प्राचीन भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा वर्तमान शिक्षा में इसकी प्रासंगिकता
प्रकाशित: 22-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रो. सरोज शर्मा
प्राचीन भारत विश्व की उन सभ्यताओं में से एक है जिन्होंने मानवता के लिए अमूल्य वैज्ञानिक और तकनीकी धरोहर प्रदान की है। आधुनिक इंजीनियरिंग की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 ई.पू.) द्वारा विकसित उत्कृष्ट शहरी नियोजन, जल निकासी व्यवस्था और परिष्कृत धातु-कार्य कौशल से मानी जा सकती है। कृषि प्रौद्योगिकी, धातु विज्ञान और खगोलीय गणनाओं के सबसे प्रारंभिक उदाहरण वैदिक युग में मिलते हैं। इन नवाचारों ने बाद में एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक परंपरा की स्थापना की। ऋग्वेद से लेकर आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक, वराह मिहिर और भास्करचार्य तक, ज्ञान की यह परंपरा निरंतर विकसित होती रही। प्राचीन काल में भारत में नालंदा, पामशिला और तक्षशिला के प्रसिद्ध भारतीय महाविहारों ने दर्शन, खगोल विज्ञान, गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में ज्ञान का प्रसार किया। आर्यभट की आर्यभटीय (499 ईस्वी) ने त्रिकोणमिति, सूर्यकेंद्रीय सिद्धांत और पृथ्वी की परिधि (39,968 किमी) के सूत्र दिए। भास्करचार्य की लीलावती ने बीजगणित की नींव रखी, जबकि ब्रह्मगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं के नियम का प्रतिपादन किया। सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक शल्य चिकित्सा और मोतियाबिंद शल्य चिकित्सा पर प्रथम चिकित्सा ग्रंथ है। जबकि चरक संहिता आंतरिक विकारों का एक विश्वकोश है।
नागार्जुन द्वारा रचित रसायन शास्त्र औषधियों के निर्माण की विधि सिखाता है। खगोल विज्ञान में, सूर्य सिद्धांत द्वारा ग्रहण और ग्रहों की गति की सटीक गणना की जाती है। वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका में पाँच खगोलीय प्रणालियों का संश्लेषण किया गया है। दिल्ली का लौह स्तंभ (400 ई.) धातु विज्ञान के जंग-रहित इस्पात का एक अतुल्य उदाहरण है। सूर्यपथ, वायु की दिशा एवं पंच तत्वों का संतुलन वास्तुशास्त्र के आधार हैं।
प्राचीन भारतीय विज्ञान की वर्तमान शिक्षा में प्रासंगिकता -21वीं सदी में जहां एक और चैट जीपीटी और जेनरेटिव एआई जैसी कृतिम बुद्धिमत्ता, निजी अंतरिक्ष उड़ानें, एआर और वीआर जैसी इमर्सिव तकनीक, स्मार्ट फोन, 5जी, सोशल मीडिया, ड्रोन, ह्यूमनॉइड रोबोट, गेमिंग, मशीन लर्निंग, 3-डी प्रिंटिंग ने प्राय: मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। वहीं दूसरी और यह सदी पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ, और नैतिक मूल्यों के अभाव से जूझ रही है।
यह न केवल एक गंभीर चिंतन का विषय है, बल्कि आज के समय में मनुष्य जीवन के अस्तित्व पर भी एक प्रश्न है। ऐसी परिस्थिति हमें हमारे प्राचीन भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर पुन: विचार करने को प्रेरित करती है।
आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य शिक्षा - आयुर्वेद विशेषत: मानव जीवन, पशु-पशुओं और पौधों का संरक्षण करता है। आयुर्वेद, भारतीय चिकित्सा विज्ञान की पारंपरिक प्रणाली है, जिसमें मन और शरीर से संबन्धित ज्ञान संमिलित है। आयुर्वेद स्वस्थ जीवन शैली का संपूर्ण विज्ञान है।इसका मुख्य सिद्धांत है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोग को दूर करना। वहीं इसकी प्रासंगिकता 21वीं सदी में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
आयुर्वेदिक शिक्षा के अंतर्गत दिनचर्या को महत्व दिया जाता है जिसमें ब्रह्म मुहूर्त में जागना, व्यायाम, स्नान, चिंतन आदि शामिल है। यह शिक्षा छात्रों को अनुशासित और स्वस्थ बनाती है।
