योगदर्शन
प्रकाशित: 12-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
किसी भी ग्रंथ को पढ़ लेने मात्र से आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और आत्मज्ञान के बिना मुक्ति भी संभव नहीं है। ग्रंथ केवल मार्गदर्शन करते हैं; चलना तो साधक को स्वयं ही पड़ता है। इसके लिए साधना आवश्यक है।
चित्त की वृत्तियों का पूर्णत निरोध ही योग है। अपनी इन्द्रियों को वश में कर चेतना का आत्मा से संयुक्त होना ही योग का विज्ञान है।
मनुष्य का चित्त वासनाओं का घर है। अनेक जन्मों के संस्कार उसमें विद्यमान रहते हैं और उनकी तरंगें निरंतर उठती रहती हैं। आत्मा इन सबसे परे है। जिस प्रकार जब तक तालाब के जल में हलचल बनी रहती है, तब तक चन्द्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई नहीं देता; उसी प्रकार मन में वासनाओं की हलचल रहने पर आत्मबोध नहीं हो सकता।
समस्त सृष्टि का विस्तार तीन गुणों- सत्त्व, रज और तम -के आधार पर है। यह प्रकृति इन्हीं तीन गुणों से युक्त है। आत्मा इन सबका केवल साक्षी है, इसलिए उसे दृष्टा कहा जाता है। तीनों गुणों की मात्रा में भिन्नता होने से प्राकृतिक तत्त्वों में विविधता दिखाई देती है।
चित्त को स्थिर करने के लिए जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, वही अभ्यास कहलाता है। मन अत्यंत चंचल है; वह एक क्षण भी शांत नहीं रहता, क्योंकि उसमें निरंतर विचारों का प्रवाह चलता रहता है। यह प्रवाह निद्रा में भी बना रहता है, तभी मनुष्य स्वप्न देखता है।
मन अनेक दिशाओं में भागता है। उसे स्थिर करने के लिए अनेक शास्त्राsं में विभिन्न साधन बताए गए हैं, जैसे- ध्यान, भजन, कीर्तन, मंत्र-जाप, अपने इष्टदेव या परमात्मा का स्मरण तथा गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप आदि। इन उपायों के माध्यम से मन धीरे-धीरे किसी एक केंद्र पर स्थिर होने लगता है।
इससे मन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। किंतु वह कुछ समय शांत रहने के बाद पुन दुगुने वेग से भोगों की ओर भागने लगता है। जिस प्रकार उपवास के समय मन में बार-बार भोजन की इच्छा उत्पन्न होती है और ध्यान बार-बार भोजन की ओर जाता है, उसी प्रकार ध्यान में बैठने पर विचार और भी तीव्रता से आने लगते हैं। उन्हें रोकने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है यही अभ्यास है। इसमें दीर्घ समय लग सकता है, इसलिए धैर्य आवश्यक है।
प्राणायाम से भी चित्त की स्थिरता प्राप्त होती है। संसार के कार्यों के लिए गति आवश्यक है, परंतु परमात्मा स्वयं स्थिर है। वह सर्वत्र विद्यमान है और अचल है। जिस क्षण मन और शरीर की समस्त ािढयाएँ शांत हो जाती हैं, उसी क्षण आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।
अत परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य रूप से कुछ करने की अपेक्षा न करने का अभ्यास करना आवश्यक है। हमारा मन निरंतर कुछ-न-कुछ करता रहता है; अभ्यास के द्वारा उसे निपियता की ओर ले जाना होता है। उसे स्थिर और शांत करना आवश्यक है, ताकि उसकी समस्त हलचल समाप्त हो जाए। आत्मज्ञान का यही एक मार्ग है। यह शरीर एक ऐसे घर के समान है जिसके भीतर परमात्मा का निवास है और बाहर संसार स्थित है। मनुष्य का मन इस घर के द्वार पर खड़ा होकर संसार को देखता रहता है। यदि उसमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो उसे अपने ही भीतर परमात्मा की झांकी प्राप्त होती है और वह आत्मानंद का अनुभव करता है। यही योग है।
