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नागरिक विश्वास के 12 वर्ष : एक समकालीन विमर्श

प्रकाशित: 16-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
लोकतंत्र में जनता केवल भाषण नहीं सुनती, वह यह भी देखती है कि सत्ता उसकी समस्याओं को कितना समझती है और उनके समाधान के लिए कितनी ईमानदारी से प्रयास करती है। वर्ष 2014 में जब देश की जनता ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया, तो उसके पीछे यह विश्वास भी था कि देश को ऐसा नेतृत्व मिला है जो आम आदमी के जीवन की वास्तविक कठिनाइयों को समझता है। मोदी ने सत्ता संभालते ही राष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत जनमानस की उन मूलभूत किंतु दशकों से उपेक्षित आवश्यकताओं से की, जिन्हें अक्सर विकास की बड़ी-बड़ी बहसों में पर्याप्त महत्व नहीं मिला था।
मुझे आज भी स्मरण है कि स्वच्छ भारत मिशन के प्रारंभिक दिनों में अनेक लोगों ने इसका उपहास उड़ाया था। एक कवि ने कवि सम्मेलन के मंच से व्यंग्य करते हुए कहा था कि जिन लोगों की चादरें और बिस्तर उनके नौकर साफ करते हैं, वे स्वच्छता के ब्रांड एंबेसडर बनाए गए हैं। उन्होंने मजाक उड़ाते हुए कहा कि गांधी जी के चश्मे के एक शीशे पर स्वच्छ लिखा है और दूसरे पर भारत, यानी जिधर स्वच्छ दिखता है उधर तो भारत नहीं है और जिधर भारत दिखता है वह स्वच्छ नहीं है। उस समय यह व्यंग्य लोगों को हँसा सकता था, किंतु मोदी ने आलोचनाओं और उपहासों की परवाह किए बिना एक साधक की भाँति अपने अभियान को आगे बढ़ाया। उन्होंने स्वच्छता को सरकारी योजना नहीं, बल्कि जन आंदोलन बनाने का प्रयास किया।
आज परिणाम हमारे सामने है। स्वच्छता के प्रति समाज की चेतना बदली है। नई पीढ़ी का बच्चा सड़क पर कचरा फेंकने से पहले कूड़ेदान ढूँढ़ता है। विद्यालयों में स्वच्छता एक संस्कार के रूप में पढ़ाई जा रही है। यह परिवर्तन किसी कानून ने नहीं, बल्कि एक सतत सामाजिक अभियान ने उत्पन्न किया है।
इसके बाद मोदी सरकार ने ग्रामीण महिलाओं की एक और बड़ी पीड़ा को समझा। वर्षों तक धुएँ से भरे रसोईघरों में चूल्हे के सामने बैठकर भोजन बनाने वाली महिलाओं की समस्या को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया गया। उज्ज्वला योजना केवल गैस कनेक्शन देने की योजना नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों महिलाओं के स्वास्थ्य, सुविधा और सम्मान से जुड़ा प्रयास था। जिस पीड़ा को समाज ने सामान्य मान लिया था, उसे पहली बार राष्ट्रीय प्राथमिकता मिली।
स्वच्छ भारत अभियान ने केवल सफाई का संदेश नहीं दिया, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों को शौचालय की सुविधा भी उपलब्ध कराई। ग्रामीण महिलाओं के लिए यह सुविधा सम्मान, सुरक्षा और गरिमा से जुड़ी आवश्यकता थी, जिसे लंबे समय तक पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली थी। इज्जत घर के रूप में पहचाने जाने वाले इन शौचालयों ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव किया।
इसी प्रकार हर घर बिजली अभियान ने दूर-दराज के गाँवों तक रोशनी पहुँचाई। जिन घरों में पीढ़ियों से लालटेन जलती थी, वहाँ पहली बार बिजली का बल्ब जला। प्रधानमंत्री आवास योजना ने झोपड़ी से पक्के घर तक की यात्रा को गति दी। जल जीवन मिशन ने नल से जल पहुँचाकर ग्रामीण महिलाओं को प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने की कठिनाई से राहत दिलाने का प्रयास किया। इन योजनाओं का महत्व आँकड़ों में नहीं, बल्कि उन करोड़ों परिवारों के जीवन में दिखाई देता है जिनके लिए ये सुविधाएँ पहली बार उपलब्ध हुईं।
यही वह बिंदु है जहाँ मोदी की लोकप्रियता का वास्तविक आधार दिखाई देता है। उन्होंने विकास को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से जोड़ा। जिन लोगों ने पहली बार घर में शौचालय देखा, बैंक खाता खुलवाया, गैस चूल्हा जलाया, बिजली का प्रकाश देखा और पक्का घर पाया, उनके लिए ये योजनाएँ जीवन में प्रत्यक्ष परिवर्तन का अनुभव हैं।
सामाजिक क्षेत्र में भी अनेक ऐसे निर्णय हुए जिन्हें समर्थक लंबे समय से अपेक्षित सुधार मानते हैं। तीन तलाक की व्यवस्था का अंत मुस्लिम महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के प्रश्न से जुड़ा था। इस निर्णय को अनेक महिलाओं ने सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा।