ऋतुचर्या में वर्ष में 6 ऋतुएँ- शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद एवं हेमन्त, ऋतुचर्या के अंतर्गत आती हैं जो दोष सन्तुलन में सहायक हैं। जैसे ग्रीष्म ऋतु के दौरान शरीर में पित्त और वात की ऊर्जा में वृद्धि होती है। अत: इस समय मीठे और ठंडे भोजन जैसे फलों का सेवन करना चाहिए। अपने जलस्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण करना चाहिए। प्राचीन भारत में आहार भी विज्ञान पर आधारित था। यह दोषों को संतुलित करने के लिए षड्रस रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) के उचित सेवन की शिक्षा देता है। चरक संहिता में कहा गया है- रोग सर्वे मंदाग्नौ अर्थात दुर्बल पाचन सभी रोगों का मूल कारण है। इसलिए अग्नि की शक्ति के आधार पर भोजन का सेवन संयम से करना चाहिए।
आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य का भी वर्णन है। आयुर्वेद मानसिक प्रकृति का वर्णन करने के लिए सत्व, रजस और तमस गुणों का उपयोग करता है। इससे मानसिक संतुलन और व्यक्तित्व विकास को बढ़ावा मिलता है। आज लाखों लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं, जो महामारी का रूप ले चुकी हैं और देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर दबाव डाल रही हैं। भारत में मधुमेह से पीड़ित वयस्कों का स्थान वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे अधिक है। वर्तमान स्थिति में आयुर्वेद सिद्धांतों की शिक्षा, स्वस्थ जीवनशैली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।
आयुर्वेद में जीवनशैली से जुड़ी इन सभी बीमारियों जैसे मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह का समाधान दोष संतुलन के द्वारा दिनचर्या, ऋतुचर्या और त्रयोपस्तंभ के माध्यम से किया जाता है। आज आयुर्वेद को वैश्विक एवं राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। विश्व की 80-90ज्ञ् आबादी आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर निर्भर है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (sंप्ध्) इन प्रणालियों को स्वास्थ्य सेवा के लिए आवश्यक मानता है। भारत में डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना करना समकालीन महामारियों में आयुर्वेद के योगदान का प्रमाण है।
2017 से, एम्स ऋषिकेश जैसे एम्स संस्थानों के आयुष विभाग, त्रिदोष सिद्धांतों पर आधारित आयुर्वेद के साथ समकालीन चिकित्सा को सम्मिलित कर जीवनशैली संबंधी विकारों का उपचार कर रहे हैं। 2017 से, नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एम्स) मॉडल के अनुरूप शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए पूरी तरह से कार्यरत है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद और अन्य संगठन इन प्रयासों को संस्थागत रूप दे रहे हैं।
आधुनिक तनाव और प्राचीन योग के रूप में समाधान - आजकल बच्चे कई प्रकार के तनाव से गुजर रहे हैं, जिसके कारण उनका मन चिंतित रहता है। इनमें परीक्षाओं और सोशल मीडिया का दबाव मुख्य हैं। महर्षि पतंजलि के द्वितीय सूत्र- योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: के अनुसार चित्त का निरोध ही योग है। अर्थात्, मन की चंचलता को नियंत्रित करने से ही मन की शांति प्राप्त होती है। एनईपी 2020 के अनुसर भी पढने के साथ स्वयं को समझना आवश्यक है।
प्राचीन भारतीय परंपराएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण शामिल है। वेद, उपनिषद, भगवद् गीता और आयुर्वेद कुछ ऐसे प्राचीन ग्रंथ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करते हैं, मानसिक शांति को प्रोत्साहित करते हैं और संतुलित जीवन की ओर मार्गदर्शन करते हैं। उदाहरण के लिए, आधुनिक ध्वनि चिकित्सा और माइंडफुलनेस-आधारित त अथर्ववेद में मंत्रों और उपचार करने वाली ध्वनियों के शांत प्रभाव के वर्णन से संबंधित हैं।
महर्षि पतंजलि के योग सूत्र में अष्टांग योग प्रणाली - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक कल्याण का एक एकीकृत विज्ञान है। यह व्यक्ति के संपूर्ण विकास का द्वार है।
