करनी होगी ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और समृद्ध पर्यावरण सुनिश्चित कर सकें। नदियों की रक्षा करना केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य भी है। यदि हम सामूहिक रूप से प्रयास करें तो हमारी नदियां पुन स्वच्छ और समृद्ध हो सकती हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)