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महिला उत्थान और सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं सावित्रीबाई फुले

प्रकाशित: 12-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
महिला उत्थान और सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं सावित्रीबाई फुले
डॉ. रमेश कुमार शर्मा
समूचे विश्व में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है जिसकी आधिकारिक मान्यता 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी गई थी, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना और समाज में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना है। हमारे देश में महिला सशक्तिकरण अभियान की शुरुवात 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक बेहद साधारण दलित किसान खंडोजी नेवसे के घर में जन्मी सावित्रीबाई फुले ने मात्र 15 वर्ष की आयु में ही कर दिया था। हलाकि हमारी सभ्यता और संस्कृति “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'' के सिद्धांत को मानती है जिसमें महिलाओं के सम्मान और उनकी भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। परन्तु उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के बीच का कालखंड ऐसा था जिसमें न सिर्फ महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था बल्कि उनको अनेकों सामाजिक कुरीतियों का सामना भी करना पड़ता था।
भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ अनेकों व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने संघर्ष, साहस और दूरदृष्टि से समाज में परिवर्तन की मजबूत नींव रखी। ऐसी ही एक महान विभूति थीं सावित्रीबाई फुले आज 10 मार्च है यानि उनकी पुण्यतिथि जो केवल उनके स्मरण का दिवस नहीं है बल्कि उनके विचारों और संघर्षों से प्रेरणा लेने का भी दिन है। सावित्रीबाई फुले ने उन्नीसवीं शताब्दी के उस दौर में सामाजिक सुधार की मशाल जलाई, जब समाज जातिगत भेदभाव, स्त्राr-अशिक्षा और रूढ़िवादिता से गहराई तक जकड़ा हुआ था। में सावित्रीबाई फुले का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक उपेक्षा, जातीय भेदभाव और संघर्षों से भरा रहा परन्तु उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी और कम उम्र विवाह होने के बाद भी अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर अपने सम्पूर्ण जीवन को नारी उत्थान और समाज कल्याण के लिए एक व्यापक आंदोलन खड़ा किया और इसी आंदोलन में खुद का न्योछवर कर दिया। बाल विवाह प्रथा के चलते सावित्रीबाई फुले जी विवाह कम आयु में ही हो गई थी जिससे उनकी शिक्षा दीक्षा प्रभावित हुई परन्तु पति ज्योतिराव फुले जो की खुद एक सामाजिक कार्यकर्त्ता थे जो सामाजिक उत्थान और समानता के लिए संघर्ष कर रहे थे उनके सहयोग से सावित्रीबाई जी की शिक्षा पूर्ण हो पायी और वर्ष 1848 में उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया। उनका यह कदम अत्यंत ाढांतिकारी था क्योंकि उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को उपयोगी नहीं समझा जाता था इसलिए कुछ सामाजिक कट्टरपंथीयों ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं तो उन पर पत्थर और गोबर फेंकते तथा उनका अपमान करते थे। लेकिन उन्होंने इन सब अपमानों को सहते हुए अपने मिशन को जारी रखा। यह उनके साहस और शिक्षा के प्रति समर्पण का प्रतीक है। और आज हम उनको प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में भी जानते हैं।
भारतीय समाज सुधार आंदोलन के इतिहास में सावित्रीबाई फुले का जीवन दर्शन केवल एक प्रयास नहीं बल्कि एक आंदोलन साबित हुआ जिसने आधुनिक भारत में महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की नींव रखी। यह समझना आवश्यक है कि उनका दृष्टिकोण केवल लड़कियों की शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज के उस सबसे वंचित तबके को केंद्र में रखा, जिसे सदियों से शिक्षा और सम्मान के मूल अधिकारों से वंचित रखा गया था। 19वीं सदी का भारतीय समाज जातिगत विषमता और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों की गिरफ्त में था। दलितों और पिछड़े वर्गों को केवल शिक्षा से ही वंचित नहीं रखा जाता था, बल्कि सामाजिक सम्मान की दृष्टि से भी उन्हें अछूत माना जाता था। सावित्रीबाई और उनके पति महात्मा ज्योतिराव फुले ने इस संरचनात्मक अत्याचार के विरुद्ध सबसे पहले वैचारिक और व्यावहारिक मोर्चा खोला। उनके द्वारा स्थापित विद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक समरसता और मानवीय समानता के उन गढ़ों की तरह थे, जहाँ जात-पात की ऊँच-नीच को तोड़कर एक नए, समतामूलक समाज का निर्माण किया जा रहा था। यह एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसने बाद के सामाजिक न्याय आंदोलनों की राह प्रशस्त की।
महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सावित्रीबाई का दृष्टिकोण उस समय के सीमित परिप्रेक्ष्य से कहीं अधिक व्यापक और मानवीय था।
उस दौर में बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा उत्पीड़न जैसी कुरीतियाँ महिलाओं के जीवन को नरक बना देती थीं। विधवाओं के साथ होने वाला सामाजिक व्यवहार अत्यंत अमानवीय था; उन्हें केवल तिरस्कार ही नहीं, बल्कि आजीवन आत्मग्लानि और कठिनाइयों में जीने के लिए विवश किया जाता था। सावित्रीबाई ने इस ाtढर सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने केवल सहानुभूति दिखाकर संतोष नहीं किया, बल्कि विधवाओं के लिए आश्रय स्थल स्थापित कर उन्हें आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया। यह केवल परोपकार नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक ाढांति की नींव रखने जैसा था, जो महिलाओं को उनके शरीर और जीवन पर अधिकार दिलाने की दिशा में पहला कदम था।
उनके सुधारवादी दृष्टिकोण की सबसे बड़ी ताकत उनकी मानवीय संवेदना और साहस था। "बाल हत्या प्रतिबंधक गृह" (घर) की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि वे सामाजिक विसंगतियों की जड़ तक पहुँच रही थीं। अनचाहे गर्भ से पीड़ित विधवाएँ, जो समाज के कोप और अपमान से बचने के लिए गर्भपात या नवजात शिशु की हत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाती थीं, उनके लिए एक सुरक्षित स्थान की परिकल्पना करना और उसे मूर्त रूप देना उस समय के रूढ़िवादी समाज में अद्भुत साहस का कार्य था। सावित्रीबाई फुले की मानवीय संवेदना का सबसे बड़ा उदाहरण 1897 में प्लेग महामारी के समय देखने को मिला। उस समय जब लोग बीमारी के डर से एक-दूसरे से दूरी बना रहे थे, तब सावित्रीबाई बीमार लोगों की सेवा में लगी रहीं। वे स्वयं मरीजों को अस्पताल तक पहुँचाने का कार्य करती थीं। इसी सेवा कार्य के दौरान उन्हें भी प्लेग हो गया और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उन्होंने मानव सेवा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
आज जब हम उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि हम उनके विचारों और मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएँ। आज भी समाज में शिक्षा, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। ऐसे में सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें यह सिखाता है कि दृढ़ संकल्प और साहस के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। सावित्रीबाई फुले जी ने अपने इन सभी प्रयासों के माध्यम से न केवल महिलाओं को सशक्त बनाया बल्कि भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को मजबूत किया और महिला उत्थान और सशक्तिकरण की अग्रदूत बनी।
(लेखक प्रोफेसर विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑ़फ प्रोफेसनल स्टडीज, नई दिल्ली हैं।)