योग शिक्षा शारीरिक रूप से लचीलापन और शक्ति बढ़ाकर, रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करके और श्वसन एवं पाचन तंत्र में सुधार करके स्वास्थ्य में वृद्धि करती है। मानसिक स्तर पर, यह तनाव और चिंता को कम करती है। एकाग्रता, स्मृति, भावनात्मक संतुलन और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यह आत्मज्ञान और आत्म-साक्षात्कार, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और करुणा एवं सहानुभूति के विकास को बढ़ावा देती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून, 2015 को भारत में मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को 177 देशों का समर्थन मिलना योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। भारत सरकार द्वारा स्कूलों में योग शिक्षा को अनिवार्य किया गया है। हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भी योग-ध्यान अनुसंधान का विकास हुआ है।
आधुनिक सतत विकास एवं प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण - विज्ञान और प्रौद्योगिकी में असीम सफलता के बावजूद, आधुनिक समय में हम पर्यावरण संकट और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं। इसका एक कारण है छात्रों में पर्यावरण के लिए सम्मान और सतत जीवनशैली से संबंधित जागरूकता की कमी होना। प्राचीन भारत में पर्यावरण को केवल वस्तु नहीं, बल्कि सजीव और चेतन के रूप में देखा जाता था। अथर्ववेद का मंत्र माता भूमि पुत्रो?हं पृथिव्याः बताता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतान हैं। अत: पृथ्वी की सुरक्षा हमारा आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्य है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की उल्लेखनीय उपलब्धियां - मंगलयान (2014), चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 (2023) - पारंपरिक भारतीय गणित और खगोल विज्ञान के प्रेरक प्रभाव का एक जीवंत उदाहरण हैं।
उदाहरणार्थ, आर्यभट्ट का पाँचवीं शताब्दी का आर्यभटीय में सूर्यकेंद्रित मॉडल और पृथ्वी की परिधि की गणना (3931.6 मील), जो आधुनिक समय में 3950 मील तक सटीक है। कुछ अन्य उदाहरण जैसे- ग्रहों की दीर्घवृत्ताकार गति और शून्य-दशमलव प्रणाली, वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका में ग्रहों की गति और भास्करचार्य की लीलावती और सिद्धांतशिरोमणि में ग्रहों की गणना समकालीन अंतरिक्ष गणनाओं का मूल हैं।
शिक्षा पाठ्यक्रम में प्राचीन खगोलशास्त्र के साथ आधुनिक खगोल विज्ञान का समावेष जैसे, 12 राशियों की खगोलीय गति का पारंपरिक सिद्धांत एवं आधुनिक केप्लर नियम विद्यार्थियों में गणितीय-खगोलीय चेतना जागृत करेगा। वहीं दूसरी तरफ भविष्य में इसरो जैसे राष्ट्रीय संस्थानों का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप स्टेम शिक्षा के साथ भारत की वैदिक-शास्त्राrय वैज्ञानिक विरासत को एकीकृत करके पुनर्स्थापित किया जाएगा। जो अगली पीढ़ी को स्वदेशी गौरव और वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए भी प्रेरित करेगा।
प्राचीन वास्तुशास्त्र और आधुनिक वास्तुकला - प्राचीन वास्तुशास्त्र, भवन निर्माण के वैज्ञानिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन है। यह सूर्य की गति, हवा की दिशा, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और पंच तत्वों के संतुलन के आधार पर प्राकृतिक प्रकाश, वायु-संचालन, ऊर्जा प्रवाह और पर्यावरणीय सामंजस्य सुनिश्चित करता है। आधुनिक वास्तुकला में इसका उपयोग ग्रीन बिल्डिंग, ऊर्जा-कुशल निर्माण, प्राकृतिक प्रकाश, एयर कंडीशनिंग, वर्षा जल संग्रहण और सौर ऊर्जा में किया जाता है। लीडरशिप इन एनर्जी एंड एनवायरनमेंटल डिज़ाइन)-प्रमाणित भवनों में, वास्तु के उत्तर-पूर्वी दिशा (ईशान कोण) से ऊर्जा खपत में 30ज्ञ् तक की कमी देखी गई है। आईआईटी खड़गपुर और अन्य संस्थानों में किए गए अध्ययनों के अनुसार, वास्तुशास्त्र की खुली आंगन प्रणाली (प्राकृतिक प्रकाश-वायुमंडल) ने सामयिक निष्क्रिय शीतलन की तुलना में 40ज्ञ् ऊर्जा बचत प्रदर्शित की है। स्थानीय संसाधनों के उपयोग से कार्बन फुटप्रिंट में कमी