इसके साथ ही सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में भी परिवर्तन दिखाई दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास और महाकाल लोक का विस्तार करोड़ों भारतीयों के लिए सांस्कृतिक अस्मिता और आस्था के सम्मान के प्रतीक बने।
अनुच्छेद 370 को हटाने का निर्णय समर्थकों के अनुसार राष्ट्रीय एकात्मता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने एक देश, एक संविधान की अवधारणा को बल दिया।
आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, वोकल फॉर लोकल, मुद्रा योजना, कौशल विकास अभियान और पूर्वोत्तर राज्यों के विकास जैसे प्रयासों ने विकास को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास किया। किसान सम्मान निधि ने छोटे किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रदान की। प्रधानमंत्री जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों गरीबों, किसानों और मजदूरों के बैंक खाते खोलकर सरकारी सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की व्यवस्था विकसित हुई, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई। मात्र 12 रुपये वार्षिक प्रीमियम पर दो लाख रुपये के दुर्घटना बीमा जैसी योजनाओं ने पहली बार गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों को भी न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा का भरोसा दिया। आयुष्मान भारत योजना ने गरीब परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा दिया। वरिष्ठ नागरिकों को भी इस सुरक्षा कवच से जोड़ने का प्रयास हुआ।
इन सभी योजनाओं और निर्णयों के पीछे एक साझा सूत्र दिखाई देता है-जनभावनाओं और जनआवश्यकताओं के साथ संवाद। यही कारण है कि मोदी की लोकप्रियता केवल चुनावी सफलता का विषय नहीं है। उसके पीछे एक गहरा सामाजिक मनोविज्ञान कार्य करता है।
वास्तव में किसी भी नेतृत्व की सबसे बड़ी शक्ति उसका पद नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। चुनाव रणनीति से जीते जा सकते हैं, किंतु जनविश्वास निरंतर कार्य और संवेदनशीलता से अर्जित होता है। जब नागरिक को लगता है कि शासन उसकी समस्याओं को समझता है और उसके जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है, तब नेतृत्व जनविश्वास का प्रतीक बन जाता है।
नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को समझने के लिए इसी बिंदु को समझना आवश्यक है। देश का एक बड़ा वर्ग यह अनुभव करता है कि मोदी उसकी आकांक्षाओं, भावनाओं और आवश्यकताओं के साथ खड़े हैं। उसे लगता है कि शासन उसकी समस्याओं को सुनने और समझने वाली व्यवस्था बना है। यही भावना विश्वास को जन्म देती है।
लोकतंत्र में जनता उस व्यक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करती है जो उसके जीवन को समझता हुआ दिखाई देता है। प्यासा ही पानी का मूल्य समझता है और भूख की पीड़ा झेलने वाला ही रोटी की कीमत पहचानता है। यही कारण है कि मोदी की संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि भी उनकी जनस्वीकृति का एक महत्वपूर्ण आधार बनती है।
पिछले वर्षों में भारत ने वैश्विक मंच पर अपने आत्मविश्वास को नए रूप में व्यक्त किया है। समर्थकों का मानना है कि राष्ट्र ने अपने सांस्कृतिक आत्मसम्मान और राष्ट्रीय स्वाभिमान को नए आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्ति दी है। उनके लिए मोदी इसी आत्मविश्वास के प्रतीक हैं।
शायद यही कारण है कि एक दशक से अधिक समय बाद भी देश का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा दिखाई देता है। उसका समर्थन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि विश्वास का समर्थन है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता भी यही है कि शासन जनता के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में दिखाई दे और उसे यह विश्वास हो कि सत्ता उसके साथ खड़ी है। यही वह आधार है जिस पर नरेंद्र मोदी की जनप्रियता और जनविश्वास की इमारत खड़ी दिखाई देती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)