सुधार एक्सप्रेस की गति
प्रकाशित: 15-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस की यात्रा पर हैं जहां उन्होंने रविवार को ‘भारत इनोवेट्स' कार्यक्रम को संबोधित किया। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने उच्च तकनीक, रक्षा और नवाचार जैसे कई अहम क्षेत्रों में अपने सरकार द्वारा किए गए सुधारों का उल्लेख किया और बल देकर कहा कि भारत की सुधार एक्सप्रेस रुकेगी नहीं बल्कि चलती रहेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि भारत एक दीर्घकालिक भविष्य के लिए कर रहा है और यह नवाचार दुनिया के लिए कर रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री का यह कहना कि इस कार्यक्रम में भारत, फ्रांस और अन्य देशों के शीर्ष नवाचार स्टार्टअप और वेंचर कैपिटल फंड को साथ लाना है।
दरअसल भारत के मित्र राष्ट्रों में रूस तो सबसे आगे है ही किन्तु नाटो संगठन का सदस्य होते हुए भी फ्रांस ने जिस तरह मित्रता निभाया है, वह भी कम उल्लेखनीय नहीं है। रूस तो भारत के साथ सापेक्षता के संदर्भ में रहा है क्योंकि अमेरिका ने पाकिस्तान को समर्थन दिया तो भारत के लिए आवश्यक हो गया कि वह रूस के साथ रक्षा समझौते करे और उससे युद्धक सैन्य सामग्री खरीदे लेकिन फ्रांस ने भारत के साथ शुरू से ही सहयोग किया है। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के पहले जहां अमेरिका कूटनीतिक एवं सामरिक देकर पाकिस्तान को पीड़ित साबित करके समूचे यूरोप में भारत के खिलाफ माहौल बना रहा था, उस समय भी फ्रांस ने भारत को आश्वासन दिया था कि वह किसी भी हालत में भारत के खिलाफ न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में खड़ा होगा और किसी भी हालत में भारत के खिलाफ सैन्य मदद भी पाकिस्तान को नहीं करेगा। फ्रांस ने अपना वादा निभाया और उसने पाकिस्तान के पक्ष में अमेरिका द्वारा लाए गए सुरक्षा परिषद के किसी प्रस्ताव का समर्थन किया ही नहीं। फिर 1980 में जब अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 दिया तो भारतीय वायु सेना और सरकार ने फ्रांस से मिराज-2000 खरीदने का फैसला किया। फ्रांस ने तत्काल भारत को मिराज-2000 युद्धक विमान उपलब्ध कराने की सहमति व्यक्त की। जिस वक्त फ्रांस ने भारत के साथ खड़ा होने का फैसला लिया था, वह शीत युद्ध काल था। यूरोप के ज्यादातर देश अमेरिका के साथ खड़े थे और तत्कालीन सोवियत संघ को अपना घोषित शत्रु मानते थे। भारत अपनी रणनीतिक विवशताओं के कारण सोवियत संघ के साथ था इसलिए अमेरिका के साथी देश भारत के पक्ष में दिखने से डरते थे। लेकिन फ्रांस ने भारत के साथ हमेशा मैत्री संबंधों को महत्व दिया और मित्र धर्म के मार्ग पर अडिग रहा। आज फ्रांस पहले से ज्यादा भारत के साथ सहयोग कर रहा है। भारत में जो भी रक्षा उपकरण या युद्धक विमान बनाने का समझौता कर रहा है, उसको भारत के शत्रु देश को नहीं दे रहा है। एक सच्चे मित्र की यही पहचान होती है। इस कसौटी पर रूस पहले ही खरा उतर चुका है। रूस चीन और पाकिस्तान को वह विमान या युद्धक उपकरण देता ही नहीं जिससे भारत को चुनौती मिलने की आशंका हो। यही काम अब फ्रांस ने शुरू कर दिया। इसलिए क्योंकि फ्रांस की मैत्री भारत के साथ मजबूत विश्वसनीयता की नींव पर खड़ी है।
भारत ने अमेरिका से व्यापारिक संबंधों में चुनौती मिलने के बाद यूरोपियन यूनियन और कई यूरोपीय देशों से द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों की नई शुरुआत की। इनमें मुक्त व्यापार समझौता यानि एफटीए प्रमुखता से शामिल है। प्रधानमंत्री ने इसीलिए फ्रांस के साथ दुनिया के दूसरे देशों के साथ नवाचार स्टार्टअप की बात की।