आई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 वास्तुकला पाठ्यक्रम में वास्तुशास्त्र को शामिल करने का समर्थन करती है। हरित प्रमाणन, सौर प्रणाली विश्लेषण और मंदिर/हवेली केस स्टडी छात्रों में सतत डिजाइन के प्रति जागरूकता बढ़ाएगी, जिससे शून्य-ऊर्जा और जलवायु-लचीली संरचनाओं के लिए वैज्ञानिक विरासत को पुनर्जीवित करके वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। स्कूल पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को सूर्यगणना सॉफ्टवेयर विश्लेषण एवं हरित प्रमाणन का अध्ययन कराया जाए। यह जलवायु अनुकूलन एवं शून्य ऊर्जा भवनों हेतु प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को पुनर्स्थापित कर वैश्विक स्थिरता लाने में मदद करेगा। प्राचीन भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी अतीत का एक अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक है। यह गणितीय अमूर्तता से लेकर सटीक शल्य चिकित्सा और उत्कृष्ट धातु विज्ञान तक, मानव प्रतिभा की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रदर्शित करती है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए अब इस विरासत को बुनियादी पाठ्पाम में शामिल करने की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य अतीत का अंधानुकरण या अवैज्ञानिक दावों का महिमामंडन करना नहीं, किन्तु विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों में निहित हो वैश्विक दृष्टिकोण के साथ शिक्षा प्रदान करना है। इससे बच्चों को यह समझने में मदद मिलेगी कि विज्ञान एक सार्वभौमिक मानवीय प्रयास है जिसमें उनके पूर्वजों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह उन्हें एक बहुविषयक, व्यापक और सतत दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। एक भारतीय छात्र केवल बुनियादी तथ्यों को ही नहीं सीख कर निरंतर ज्ञान प्राप्त करने और प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित होगा।
(लेखिका प्रख्यात शिक्षाविद् एवं वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति हैं।)
प्राचीन भारत विश्व की उन सभ्यताओं में से एक है जिन्होंने मानवता के लिए अमूल्य वैज्ञानिक और तकनीकी धरोहर प्रदान की है। आधुनिक इंजीनियरिंग की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 ई.पू.) द्वारा विकसित उत्कृष्ट शहरी नियोजन, जल निकासी व्यवस्था और परिष्कृत धातु-कार्य कौशल से मानी जा सकती है। कृषि प्रौद्योगिकी, धातु विज्ञान और खगोलीय गणनाओं के सबसे प्रारंभिक उदाहरण वैदिक युग में मिलते हैं। इन नवाचारों ने बाद में एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक परंपरा की स्थापना की। ऋग्वेद से लेकर आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक, वराह मिहिर और भास्करचार्य तक, ज्ञान की यह परंपरा निरंतर विकसित होती रही। प्राचीन काल में भारत में नालंदा, पामशिला और तक्षशिला के प्रसिद्ध भारतीय महाविहारों ने दर्शन, खगोल विज्ञान, गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में ज्ञान का प्रसार किया। आर्यभट की आर्यभटीय (499 ईस्वी) ने त्रिकोणमिति, सूर्यकेंद्रीय सिद्धांत और पृथ्वी की परिधि (39,968 किमी) के सूत्र दिए। भास्करचार्य की लीलावती ने बीजगणित की नींव रखी, जबकि ब्रह्मगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं के नियम का प्रतिपादन किया। सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक शल्य चिकित्सा और मोतियाबिंद शल्य चिकित्सा पर प्रथम चिकित्सा ग्रंथ है। जबकि चरक संहिता आंतरिक विकारों का एक विश्वकोश है।
नागार्जुन द्वारा रचित रसायन शास्त्र औषधियों के निर्माण की विधि सिखाता है। खगोल विज्ञान में, सूर्य सिद्धांत द्वारा ग्रहण और ग्रहों की गति की सटीक गणना की जाती है। वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका में पाँच खगोलीय प्रणालियों का संश्लेषण किया गया है। दिल्ली का लौह स्तंभ (400 ई.) धातु विज्ञान के जंग-रहित इस्पात का एक अतुल्य उदाहरण है। सूर्यपथ, वायु की दिशा एवं पंच तत्वों का संतुलन वास्तुशास्त्र के आधार हैं।
