वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

नाविकों के बहाने भारत को युद्ध में झोंकने का षड्यंत्र

प्रकाशित: 15-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
अतिआधुनिकता की चकाचौंध में अंधे हो चुके लोगों के लिए विदेशी संस्कृति आदर्श बनती जा रही है। पढाई के लिए, नौकरी के लिए, व्यापार के लिए या फिर घूमने-फिरने के लिए सात समुन्दर पार जाने वालों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में खासा इजाफा हुआ है। स्वयं की मर्जी से विदेश जाने वाले जब किसी विपत्ति में फंस जाते हैं तब वे तथा उनके परिवारजनों द्वारा देश की सरकार पर सुरक्षित वापिसी के लिए दबाव बनाया जाता है। ऐसे में यह कहना उपयुक्त होगा कि भारत में ऐसा कोई संवैधानिक प्राविधान नहीं है जो स्वयं की मर्जी से विदेश जाने वालों को सुरक्षा तथा जोखिम सहायता की गारंटी देता हो परन्तु मानवीय संवेदनाओं से जुडी सांस्कृतिक विरासत के कारण हर बार राष्ट्र की सरकारें अपने भागीरथी प्रयास करतीं रहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या फिर ईरान-अमेरिका जंग का दौर। अनेक उदाहरण इसके जीवन्त कथानक हैं। वर्तमान में भारतीय नाविकों की मौतों को लेकर चारों ओर हायतौबा मच रही है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने विगत 13 अप्रैल से होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी की है। तब से अभी तक अमेरिकी सेना ने निर्देशों का पालन न करने वाले कुल नौ जहाजों को निष्क्रिय किया गया जबकि दिशा बदलने पर मजबूर हुए जहाजों की संख्या 135 है। वहीं मानवीय सहायता से जुड़े 42 जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई। विगत दिनों अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने तीन ऐसे वाणिज्यिक जहाजों पर हमले किए, जिन पर भारतीय नाविक सवार थे। मैरीवक्स पर 8 जून को, एमटी सेटेबेलो पर 10 जून को तथा एमटी जलवीर पर 11 जून को हमला किया गया। मारिवेक्स नामक जहाज का पंजीकरण पनामा ध्वज के साथ कराया गया था जबकि एमटी सेटेबेलो नामक जहाज का पंजीकरण पलाऊ ध्वज के साथ कराया गया था। एमटी जलवीर नामक जहाज का गिनी-बिसाऊ ध्वज के साथ पंजीकृत था। इन हमलों में भारतीय नाविकों की मृत्यु होने पर मानवीय संवेदनाओं के आधार पर भारत सरकार ने गहरी चिंता ही व्यक्ति नहीं की बल्कि विदेश मंत्रालय द्वारा अमेरिका के सामने कड़ा विरोध भी दर्ज कराया था। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि ये जहाज ईरान के कब्जे वाले हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होते हुए ईरानी तेल का परिवहन करने की कोशिश में लगे हुए थे और अमेरिकी सुरक्षा बलों द्वारा दी गई चेतावनी व निर्देशों का पालन नहीं कर रहे थे। जब चालक दल ने अमेरिकी बलों के निर्देशों का बार-बार पालन नहीं किया, तो एक अमेरिकी विमान ने जहाज के इंजन रूम को निशाना बनाते हुए हेलफायर मिसाइलें दागीं और जहाज को निष्क्रिय कर दिया। किसी भी जहाज पर भारत का झंडा नहीं था। ऐसे में यह प्रश्न विचारणीय हो जाता है कि किसी अन्य देश के झंडे तले काम करने वालों को केवल भारतीय होने के नाते वहां की तात्कालिक परिस्थितियों के विपरीत कार्य करने की छूट क्यों मिलना चाहिए। एक रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी में इस समय 18 हजार से अधिक भारतीय नाविक फंसे हुए हैं जो भारतीय झंडे से इतर पंजीकृत जहाजों का परिवहन सम्हाले हुए हैं। तो क्या भारतीय नाविकों को नौकरी देने की आड़ में विदेशी जहाज कम्पनियां डीप स्टेट के किसी षड्यंत्र को अंजाम तक पहुंचाने में जुटीं हैं। इतिहास गवाह है कि विदेशों से पढाई करके लौटने वाले अनेक छात्रों ने कट्टरता, राष्ट्रद्रोह और आन्तरिक कलह के अनेक हथियारों से मां भारती को लहूलुहान किया है। देश की सांस्कृतिक विरासत को नस्तनाबूत किया है। आाढान्ताओं की तर्ज पर देश को लूटा है और लूटी हुई सम्पत्तियों को विदेशों में जमा किया है। अपनी धरती से पढाई के लिए जाने वालों को अनेक राष्ट्रों में निर्धारित पाढ्पाम के अलावा वहां की सरकारी मंशा के अनुरूप विशेष नकारात्मक प्रशिक्षण देने वाले की भी व्यवस्था की गई है ताकि वे देश वापिसी के बाद उस विशेष नकारात्मक प्रशिक्षण का व्यवहारिक स्वरूप प्रस्तुत कर सकें। कहीं कट्टरपंथियों की जमातें छात्रों को मजहब के नाम पर, पैसों के लालच पर या फिर सुखद सपनों के आधार पर अपनी कठपुतली बना लेतीं हैं तो कहीं डीप स्टेट की जहरीली मानसिकता का लुभावना स्वरूप विद्यार्थियों को वैभवशाली भविष्य, सम्मानजनक जीवन और विशिष्ट पहचान की मृगमारीचिका में फंसा लेता है। परदेश से आधुनिकता के नाम पर नग्नता, अश्लीलता और विलासता की नूतन परिभाषायें सीखकर लौटने वालों के लिए जीवन का अर्थ केवल और केवल स्वयं तक ही सीमित होकर रह जाता है। दूसरी ओर कारोबारियों का अपना अलग ही गणित है। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में मानक गुणवत्ता को ताक में रखकर निर्यात करने में जुट जाते हैं। जब जांच की तलवार लटकती है तब बेइज्जती का ठीकरा देश के नाम पर फूटता है। फलों का निर्यात का लौटना इसी हार का एक पुष्प है। मनमाने तरीकों से विदेश पहुंचकर नौकरी करने वालों का जब वहां उत्पीड़न होने लगता है तब उन्हें अपने देश की सरकार याद आती है। यहां यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि ज्यादा लाभ के लालच में विदेशियों की गुलामी करने वालों पर जब शोषण, कष्ट और उत्पीड़न की मार पड़ती है तब वे भारत की सरकार पर दबाव बनाकर अपने पौ बारह करने की कोशिशें शुरू कर देते हैं। वर्तमान स्थितियों की गहन समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय नाविकों के बहाने भारत को युद्ध में झोंकने का षडयंत्र करने वाले डीप स्टेट ने इन दिनों एक साथ अनेक मोर्चे खोल दिये हैं। अमेरिकी धरती से प्रायोजित नेता का पदार्पण, जेन-जी को उकसाकर भीड़तंत्र का निर्माण करना, जातिवाद-सम्प्रदायवाद-क्षेत्रवाद-भाषावाद-पूंजीवाद जैसे कारकों को हवा देना, धार्मिक कट्टरता, पडोसी देशों के साथ सीमा-विवाद, राजनैतिक अस्थिरता जैसे अनगिनत विस्फोटक कारक तेजी से सक्रिय हो चुके हैं जिन्हें आम आवाम की जागरूकता के बिना रोक पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।