चित्त की वृत्तियों का पूर्णत निरोध ही योग है। अपनी इन्द्रियों को वश में कर चेतना का आत्मा से संयुक्त होना ही योग का विज्ञान है।
मनुष्य का चित्त वासनाओं का घर है। अनेक जन्मों के संस्कार उसमें विद्यमान रहते हैं और उनकी तरंगें निरंतर उठती रहती हैं। आत्मा इन सबसे परे है। जिस प्रकार जब तक तालाब के जल में हलचल बनी रहती है, तब तक चन्द्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई नहीं देता; उसी प्रकार मन में वासनाओं की हलचल रहने पर आत्मबोध नहीं हो सकता।
समस्त सृष्टि का विस्तार तीन गुणों- सत्त्व, रज और तम -के आधार पर है। यह प्रकृति इन्हीं तीन गुणों से युक्त है। आत्मा इन सबका केवल साक्षी है, इसलिए उसे दृष्टा कहा जाता है। तीनों गुणों की मात्रा में भिन्नता होने से प्राकृतिक तत्त्वों में विविधता दिखाई देती है।
चित्त को स्थिर करने के लिए जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, वही अभ्यास कहलाता है। मन अत्यंत चंचल है; वह एक क्षण भी शांत नहीं रहता, क्योंकि उसमें निरंतर विचारों का प्रवाह चलता रहता है। यह प्रवाह निद्रा में भी बना रहता है, तभी मनुष्य स्वप्न देखता है।
मन अनेक दिशाओं में भागता है। उसे स्थिर करने के लिए अनेक शास्त्राsं में विभिन्न साधन बताए गए हैं, जैसे- ध्यान, भजन, कीर्तन, मंत्र-जाप, अपने इष्टदेव या परमात्मा का स्मरण तथा गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप आदि। इन उपायों के माध्यम से मन धीरे-धीरे किसी एक केंद्र पर स्थिर होने लगता है।
इससे मन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। किंतु वह कुछ समय शांत रहने के बाद पुन दुगुने वेग से भोगों की ओर भागने लगता है। जिस प्रकार उपवास के समय मन में बार-बार भोजन की इच्छा उत्पन्न होती है और ध्यान बार-बार भोजन की ओर जाता है, उसी प्रकार ध्यान में बैठने पर विचार और भी तीव्रता से आने लगते हैं। उन्हें रोकने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है यही अभ्यास है। इसमें दीर्घ समय लग सकता है, इसलिए धैर्य आवश्यक है।
प्राणायाम से भी चित्त की स्थिरता प्राप्त होती है। संसार के कार्यों के लिए गति आवश्यक है, परंतु परमात्मा स्वयं स्थिर है। वह सर्वत्र विद्यमान है और अचल है। जिस क्षण मन और शरीर की समस्त ािढयाएँ शांत हो जाती हैं, उसी क्षण आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।
अत परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य रूप से कुछ करने की अपेक्षा न करने का अभ्यास करना आवश्यक है। हमारा मन निरंतर कुछ-न-कुछ करता रहता है; अभ्यास के द्वारा उसे निपियता की ओर ले जाना होता है। उसे स्थिर और शांत करना आवश्यक है, ताकि उसकी समस्त हलचल समाप्त हो जाए। आत्मज्ञान का यही एक मार्ग है। यह शरीर एक ऐसे घर के समान है जिसके भीतर परमात्मा का निवास है और बाहर संसार स्थित है। मनुष्य का मन इस घर के द्वार पर खड़ा होकर संसार को देखता रहता है। यदि उसमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो उसे अपने ही भीतर परमात्मा की झांकी प्राप्त होती है और वह आत्मानंद का अनुभव करता है। यही योग है।