प्राचीन भारतीय विज्ञान की वर्तमान शिक्षा में प्रासंगिकता -21वीं सदी में जहां एक और चैट जीपीटी और जेनरेटिव एआई जैसी कृतिम बुद्धिमत्ता, निजी अंतरिक्ष उड़ानें, एआर और वीआर जैसी इमर्सिव तकनीक, स्मार्ट फोन, 5जी, सोशल मीडिया, ड्रोन, ह्यूमनॉइड रोबोट, गेमिंग, मशीन लर्निंग, 3-डी प्रिंटिंग ने प्राय: मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। वहीं दूसरी और यह सदी पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ, और नैतिक मूल्यों के अभाव से जूझ रही है।
यह न केवल एक गंभीर चिंतन का विषय है, बल्कि आज के समय में मनुष्य जीवन के अस्तित्व पर भी एक प्रश्न है। ऐसी परिस्थिति हमें हमारे प्राचीन भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर पुन: विचार करने को प्रेरित करती है।
आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य शिक्षा - आयुर्वेद विशेषत: मानव जीवन, पशु-पशुओं और पौधों का संरक्षण करता है। आयुर्वेद, भारतीय चिकित्सा विज्ञान की पारंपरिक प्रणाली है, जिसमें मन और शरीर से संबन्धित ज्ञान संमिलित है। आयुर्वेद स्वस्थ जीवन शैली का संपूर्ण विज्ञान है।इसका मुख्य सिद्धांत है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोग को दूर करना। वहीं इसकी प्रासंगिकता 21वीं सदी में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
आयुर्वेदिक शिक्षा के अंतर्गत दिनचर्या को महत्व दिया जाता है जिसमें ब्रह्म मुहूर्त में जागना, व्यायाम, स्नान, चिंतन आदि शामिल है। यह शिक्षा छात्रों को अनुशासित और स्वस्थ बनाती है।
ऋतुचर्या में वर्ष में 6 ऋतुएँ- शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद एवं हेमन्त, ऋतुचर्या के अंतर्गत आती हैं जो दोष सन्तुलन में सहायक हैं। जैसे ग्रीष्म ऋतु के दौरान शरीर में पित्त और वात की ऊर्जा में वृद्धि होती है। अत: इस समय मीठे और ठंडे भोजन जैसे फलों का सेवन करना चाहिए। अपने जलस्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण करना चाहिए। प्राचीन भारत में आहार भी विज्ञान पर आधारित था। यह दोषों को संतुलित करने के लिए षड्रस रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) के उचित सेवन की शिक्षा देता है। चरक संहिता में कहा गया है- रोग सर्वे मंदाग्नौ अर्थात दुर्बल पाचन सभी रोगों का मूल कारण है। इसलिए अग्नि की शक्ति के आधार पर भोजन का सेवन संयम से करना चाहिए।
आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य का भी वर्णन है। आयुर्वेद मानसिक प्रकृति का वर्णन करने के लिए सत्व, रजस और तमस गुणों का उपयोग करता है। इससे मानसिक संतुलन और व्यक्तित्व विकास को बढ़ावा मिलता है। आज लाखों लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं, जो महामारी का रूप ले चुकी हैं और देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर दबाव डाल रही हैं। भारत में मधुमेह से पीड़ित वयस्कों का स्थान वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे अधिक है। वर्तमान स्थिति में आयुर्वेद सिद्धांतों की शिक्षा, स्वस्थ जीवनशैली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।
आयुर्वेद में जीवनशैली से जुड़ी इन सभी बीमारियों जैसे मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह का समाधान दोष संतुलन के द्वारा दिनचर्या, ऋतुचर्या और त्रयोपस्तंभ के माध्यम से किया जाता है। आज आयुर्वेद को वैश्विक एवं राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। विश्व की 80-90ज्ञ् आबादी आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर निर्भर है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (sंप्ध्) इन प्रणालियों को स्वास्थ्य सेवा के लिए आवश्यक मानता है। भारत में डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना करना समकालीन महामारियों में आयुर्वेद के योगदान का प्रमाण है।
