दिल्ली के निजी स्कूलों की बेलगाम फीस वृद्धि: अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ?
प्रकाशित: 16-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
-आदित्य नरेन्द्र
दिल्ली में हर नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ निजी स्कूलों की फीस वृद्धि एक बड़ा विवाद बन जाती है। इस वर्ष भी अनेक अभिभावकों ने शिकायत की है कि कुछ स्कूलों ने फीस में 30 प्रतिशत, 40 प्रतिशत और कहीं-कहीं 47 प्रतिशत या उससे अधिक तक की वृद्धि कर दी है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हाल के न्यायिक निर्णयों के बाद निजी गैर-सहायता प्राप्त (ळहग्dाd) स्कूलों को नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय (अं) से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2026 में स्पष्ट किया कि यदि कोई निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले अपनी संशोधित फीस घोषित करता है और दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 17(3) के तहत आवश्यक विवरण प्रस्तुत करता है, तो उसे फीस वृद्धि के लिए अं की पूर्व स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। अदालत ने यह भी कहा कि पूर्व अनुमति की आवश्यकता केवल तब होगी जब स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान फीस बढ़ाना चाहे। हालांकि यह फैसला स्कूलों को प्रशासनिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर गंभीर बहस जारी है। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए शिक्षा पहले ही महंगी होती जा रही है। जब एक ही वर्ष में फीस में 40 या 50 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाती है, तो कई परिवारों का पूरा घरेलू बजट प्रभावित हो जाता है। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ किराया, स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक आवश्यकताओं का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अचानक बड़ी फीस वृद्धि अभिभावकों को आर्थिक संकट में डाल सकती है।
फीस वृद्धि के समर्थकों का तर्क है कि स्कूलों की लागत भी लगातार बढ़ रही है। शिक्षकों के वेतन, बिजली-पानी, डिजिटल सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था, भवन रखरखाव और अन्य प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि हुई है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए संसाधनों में निवेश आवश्यक है और उसके लिए अतिरिक्त राजस्व की जरूरत पड़ती है। यह तर्क पूरी तरह असंगत नहीं कहा जा सकता। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या हर बड़ी फीस वृद्धि वास्तव में लागत वृद्धि के अनुपात में होती है? दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया है कि सरकार और नियामक संस्थाओं को यह अधिकार बना रहेगा कि वे लाभ कमाने की प्रवृत्ति, शिक्षा के व्यवसायीकरण या अनुचित शुल्क वसूली के मामलों की जांच कर सकें। अर्थात स्कूलों को पूर्ण छूट नहीं दी गई है। दिल्ली में फीस विनियमन को लेकर नई कानूनी व्यवस्था भी बनाई गई है। दिल्ली स्कूल शिक्षा (पारदर्शिता एवं फीस निर्धारण विनियमन) अधिनियम, 2025 का उद्देश्य फीस निर्धारण में पारदर्शिता लाना और मनमानी बढ़ोतरी को नियंत्रित करना है। हालांकि इसके ािढयान्वयन और कानूनी चुनौतियों को लेकर अभी भी विभिन्न अदालतों में सुनवाई जारी रही है और इसके लागू होने को लेकर कई चरणों में बदलाव हुए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की वित्तीय आवश्यकताओं और अभिभावकों की भुगतान क्षमता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यदि फीस बढ़ानी ही है, तो उसका विस्तृत औचित्य सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अभिभावकों को यह जानने का अधिकार है कि अतिरिक्त राशि किस मद में खर्च की जाएगी। पारदर्शिता जितनी बढ़ेगी, विवाद उतने ही कम होंगे। शिक्षा एक सेवा भर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि स्कूल फीस बढ़ा सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या फीस वृद्धि न्यायसंगत, पारदर्शी और अभिभावकों की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप है। जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ फीस वृद्धि का विवाद जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।
दिल्ली में हर नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ निजी स्कूलों की फीस वृद्धि एक बड़ा विवाद बन जाती है। इस वर्ष भी अनेक अभिभावकों ने शिकायत की है कि कुछ स्कूलों ने फीस में 30 प्रतिशत, 40 प्रतिशत और कहीं-कहीं 47 प्रतिशत या उससे अधिक तक की वृद्धि कर दी है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हाल के न्यायिक निर्णयों के बाद निजी गैर-सहायता प्राप्त (ळहग्dाd) स्कूलों को नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय (अं) से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2026 में स्पष्ट किया कि यदि कोई निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले अपनी संशोधित फीस घोषित करता है और दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 17(3) के तहत आवश्यक विवरण प्रस्तुत करता है, तो उसे फीस वृद्धि के लिए अं की पूर्व स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। अदालत ने यह भी कहा कि पूर्व अनुमति की आवश्यकता केवल तब होगी जब स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान फीस बढ़ाना चाहे। हालांकि यह फैसला स्कूलों को प्रशासनिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर गंभीर बहस जारी है। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए शिक्षा पहले ही महंगी होती जा रही है। जब एक ही वर्ष में फीस में 40 या 50 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाती है, तो कई परिवारों का पूरा घरेलू बजट प्रभावित हो जाता है। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ किराया, स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक आवश्यकताओं का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अचानक बड़ी फीस वृद्धि अभिभावकों को आर्थिक संकट में डाल सकती है।
फीस वृद्धि के समर्थकों का तर्क है कि स्कूलों की लागत भी लगातार बढ़ रही है। शिक्षकों के वेतन, बिजली-पानी, डिजिटल सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था, भवन रखरखाव और अन्य प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि हुई है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए संसाधनों में निवेश आवश्यक है और उसके लिए अतिरिक्त राजस्व की जरूरत पड़ती है। यह तर्क पूरी तरह असंगत नहीं कहा जा सकता। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या हर बड़ी फीस वृद्धि वास्तव में लागत वृद्धि के अनुपात में होती है? दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया है कि सरकार और नियामक संस्थाओं को यह अधिकार बना रहेगा कि वे लाभ कमाने की प्रवृत्ति, शिक्षा के व्यवसायीकरण या अनुचित शुल्क वसूली के मामलों की जांच कर सकें। अर्थात स्कूलों को पूर्ण छूट नहीं दी गई है। दिल्ली में फीस विनियमन को लेकर नई कानूनी व्यवस्था भी बनाई गई है। दिल्ली स्कूल शिक्षा (पारदर्शिता एवं फीस निर्धारण विनियमन) अधिनियम, 2025 का उद्देश्य फीस निर्धारण में पारदर्शिता लाना और मनमानी बढ़ोतरी को नियंत्रित करना है। हालांकि इसके ािढयान्वयन और कानूनी चुनौतियों को लेकर अभी भी विभिन्न अदालतों में सुनवाई जारी रही है और इसके लागू होने को लेकर कई चरणों में बदलाव हुए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की वित्तीय आवश्यकताओं और अभिभावकों की भुगतान क्षमता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यदि फीस बढ़ानी ही है, तो उसका विस्तृत औचित्य सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अभिभावकों को यह जानने का अधिकार है कि अतिरिक्त राशि किस मद में खर्च की जाएगी। पारदर्शिता जितनी बढ़ेगी, विवाद उतने ही कम होंगे। शिक्षा एक सेवा भर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि स्कूल फीस बढ़ा सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या फीस वृद्धि न्यायसंगत, पारदर्शी और अभिभावकों की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप है। जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ फीस वृद्धि का विवाद जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।