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भारतीय संस्कृति की आत्मा है संयम

प्रकाशित: 27-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलब्धियों का युग है। दुनिया अभूतपूर्व गति से विकास कर रही है। ऊंची-ऊंची इमारतें, आधुनिक परिवहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल ाढांति और उपभोक्तावाद ने मानव जीवन को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक बना दिया है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या केवल भौतिक समृद्धि ही किसी राष्ट्र की वास्तविक पहचान है? भारत का उत्तर सदैव "नहीं" रहा है। भारतीय चिंतन ने हमेशा माना है कि सभ्यता और संस्कृति अलग-अलग अवधारणाएं हैं। सभ्यता बाहरी विकास का प्रतीक है, जबकि संस्कृति मनुष्य के भीतर के संस्कार, विचार, आचरण, त्याग, सहिष्णुता और संयम की अभिव्यक्ति है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसका संयम-प्रधान स्वरूप है। यही कारण है कि अनेक उतार-चढ़ाव, विदेशी आाढमणों और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद यह संस्कृति आज भी जीवित है। इतिहास साक्षी है कि मिस्र, यूनान और रोम जैसी महान सभ्यताएं समय के साथ विलुप्त हो गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार बनी हुई है। इसका कारण केवल धार्मिक परंपराएं नहीं, बल्कि मानवता, करुणा, आत्मसंयम और परिवार-केन्द्रित जीवन मूल्यों का संरक्षण है।
भारतीय संस्कृति ने कभी केवल अधिकारों की बात नहीं की, बल्कि कर्तव्यों को अधिक महत्व दिया। माता-पिता का सम्मान, गुरु के प्रति श्रद्धा, अतिथि का सत्कार, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और समाज के लिए त्याग की भावना हमारे जीवन का अभिन्न अंग रही है। यही मूल्य भारत को अन्य देशों से अलग पहचान देते हैं। आज जब दुनिया मानसिक तनाव, अकेलेपन और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब भारतीय जीवन दर्शन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
दुर्भाग्य से आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने पश्चिमी जीवनशैली का अनुकरण तो किया, लेकिन उसके दुष्परिणामों पर गंभीरता से विचार नहीं किया। महानगरों में संयुक्त परिवारों का टूटना, वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, पारिवारिक संबंधों में बढ़ती दूरी और तलाक की बढ़ती घटनाएं सामाजिक परिवर्तन के संकेत हैं। आधुनिक जीवन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता आवश्यक है, किंतु यदि उसके कारण परिवार, संबंध और सामाजिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़ जाएं तो यह चिंता का विषय बन जाता है। भारतीय संस्कृति परिवार को केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला मानती है। संयम का अर्थ केवल इच्छाओं का दमन नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है जीवन में संतुलन स्थापित करना। भोजन में संयम, वाणी में संयम, व्यवहार में संयम, ाढाsध पर नियंत्रण, धन के उपयोग में संयम और भोग-विलास की सीमाएं समझना ही सच्चा संयम है। ऐसा व्यक्ति न केवल स्वयं सुखी रहता है बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बनता है। भारतीय ऋषियों ने संयम को आत्मविकास का सबसे प्रभावी साधन बताया है।
हमारे इतिहास और धर्मग्रंथ संयम की असंख्य प्रेरक कथाओं से भरे पड़े हैं। भीष्म पितामह का आजीवन ब्रह्मचर्य, भगवान महावीर का तप, गौतम बुद्ध का त्याग, आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती का अनुशासित जीवन यह सिद्ध करता है कि महानता का मार्ग भोग से नहीं बल्कि संयम से होकर गुजरता है। ऐसे व्यक्तित्व आज भी इसलिए स्मरण किए जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने जीवन से आदर्श स्थापित किए। आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक भी है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।