2017 से, एम्स ऋषिकेश जैसे एम्स संस्थानों के आयुष विभाग, त्रिदोष सिद्धांतों पर आधारित आयुर्वेद के साथ समकालीन चिकित्सा को सम्मिलित कर जीवनशैली संबंधी विकारों का उपचार कर रहे हैं। 2017 से, नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एम्स) मॉडल के अनुरूप शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए पूरी तरह से कार्यरत है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद और अन्य संगठन इन प्रयासों को संस्थागत रूप दे रहे हैं।
आधुनिक तनाव और प्राचीन योग के रूप में समाधान - आजकल बच्चे कई प्रकार के तनाव से गुजर रहे हैं, जिसके कारण उनका मन चिंतित रहता है। इनमें परीक्षाओं और सोशल मीडिया का दबाव मुख्य हैं। महर्षि पतंजलि के द्वितीय सूत्र- योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: के अनुसार चित्त का निरोध ही योग है। अर्थात्, मन की चंचलता को नियंत्रित करने से ही मन की शांति प्राप्त होती है। एनईपी 2020 के अनुसर भी पढने के साथ स्वयं को समझना आवश्यक है।
प्राचीन भारतीय परंपराएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण शामिल है। वेद, उपनिषद, भगवद् गीता और आयुर्वेद कुछ ऐसे प्राचीन ग्रंथ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करते हैं, मानसिक शांति को प्रोत्साहित करते हैं और संतुलित जीवन की ओर मार्गदर्शन करते हैं। उदाहरण के लिए, आधुनिक ध्वनि चिकित्सा और माइंडफुलनेस-आधारित त अथर्ववेद में मंत्रों और उपचार करने वाली ध्वनियों के शांत प्रभाव के वर्णन से संबंधित हैं।
महर्षि पतंजलि के योग सूत्र में अष्टांग योग प्रणाली - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक कल्याण का एक एकीकृत विज्ञान है। यह व्यक्ति के संपूर्ण विकास का द्वार है।
योग शिक्षा शारीरिक रूप से लचीलापन और शक्ति बढ़ाकर, रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करके और श्वसन एवं पाचन तंत्र में सुधार करके स्वास्थ्य में वृद्धि करती है। मानसिक स्तर पर, यह तनाव और चिंता को कम करती है। एकाग्रता, स्मृति, भावनात्मक संतुलन और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यह आत्मज्ञान और आत्म-साक्षात्कार, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और करुणा एवं सहानुभूति के विकास को बढ़ावा देती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून, 2015 को भारत में मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को 177 देशों का समर्थन मिलना योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। भारत सरकार द्वारा स्कूलों में योग शिक्षा को अनिवार्य किया गया है। हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भी योग-ध्यान अनुसंधान का विकास हुआ है।
आधुनिक सतत विकास एवं प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण - विज्ञान और प्रौद्योगिकी में असीम सफलता के बावजूद, आधुनिक समय में हम पर्यावरण संकट और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं। इसका एक कारण है छात्रों में पर्यावरण के लिए सम्मान और सतत जीवनशैली से संबंधित जागरूकता की कमी होना। प्राचीन भारत में पर्यावरण को केवल वस्तु नहीं, बल्कि सजीव और चेतन के रूप में देखा जाता था। अथर्ववेद का मंत्र माता भूमि पुत्रो?हं पृथिव्याः बताता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतान हैं। अत: पृथ्वी की सुरक्षा हमारा आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्य है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की उल्लेखनीय उपलब्धियां - मंगलयान (2014), चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 (2023) - पारंपरिक भारतीय गणित और खगोल विज्ञान के प्रेरक प्रभाव का एक जीवंत उदाहरण हैं।
उदाहरणार्थ, आर्यभट्ट का पाँचवीं शताब्दी का आर्यभटीय में सूर्यकेंद्रित मॉडल और पृथ्वी की परिधि की गणना (3931.6 मील), जो आधुनिक समय में 3950 मील तक सटीक है। कुछ अन्य उदाहरण जैसे- ग्रहों की दीर्घवृत्ताकार गति और शून्य-दशमलव प्रणाली, वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका में ग्रहों की गति और भास्करचार्य की लीलावती और सिद्धांतशिरोमणि में ग्रहों की गणना समकालीन अंतरिक्ष गणनाओं का मूल हैं।