बहरहाल भारत ने अब अपने विकास के सारे विकल्पों एवं संभावनाओं को इतना विस्तारित कर लिया है कि अब किसी भी हालत में सुधार प्रक्रिया को स्थगित करना संभव नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि खुले बाजार और आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को वैश्विक मानदण्डों के अनुरूप तेजी से आगे बढ़ाने का प्रयास मोदी सरकार जारी रखेगी। जरूरत इस बात की है कि इसकी गति ऐसी न हो कि उपभोक्ता किसी भी दृष्टि से असुविधा महसूस न करें। सुधार हो किन्तु उसके केन्द्र में उपभोक्ता का हित अनिवार्य हो। विकास हो किन्तु उपभोक्ता केन्द्रित हो।
दरअसल भारत के मित्र राष्ट्रों में रूस तो सबसे आगे है ही किन्तु नाटो संगठन का सदस्य होते हुए भी फ्रांस ने जिस तरह मित्रता निभाया है, वह भी कम उल्लेखनीय नहीं है। रूस तो भारत के साथ सापेक्षता के संदर्भ में रहा है क्योंकि अमेरिका ने पाकिस्तान को समर्थन दिया तो भारत के लिए आवश्यक हो गया कि वह रूस के साथ रक्षा समझौते करे और उससे युद्धक सैन्य सामग्री खरीदे लेकिन फ्रांस ने भारत के साथ शुरू से ही सहयोग किया है। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के पहले जहां अमेरिका कूटनीतिक एवं सामरिक देकर पाकिस्तान को पीड़ित साबित करके समूचे यूरोप में भारत के खिलाफ माहौल बना रहा था, उस समय भी फ्रांस ने भारत को आश्वासन दिया था कि वह किसी भी हालत में भारत के खिलाफ न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में खड़ा होगा और किसी भी हालत में भारत के खिलाफ सैन्य मदद भी पाकिस्तान को नहीं करेगा। फ्रांस ने अपना वादा निभाया और उसने पाकिस्तान के पक्ष में अमेरिका द्वारा लाए गए सुरक्षा परिषद के किसी प्रस्ताव का समर्थन किया ही नहीं। फिर 1980 में जब अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 दिया तो भारतीय वायु सेना और सरकार ने फ्रांस से मिराज-2000 खरीदने का फैसला किया। फ्रांस ने तत्काल भारत को मिराज-2000 युद्धक विमान उपलब्ध कराने की सहमति व्यक्त की। जिस वक्त फ्रांस ने भारत के साथ खड़ा होने का फैसला लिया था, वह शीत युद्ध काल था। यूरोप के ज्यादातर देश अमेरिका के साथ खड़े थे और तत्कालीन सोवियत संघ को अपना घोषित शत्रु मानते थे। भारत अपनी रणनीतिक विवशताओं के कारण सोवियत संघ के साथ था इसलिए अमेरिका के साथी देश भारत के पक्ष में दिखने से डरते थे। लेकिन फ्रांस ने भारत के साथ हमेशा मैत्री संबंधों को महत्व दिया और मित्र धर्म के मार्ग पर अडिग रहा। आज फ्रांस पहले से ज्यादा भारत के साथ सहयोग कर रहा है। भारत में जो भी रक्षा उपकरण या युद्धक विमान बनाने का समझौता कर रहा है, उसको भारत के शत्रु देश को नहीं दे रहा है। एक सच्चे मित्र की यही पहचान होती है। इस कसौटी पर रूस पहले ही खरा उतर चुका है। रूस चीन और पाकिस्तान को वह विमान या युद्धक उपकरण देता ही नहीं जिससे भारत को चुनौती मिलने की आशंका हो। यही काम अब फ्रांस ने शुरू कर दिया। इसलिए क्योंकि फ्रांस की मैत्री भारत के साथ मजबूत विश्वसनीयता की नींव पर खड़ी है।
भारत ने अमेरिका से व्यापारिक संबंधों में चुनौती मिलने के बाद यूरोपियन यूनियन और कई यूरोपीय देशों से द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों की नई शुरुआत की। इनमें मुक्त व्यापार समझौता यानि एफटीए प्रमुखता से शामिल है। प्रधानमंत्री ने इसीलिए फ्रांस के साथ दुनिया के दूसरे देशों के साथ नवाचार स्टार्टअप की बात की।
बहरहाल भारत ने अब अपने विकास के सारे विकल्पों एवं संभावनाओं को इतना विस्तारित कर लिया है कि अब किसी भी हालत में सुधार प्रक्रिया को स्थगित करना संभव नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि खुले बाजार और आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को वैश्विक मानदण्डों के अनुरूप तेजी से आगे बढ़ाने का प्रयास मोदी सरकार जारी रखेगी। जरूरत इस बात की है कि इसकी गति ऐसी न हो कि उपभोक्ता किसी भी दृष्टि से असुविधा महसूस न करें। सुधार हो किन्तु उसके केन्द्र में उपभोक्ता का हित अनिवार्य हो। विकास हो किन्तु उपभोक्ता केन्द्रित हो।