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विदेशी शक्तियों और भितरघातियों की जुगलबंदी विफल

प्रकाशित: 27-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
लोकतंत्र में असहमति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिक अधिकारों का मूल आधार होता है परन्तु जब असहमति की आड़ में विदेशी धन, अत्याधुनिक तकनीक और राष्ट्रविरोधी तत्वों का एक अतिआधुनिक ताना-बाना तैयार कर देश की संप्रभुता को चुनौती दी जाए तब यह विरोध नहीं बल्कि एक सुनियोजित छद्म-युद्ध बन जाता है। देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर घटित हालिया घटपाम इसी खतरनाक वैश्विक और आंतरिक जुगलबंदी का एक नया रूप था। इतिहास गवाह हैं कि विगत कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक व सामरिक प्रगति को बाधित करने के लिए ऐसी ही वैश्विक साजिशें बार-बार रची गई हैं परन्तु सुरक्षा एजेंसियों के अभेद्य समन्वय और सरकार की दूरदर्शी रणनीति ने इस चक्रव्यूह को एक बार फिर ध्वस्त कर दिया। जंतर-मंतर का घटनाक्रम कोई अचानक हुआ आंदोलन नहीं था बल्कि इसके पीछे वही वैश्विक टूलकिट इकोसिस्टम सािढय था जिसका भंडाफोड़ सन् 2021 के कृषक आंदोलन के समय पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन जैसे कनाडा आधारित संगठनों की भूमिका के दौरान हुआ था। सन् 2019-2020 के हांगकांग प्रदर्शनों में चीन विरोधी अभियानों के लिए ऐसा ही दृश्य सामने आया था। सन् 2020 के दिल्ली दंगों तथा शाहीन बाग प्रदर्शनों में भीड़ जुटाने के लिए भी ऐसे ही प्रयास किये गये थे जिन्हें जंतर-मंतर पर पुन दोहराया गया। इस बार पारंपरिक सोशल मीडिया पर एजेंसियों की कड़ी निगरानी को मात देने के लिए सुनियोजित योजना के तहत बिटचैट, ब्रिजफाई और ब्रायर जैसे मेश-नेटवर्किंग और एपिप्टेड प्लेटफॉर्म्स का सहारा लिया। ये ऐप्स बिना इंटरनेट कनेक्शन के केवल वाई-फाई और ब्लूटूथ के पीयर-टू-पीयर नेटवर्क पर काम करते हैं। इसका इस्तेमाल सन् 2019 के म्यांमार आंदोलन और बेलारूस के विरोध प्रदर्शनों में गोपनीय संदेश भेजने के लिए किया गया था। जंतर-मंतर पर भी इसी तकनीक के जरिए सीमापार के आकाओं द्वारा देश के अलग-अलग कोनों से आए असामाजिक तत्वों और स्लीपर सेल्स को रीयल-टाइम निर्देश दिए जा रहे थे। दिल्ली पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि हालिया प्रदर्शनों के दौरान भ्रम और फर्जी खबरें फैलाने वाले कई सोशल मीडिया अकाउंट्स वही थे जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी भारत विरोधी और भ्रामक जानकारी फैलाने में सािढय थे। गृह मंत्रालय और केंद्रीय जांच एजेंसियों के अनुसार विगत पांच वर्षों में भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के नियमों के उल्लंघन के कारण 6,000 से अधिक संदिग्ध एनजीओ और वैश्विक थिंक-टैंक के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। इसके बावजूद हवाला नेटवर्क और शेल कंपनियों के जरिए करोड़ों रुपये की अवैध धनराशि भारत के भीतर अस्थिरता फैलाने के लिए लगातार झोंकी जा रही है। प्राथमिक जांच आख्या में स्पष्ट हुआ है कि जंतर-मंतर पर अराजकता फैलाने के लिए विदेशी फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा शेल कंपनियों के माध्यम से जुटाया गया। इससे भी अधिक चिन्ता का विषय यह है कि इस तंत्र में सीमापार के लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के डिजिटल विंग आतंकी जैसे संगठनों ने भी अपनी घुसपैठ बना ली थी। यह वही खतरनाक नेटवर्क है जिसने सन् 1993 के मुंबई बम धमाकों से लेकर सन् 2008 के 26/11 के हमलों को अंजाम दिया था। विगत कई वर्षों से से कश्मीर में अतिआधुनिक आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी इन्हीं संगठनों का हाथ रहा है। जंतर-मंतर प्रदर्शन की आड़ में देशव्यापी सांप्रदायिक दंगे भड़काना, सरकार को पंगु बनाना तथा बांग्लादेश-नेपाल की तरह ही तख्ता पलट करना था। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक खाद-पानी देने के लिए वही चेहरे निरंतर जंतर-मंतर पर मौजूद रहे जो 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर हुई हिंसक घटनाओं और भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े अर्बन नक्सल नेटवर्क का हिस्सा थे। सत्ता की लिप्सा में अंधे कुछ राजनीतिक घटकों और असामाजिक-माफिया तत्वों ने इन देशविरोधी ताकतों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष संरक्षण प्रदान किया। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त इन तत्वों का इतिहास हमेशा से राष्ट्रहित के विरोध में खड़ा होने का रहा है चाहे वह कश्मीर में धारा 370 के उन्मूलन का विरोध हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए के खिलाफ झूठा भ्रम फैलाकर हिंसा भड़काना। सन् 2020 में शाहीन बाग और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों में स्थानीय स्लीपर सेल्स, भड़काऊ भाषणों और हवाला फंडिंग के माध्यम से सांप्रदायिक तनाव पैदा किया गया था जिस पर सुरक्षा एजेंसियों ने एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर वित्तीय रीढ़ तोड़ी थी। सन् 2021 के गणतंत्र दिवस पर लाल किला हिंसा के दौरान भ्रामक टूलकिट और सोशल मीडिया अफवाहों का सहारा लेकर ऐतिहासिक स्मारकों और राष्ट्रीय गरिमा पर प्रहार किया गया था जो फॉरेंसिक जांच और मुख्य साजिशकर्ताओं की गिरफ्तारी से बेनकाब हो चुका है। जंतर-मंतर का हालिया उपद्रव भी इसी शृंखला की अगली कड़ी थी जहां इंटरनेट रहित मेश-नेटवर्किंग ऐप्स और विदेशी फंडिंग के जरिए राष्ट्रीय प्रतीक क्षेत्र को निशाना बनाने की साजिश रची गई। हालिया घटपाम पर नजर डालें तो काकरोच का जन्म अमेरिका की धरती से हुआ। डीप स्टेट ने साइबर दिग्गजों और नेटवर्किंग माफियों के साथ मिलकर विश्व में महात्वपूर्ण स्थान की ओर बढते भारत के विरुद्ध षडयंत्र रचा। आतंकी संगठनों, विपक्षी दलों के संरक्षण प्राप्त अपराधियों, राष्ट्रद्रोही स्लीपर सेल, भितरघातियों सहित कट्टरपंथियों को सािढय किया गया। आंदोलन की शुरूआत में चन्द लोगों के साथ पूर्व आप पदाधिकारी अभिजीत भगवान दीपके को अचानक भारी समर्थन मिलने लगा। मंच से राष्ट्रविरोधी नारे लगाये गये। सनातन को गालियां दी गईं। धारा 370 का इकबाल बुलंद किया गया। एक सम्प्रदाय विशेष का यशगान किया गया। भारी पथराव और पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले किये गये। कुख्यात अपराधी, खतरनाक आरोपी, असामाजिक तत्वों की जमावडा बनता चला गया। षडयंत्र के तहत राजधानी के साथ-साथ देश के विभिन्न शहरों को भी अराजकता की आग में झौंकने हेतु मुंह पर कपडा बांधकर जमातें पहुंचने लगीं। गालियां देने की तो प्रतियोगिता ही देखने को मिली। जातिवादी उन्माद फैलाया गया। साम्प्रदायिकता को उभारा गया। दलगत एजेन्डे सामने आये। टुकडे-टुकडे गैंग सािढय रही। धमकियों की बाढ आ गई। संसद उखाड देंगे, नीतियां संसद से नहीं सडकों से बनेंगी, नेपाल-बांग्लादेश बना देंगे, तिलक-तराजू और तलवार जैसे मुद्दों को हवा दी गई। नीट पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी और शिक्षा प्रणाली में सुधार के नाम पर तोडफोड, आगजनी और आपराधिक कृत्य होते चले गये। वास्तविकता तो यह है कि भारत का विश्व मंच पर निरंतर ऊंचा होते कद, वैश्विक संकट के दौरान देश की आपूर्ति श्रंखला के मजबूत रहने और संसद के वर्तमान सत्र में लाये जाने वाले आयकर (संशोधन) विधेयक, सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए विधेयक, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक जैसे अनेक बिलों को रोकने हेतु विदेशी आकाओं के इशारे पर इस राष्ट्रद्रोही षडयंत्र को अमली जामा सडक पर पहनाया गया किन्तु अभी सदन के अन्दर भी असंवैधानिक हरकतें देखने को मिलना बाकी है। 21वीं सदी में भारत के खिलाफ लड़े जा रहे इस पांचवीं पीढ़ी के युद्ध का मुकाबला केवल पारंपरिक पुलिस बल से नहीं बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और तकनीकी श्रेष्ठता से ही किया जा सकता है। सरकार के इस कदम ने न केवल एक बड़े राष्ट्रीय संकट को टाला दिया है बल्कि दुनिया को संदेश दे दिया कि भारत अपनी संप्रभुता से समझौता करने वाले किसी भी आंतरिक या बाहरी भितरघाती को बख्शने वाला नहीं है। ऐसे में आम आवाम को स्वयं समूचे घटनाक्रम का वास्तविक विश्लेषण करना होगा जिसमें काट-छांट कर बनाये गये वीडियो, भ्रामक संदेश और अपुष्ट समाचारों को तिलांजलि और शब्दों का मर्म, भाषा की प्रस्तुतिकरण, हावभाव का अंदाज और उपस्थित लोगों के चेहरों पर गौर करना नितांत आवश्यक होगा।