शिक्षा पाठ्यक्रम में प्राचीन खगोलशास्त्र के साथ आधुनिक खगोल विज्ञान का समावेष जैसे, 12 राशियों की खगोलीय गति का पारंपरिक सिद्धांत एवं आधुनिक केप्लर नियम विद्यार्थियों में गणितीय-खगोलीय चेतना जागृत करेगा। वहीं दूसरी तरफ भविष्य में इसरो जैसे राष्ट्रीय संस्थानों का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप स्टेम शिक्षा के साथ भारत की वैदिक-शास्त्राrय वैज्ञानिक विरासत को एकीकृत करके पुनर्स्थापित किया जाएगा। जो अगली पीढ़ी को स्वदेशी गौरव और वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए भी प्रेरित करेगा।
प्राचीन वास्तुशास्त्र और आधुनिक वास्तुकला - प्राचीन वास्तुशास्त्र, भवन निर्माण के वैज्ञानिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन है। यह सूर्य की गति, हवा की दिशा, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और पंच तत्वों के संतुलन के आधार पर प्राकृतिक प्रकाश, वायु-संचालन, ऊर्जा प्रवाह और पर्यावरणीय सामंजस्य सुनिश्चित करता है। आधुनिक वास्तुकला में इसका उपयोग ग्रीन बिल्डिंग, ऊर्जा-कुशल निर्माण, प्राकृतिक प्रकाश, एयर कंडीशनिंग, वर्षा जल संग्रहण और सौर ऊर्जा में किया जाता है। लीडरशिप इन एनर्जी एंड एनवायरनमेंटल डिज़ाइन)-प्रमाणित भवनों में, वास्तु के उत्तर-पूर्वी दिशा (ईशान कोण) से ऊर्जा खपत में 30ज्ञ् तक की कमी देखी गई है। आईआईटी खड़गपुर और अन्य संस्थानों में किए गए अध्ययनों के अनुसार, वास्तुशास्त्र की खुली आंगन प्रणाली (प्राकृतिक प्रकाश-वायुमंडल) ने सामयिक निष्क्रिय शीतलन की तुलना में 40ज्ञ् ऊर्जा बचत प्रदर्शित की है। स्थानीय संसाधनों के उपयोग से कार्बन फुटप्रिंट में कमी आई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 वास्तुकला पाठ्यक्रम में वास्तुशास्त्र को शामिल करने का समर्थन करती है। हरित प्रमाणन, सौर प्रणाली विश्लेषण और मंदिर/हवेली केस स्टडी छात्रों में सतत डिजाइन के प्रति जागरूकता बढ़ाएगी, जिससे शून्य-ऊर्जा और जलवायु-लचीली संरचनाओं के लिए वैज्ञानिक विरासत को पुनर्जीवित करके वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। स्कूल पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को सूर्यगणना सॉफ्टवेयर विश्लेषण एवं हरित प्रमाणन का अध्ययन कराया जाए। यह जलवायु अनुकूलन एवं शून्य ऊर्जा भवनों हेतु प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को पुनर्स्थापित कर वैश्विक स्थिरता लाने में मदद करेगा। प्राचीन भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी अतीत का एक अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक है। यह गणितीय अमूर्तता से लेकर सटीक शल्य चिकित्सा और उत्कृष्ट धातु विज्ञान तक, मानव प्रतिभा की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रदर्शित करती है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए अब इस विरासत को बुनियादी पाठ्पाम में शामिल करने की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य अतीत का अंधानुकरण या अवैज्ञानिक दावों का महिमामंडन करना नहीं, किन्तु विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों में निहित हो वैश्विक दृष्टिकोण के साथ शिक्षा प्रदान करना है। इससे बच्चों को यह समझने में मदद मिलेगी कि विज्ञान एक सार्वभौमिक मानवीय प्रयास है जिसमें उनके पूर्वजों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह उन्हें एक बहुविषयक, व्यापक और सतत दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। एक भारतीय छात्र केवल बुनियादी तथ्यों को ही नहीं सीख कर निरंतर ज्ञान प्राप्त करने और प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित होगा।
(लेखिका प्रख्यात शिक्षाविद् एवं वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति हैं।)