संसद चल पाएगी या फिर हंगामे की भेंट चढ़ेगी
प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बाल मुकुंद ओझा
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों ने महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने के लिए अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। विपक्ष सरकार को घेरने की जोरदार तैयारी में है तो सरकार 130 वां संविधान संशोधन विधेयक लाने का संकेत दे रही है। इसके लिए सहयोगियों और लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने की रणनीति पर काम हो रहा है। पिछले संसद सत्र में मोदी सरकार इस परिसीमन विधेयक को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित नहीं करा सकी थी। उस समय सरकार को जरूरी 360 वोटों के मुकाबले 54 वोट कम पड़ गए थे। अब बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच माना जा रहा है कि सरकार एक बार फिर इस बिल को सदन में ला सकती है। साथ ही सरकार एक देश, एक चुनाव के अपने बहुचर्चित प्रस्ताव को आगे बढ़ा रही है।
देश की जनता चाहती है संसद के सत्र सुचारु चले और जनहित के मुद्दों पर चर्चा हो। कोई नहीं चाहता संसद में हंगामा हो या सत्र पहले की तरह बर्बाद हो। मगर देखना होगा इस बार मानसून सत्र सुचारु चलता है या एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ता है। संसद की कार्यवाही पर जनता के खून पसीने की कमाई खर्च होती है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर पर करीब 2.5 से 3 करोड़ रुपये का खर्च आता है। देखने की बात है इस बार यह पैसा सही खर्च होता है या नहीं।
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पक्ष और विपक्ष में जो कटुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतात्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। आज सत्ता और विपक्ष के आपसी सम्बन्ध इतने खराब हो गए है की आपसी बात तो दूर एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते। दुआ सलाम और अभिवादन भी नहीं करते। औपचारिक बोलचाल भी नहीं होती। लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष का सशक्त होना भी जरुरी है मगर इसका यह मतलब नहीं है की कटुता और द्वेष इतना बढ़ जाये की गाली गलौज की सीमा भी लाँघी जाये। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। सोशल मिडिया, टेलीविजन, फेसबुक और ट्विटर जैसे संचार साधनों के बढ़ते दायरे ने आग में घी का काम किया है। भारत के लोकतंत्र के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है। लोकतंत्र की सफलता पक्ष और विपक्ष की मजबूती में है। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होगा जब राष्ट्रीय हितों के मामलों में दोनों की एक राय हो। देश सबसे बड़ा है। मगर ऐसा नहीं हो रहा है जो दुखद है। अब समय का तकाजा है सभी राजनीतिक पार्टियों में जो कुछ गंभीर और समझदार नेता बचे हैं वे लोकतांत्रिक प्रािढया में सभ्यता और मर्यादा बनाए रखने के लिए कोशिशें शुरू करें। उन्हें विधायिका की संस्थाओं के बाहर सरकार और विपक्ष के बीच नियमित बैठकों को आयोजित करना चाहिए। सभी लोकतंत्र प्रेमियों को इस पर गहनता से मंथन करने की जरुरत है। लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ है लोगों का शासन। यह एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है। भारत क्षेत्रफल में दुनिया का सातवाँ और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों ने महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने के लिए अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। विपक्ष सरकार को घेरने की जोरदार तैयारी में है तो सरकार 130 वां संविधान संशोधन विधेयक लाने का संकेत दे रही है। इसके लिए सहयोगियों और लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने की रणनीति पर काम हो रहा है। पिछले संसद सत्र में मोदी सरकार इस परिसीमन विधेयक को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित नहीं करा सकी थी। उस समय सरकार को जरूरी 360 वोटों के मुकाबले 54 वोट कम पड़ गए थे। अब बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच माना जा रहा है कि सरकार एक बार फिर इस बिल को सदन में ला सकती है। साथ ही सरकार एक देश, एक चुनाव के अपने बहुचर्चित प्रस्ताव को आगे बढ़ा रही है।
देश की जनता चाहती है संसद के सत्र सुचारु चले और जनहित के मुद्दों पर चर्चा हो। कोई नहीं चाहता संसद में हंगामा हो या सत्र पहले की तरह बर्बाद हो। मगर देखना होगा इस बार मानसून सत्र सुचारु चलता है या एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ता है। संसद की कार्यवाही पर जनता के खून पसीने की कमाई खर्च होती है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर पर करीब 2.5 से 3 करोड़ रुपये का खर्च आता है। देखने की बात है इस बार यह पैसा सही खर्च होता है या नहीं।
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पक्ष और विपक्ष में जो कटुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतात्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। आज सत्ता और विपक्ष के आपसी सम्बन्ध इतने खराब हो गए है की आपसी बात तो दूर एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते। दुआ सलाम और अभिवादन भी नहीं करते। औपचारिक बोलचाल भी नहीं होती। लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष का सशक्त होना भी जरुरी है मगर इसका यह मतलब नहीं है की कटुता और द्वेष इतना बढ़ जाये की गाली गलौज की सीमा भी लाँघी जाये। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। सोशल मिडिया, टेलीविजन, फेसबुक और ट्विटर जैसे संचार साधनों के बढ़ते दायरे ने आग में घी का काम किया है। भारत के लोकतंत्र के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है। लोकतंत्र की सफलता पक्ष और विपक्ष की मजबूती में है। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होगा जब राष्ट्रीय हितों के मामलों में दोनों की एक राय हो। देश सबसे बड़ा है। मगर ऐसा नहीं हो रहा है जो दुखद है। अब समय का तकाजा है सभी राजनीतिक पार्टियों में जो कुछ गंभीर और समझदार नेता बचे हैं वे लोकतांत्रिक प्रािढया में सभ्यता और मर्यादा बनाए रखने के लिए कोशिशें शुरू करें। उन्हें विधायिका की संस्थाओं के बाहर सरकार और विपक्ष के बीच नियमित बैठकों को आयोजित करना चाहिए। सभी लोकतंत्र प्रेमियों को इस पर गहनता से मंथन करने की जरुरत है। लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ है लोगों का शासन। यह एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है। भारत क्षेत्रफल में दुनिया का सातवाँ और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)